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लदने वाले हैं हुर्रियत कांफ्रेंस के दिन: कब हुआ इसका गठन? कैसे घाटी और युवाओं में घोला जहर? जानिए सब कुछ

Mon, 23 Aug 2021 03:58 PM IST
प्रशांत कुमार न्यूज डेस्क, अमर उजाला, जम्मू

सार

कश्मीर के नाम पर राजनीति करने वाले हुर्रियत और अलगाववादी नेताओं के दिन धीरे-धीरे लदते जा रहे हैं। शिक्षा और धार्मिक कार्यक्रमों के नाम पर युवाओं में ये कट्टरता का बीज बोते रहे हैं। साल 2019 में जमात-ए-इस्लामी व जेकेएलएफ पर प्रतिबंध के बाद अब हुर्रियत कांफ्रेंस के दोनों धड़ों पर कार्रवाई की तैयारी हो रही है। इन पर जल्द ही प्रतिबंध लग सकता है। 
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हुर्रियत कांफ्रेंस पर जल्द हो सकती है बड़ी कार्रवाई
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विस्तार
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अनुच्छेद-370 हटने के बाद से जम्मू-कश्मीर में अलगाववादियों और पाकिस्तान समर्थित लोगों पर नकेल कसी जा रही है। केंद्र सरकार ने साल 2019 में ही अलगाववादियों समेत प्रतिबंधित संगठन जमात-ए-इस्लामी के लगभग 150 सदस्यों की कुंडली तैयार कर ली थी। जिन पर कानून का चाबुक चल रहा है। इसी क्रम में अब हुर्रियत कांफ्रेंस के दोनों धड़ों पर प्रतिबंध लगाने की तैयारी है। केंद्र सरकार को यह भी सूचना मिली है कि शिक्षा और धार्मिक कार्यक्रमों के नाम पर युवाओं में अलगाववाद और कट्टरता का बीज बोया जा रहा है। अनुच्छेद 370, डोमिसाइल कानून व अन्य मुद्दों को लेकर युवाओं को केंद्र और राज्य सरकार के खिलाफ भड़काया जा रहा है। 

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26 संगठनों के साथ 1993 में अस्तित्व में आई थी हुर्रियत कांफ्रेंस
हुर्रियत कांफ्रेंस 26 संगठनों के साथ 1993 में अस्तित्व में आई थी। इसमें पाकिस्तान परस्त और जमात-ए-इस्लामी, जेकेएलएफ व दुख्तरान-ए-मिल्लत जैसे प्रतिबंधित संगठन भी थे। पीपुल्स कांफ्रेंस व मीरवाइज उमर फारूक की अवामी एक्शन कमेटी भी इसका हिस्सा रही। 2005 में यह अलगाववादी संगठन दो खेमों में बंट गया। कट्टरपंथी संगठन का नेतृत्व सैयद अली शाह गिलानी जबकि नरमपंथी धड़े का नेतृत्व मीरवाइज उमर फारूक के पास गया। केंद्र सरकार ने यूएपीए के तहत 2019 में जमात-ए-इस्लामी व जेकेएलएफ पर प्रतिबंध लगाया था।

