नेकां प्रमुख फारूक अब्दुल्ला ने निकाय व पंचायत चुनाव के बहिष्कार की घोषणा कर यू टर्न लेते हुए एक तीर से कई निशाना साधने की कोशिश की है। एक तरफ नेकां ने कश्मीर की राजनीति में धुर विरोधी पीडीपी को अपना स्टैंड साफ करने के लिए बाध्य किया है तो दूसरी तरफ अनुच्छेद 35-ए के मुद्दे पर केंद्र को भी ब्लैकमेल कर दबाव बनाने की रणनीति अपनाई है। इस संवेदनशील मुद्दे पर चुनावों के बहिष्कार का एलान कर नेकां ने कश्मीरियों का दिल जीतने की चाल चली है क्योंकि पंचायत चुनाव के तुंरत बाद ही लोकसभा चुनाव प्रक्रिया शुरू हो जाएगी।
एक सप्ताह पहले जोर-शोर से फारूक ने रियासत में निकाय व पंचायत चुनाव की जोरदार वकालत की थी। लेकिन बुधवार को पार्टी की कोर कमेटी की बैठक में चुनाव के बहिष्कार का फैसला कर लिया। नेकां के फैसले के कुछ घंटे बाद ही बाद पीडीपी ने भी राज्य सरकार से स्थिति साफ करने तथा सर्वदलीय बैठक बुलाने की मांग रख दी। अचानक खेले इस कार्ड के जवाब में पीडीपीको भी वीरवार को अपनी कोर कमेटी की बैठक बुलानी पड़ी। कश्मीर केंद्रित इन दो पार्टियों के स्टैंड से निकाय व पंचायत चुनाव पर संशय के बादल मंडराने लगे।
सूत्रों के अनुसार एनएसए डोभाल के जम्मू-कश्मीर के संविधान को लेकर दिए गए बयान के बाद कश्मीर में अलगाववादी समेत तमाम संगठनों में बौखलाहट शुरू हो गई। इसे अनुच्छेद 35-ए के अस्तित्व से जोड़कर देखा जाने लगा। घाटी में बड़ी तेजी के साथ यह चर्चा शुरू हो गई कि केंद्र सरकार अनुच्छेद 35-ए से छेड़छाड़ का फैसला कर चुकी है। अलगाववादियों ने भी विरोध में बयानबाजी शुरू कर दी। जानकार बताते हैं कि आगामी लोकसभा चुनाव को देखते हुए नेकां आम कश्मीरियों के किसी प्रकार के विरोध को झेलने के मूड में नहीं है। वह अलगाववादियों की नाराजगी भी झेलना नहीं चाहती। इन सबके बीच कश्मीरियों को अपने पक्ष में करने और पीडीपी को चित करने का दांव चला है।