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जम्मू: असम के बांस से बनेगा दशानन का पुतला, मेरठ से आए हिंदू-मुस्लिम कारीगर पेश कर रहे भाईचारे की मिसाल

Mon, 12 Sep 2022 01:06 PM IST
kumar गुलशन कुमार अरुण कुमार, जम्मू

सार

परेड स्थित गीता भवन में पुतलों को तैयार किया जा रहा है। असम से पोर और चवाड़ किस्म का एक ट्रक बांस जम्मू मंगवाया गया है। यह बांस हलका और लचीला होता है।
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Jammu - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक पर्व दशहरा कोविड के दो साल बाद इस बार बड़े स्तर मनाने की तैयारी चल रही है। असम से विशेष किस्म के मंगवाए गए बांस से पुतलों का निर्माण हो रहा है। इसमें दशानन का 60 और मेघनाद व कुंभकर्ण के 50-55 फुट के पुतलों को बनाया जा रहा है। उत्तर प्रदेश के मेरठ के आए 30 कारीगरों का दल जिसमें 15 मुस्लिम अन्य हिंदू कारीगर हैं। यह दल जम्मू में भाईचारे और सांप्रदायिक सौहार्द की मिसाल पेश कर रहा है।

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परेड स्थित गीता भवन में पुतलों को तैयार किया जा रहा है। असम से पोर और चवाड़ किस्म का एक ट्रक बांस जम्मू मंगवाया गया है। यह बांस हलका और लचीला होता है। कारीगर और ठेकादार मोहम्मद रिहान ने बताया कि 40 साल से जम्मू में पुतले बना रहा हूं। जम्मू संभाग में राजौरी, पुंछ, कटड़ा, रियासी, अखनूर सहित अन्य स्थानों के लिए यहीं से पुतले जाते हैं। दो साल जम्मू नहीं आए थे, लेकिन यूपी में पुतले बनाए थे। इस बार उम्मीद की है 2019 के मुकाबले अच्छा काम होगा। 

जम्मू संभाग में यहां मनाया जाता है दशहरा

जम्मू में सबसे बड़ा आयोजन परेड मैदान और गांधीनगर के दशहरा ग्राउंड में होता है। इसमें 50 से 60 फुट के पुतले जलाए जाते हैं। पुंछ, राजोरी, अखनूर व अन्य क्षेत्रों में जाने वाले पुतलों की ऊंचाई 25-30 फुट तक होती है। 
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यहां से आता है ये सामान

मोहम्मद रिहान ने कहा कि असम के बांस, मेरठ से वेस्ट पेपर, दिल्ली से पुराने कपड़े, सेबा और पेंट आता है। इनके प्रयोग से पुतलों के निर्माण में किया जाता है। 

30 साल से जम्मू में पुतले बना रहा हूं। 15 से 20 दिनों का काम होता है। कारीगरों में हिंदू और मुस्लिम हैं। सभी का खाना एक साथ पकता है और एक साथ खाते हैं। काम ही हमारा धर्म है, जिसे हम इतने सालों से निभा रहे हैं और आगे भी निभाते रहेंगे।  - मोहम्मद ग्यासूदीन, कारीगर।

पांच साल से जम्मू आ रहा हूं। कोविड चलते दो साल तक यहां पर दशहरा नहीं मनाया गया है, लेकिन उत्तर प्रदेश में काम मिला था। हमें सभी कारीगर एक गांव के हैं। सभी का पेशा ही यही है। हिंदू-मुस्लिम एक साथ रहते और काम करते हैं।  - रवि कुमार, कारीगर।


मेरे अब्बा पहले यहां आते थे, लेकिन इस बार मैं आया हूं। यहां पर काम भी सीखूंगा। सभी लोग एक साथ रहते हैं। पुतले बनाना का काम काफी बारीकी से होता है। बड़े कारीगरों के साथ रहूंगा तो जल्दी काम सीख पाऊंगा। - हमीद, कारीगर।

तीन साल से पुलते बनाने का काम कर रहा हूं। हर बार 20 से 30 पुतले बनाते हैं। इस बार कोविड के दो साल बाद दशहरा हो रहा है, ऐसे में ज्यादा पुतले बनने की उम्मीद है। पुतले बनाने का काम काफी बारीकी वाला होता है। बांस को काटना, उसे छीलना और फिर एक-एक टुकने को जोड़ा जाता है। इसमें काफी मेहनत और हुनर की जरूरत होती है।  - संदीप कुमार, कारीगर।

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