क्या कहता है यूएपीए का अनुच्छेद 3(1), जिसके तहत हो सकती है कार्रवाई
सूत्रों का कहना है कि यूएपीए के अनुच्छेद 3(1) के तहत हुर्रियत पर कार्रवाई हो सकती है। इस अनुच्छेद के तहत यदि केंद्र सरकार को लगे कि कोई भी संगठन गैरकानूनी संगठन बन गया है तो उसे गैर कानूनी संगठन करार देकर प्रतिबंधित किया जा सकता है। बताया जा रहा है कि टेरर फंडिंग के एक मामले की जांच के दौरान इस बात के सबूत मिले हैं कि हिजबुल मुजाहिदीन, दुख्तरान-ए-मिल्लत और लश्कर-ए-तैयबा की मदद से अलगाववादी नेता व हुर्रियत कांफ्रेंस के कैडर इसमें लगे हुए हैं। देश और विदेशों से हवाला समेत अन्य अवैध चैनलों से फंड जुटाकर उसका इस्तेमाल अलगाववादी व आतंकी गतिविधियों में किया जा रहा है। 
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2017 से हुर्रियत के दोनों धड़ों के कई नेता जेल में हैं
हुर्रियत पर प्रतिबंध लगाने के लिए कई मामलों को शामिल किया जा सकता है। इसमें एनआईए की ओर से टेरर फंडिंग के एक मामले में कई अलगाववादियों को गिरफ्तार कर जेल की सलाखों के पीछे डाला गया है। 2017 से हुर्रियत के दोनों धड़ों के कई नेता इस मामले में जेल में हैं। इनमें गिलानी का दामाद अल्ताफ अहमद शाह, कारोबारी जहूर अहमद वटाली, गिलानी के करीबी सहयोगी व तहरीक-ए-हुर्रियत प्रवक्ता अयाज अकबर, पीर सैफुल्लाह, हुर्रियत (एम) प्रवक्ता शाहिद-उल-इस्लाम, मेहराजुद्दीन कलवाल, नईम खान, फारूक अहमद डार उर्फ बिट्टा कराटे शामिल हैं। जेके-एलएफ प्रमुख यासीन मलिक, दुख्तरान-ए-मिल्लत प्रमुख आसिया अंद्राबी, पाकिस्तान परस्त अलगाववादी मसरत आलम के नाम भी टेरर फंडिंग के पूरक आरोपपत्र में शामिल थे, जो जेल में हैं।

सेहरई पहला नेता जिसका बेटा बना आतंकी
साल 2020 में मारा गया हिजबुल का डिवीजनल कमांडर जुनैद अहमद सेहरई किसी भी अलगाववादी परिवार का पहला सदस्य था, जिसने आतंकी संगठन का दामन थामा था। जुनैद आतंकी संगठन में शामिल होने से पहले घाटी में पत्थरबाजी की घटनाओं के पीछे का मास्टर माइंड था।

घाटी के युवाओं को थमाते हैं बंदूक और अपनी औलादों को खुद से रखते हैं दूर
कश्मीर के नाम पर राजनीति करने वाले हुर्रियत और अलगाववादी नेताओं को भले ही आम कश्मीरी के भविष्य से कुछ लेना देना न हो, लेकिन अपने बच्चों के भविष्य को लेकर वह काफी सजग हैं। कश्मीरी युवाओं के हाथों में किताबों की जगह बंदूक और पत्थरबाजी को बढ़ावा और स्कूल-कॉलेजों में आग लगाने के लिए उकसा कर वहां के भविष्य को स्कूलों और कॉलेजों से दूर करने वाले 112 अलगाववादी नेताओें के 210 बच्चे विदेशों में अपना भविष्य संवार रहे हैं। सूत्रों के मुताबिक, 14 हुर्रियत नेताओं के 21 पुत्र, पुत्रियां, बहनें और बहुएं अमेरिका, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया, सऊदी अरब, इरान, तुर्की, मलेशिया और पाकिस्तान में पढ़ रहे हैं या वहां बसकर ऐशो आराम की जिंदगी जी रहे हैं। अब घाटी के युवा भी अलगाववादियों की इस साजिश को जान चुके हैं, इसी का परिणाम है कि अब स्थानीय स्तर पर आतंकियों की भर्ती में गिरावट आई है।

पीडीपी के पारा पर घाटी को हिंसा की आग में झोंकने का गंभीर आरोप
एक मामला पीडीपी युवा नेता वहीद उर रहमान पारा से जुड़ा हुआ है। पारा पर आरोप है कि उसने पांच करोड़ रुपये गिलानी के दामाद अल्ताफ अहमद शाह उर्फ अल्ताफ फंटूश को हिजबुल कमांडर बुरहान वानी के जुलाई 2016 में मारे जाने के बाद घाटी को हिंसा की आग में झोंकने के लिए दिया था। एनआईए का आरोप है कि पारा ने फंटूश से संपर्क कर यह सुनिश्चित करने को कहा था कि घाटी में हिंसा और पथराव का दौर जारी रहना चाहिए।

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