जम्मू। कश्मीर लंबे समय तक गैर हिंदी भाषी क्षेत्र रहा है, लेकिन राजभाषा का दर्जा मिलने के बाद कश्मीर में भी लोग हिंदी पढ़ने लगे हैं। शिक्षाविद कहते हैं कि यह किसी संप्रदाय विशेष की नहीं बल्कि हिंदी सभी वर्गों को एक सूत्र में पिरोने वाली भाषा है। ऐसे में हिंदी को प्रदेश में रोजगार का भी माध्यम बनाया जाना चाहिए। हिंदी को पत्रकारिता, पर्यटन और उद्योग से जोड़ने की जरूरत है। हिंदी अनुवाद को पाठ्यक्रम में शामिल करना होगा। इससे राष्ट्रीय भावना और समरसता भी बढ़ेगी। कॉमर्स जैसे संकायों में भी हिंदी भाषा को विषय के रूप में शामिल करना चाहिए। इससे शिक्षा और रोजगार परक होगी।
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हिंदी पढ़ने वाले छात्रों के लिए बीए-एमए में मिले छात्रवृत्ति
कश्मीर विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के पूर्व अध्यक्ष प्रोफेसर निजामुद्दीन का कहना है कि जम्मू संभाग में वैष्णो देवी और कश्मीर में अमरनाथ यात्रा पर श्रद्धालुओं के आने से हिंदी भाषा को प्रोत्साहन मिला है। कश्मीर में विश्वविद्यालय स्तर तक हिंदी का पठन-पाठन हो रहा है। कश्मीर विवि में हिंदी लगातार पढ़ाई जा रही है। शोध कार्य भी चला है। कई विद्यार्थी एमफिल एवं पीएचडी कर चुके हैं। डॉ. निजामुद्दीन ने बताया कि विश्वविद्यालय में विभागीय पत्र-पत्रिकाएं प्रतिवर्ष प्रकाशित हो रही हैं। अब नई शिक्षा नीति के आने पर प्रदेश में हिंदी का महत्त्व और बढ़ेगा। पाठ्यक्रमों को हिंदी में पढ़ाया जा सकता है। बीए-एमए में हिंदी पढ़ने वाले छात्रों के लिए छात्रवृत्ति की नई पहल करनी होगी, ताकि हिंदी में छात्रों की रुचि बढ़े।
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हिंदी को रोजगारपरक बनाया जाए
कश्मीर विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग से सेवानिवृत्त प्रोफेसर जोहरा का कहना है कि पहले के बजाय अब कश्मीर में हिंदी पढ़ने वालों की संख्या बढ़ गई है। हिंदी किसी एक वर्ग या संप्रदाय की भाषा नहीं है। अब घाटी में राष्ट्रभाषा हिंदी के प्रचार-प्रसार के लिए हिंदी में डिप्लोमा कोर्स भी शुरू किया गया है। हिंदी डिप्लोमा करने वाले छात्र स्नातकोत्तर में प्रवेश लेने के लिए पात्र हैं। इसके अलावा हिंदी के विकास के लिए कश्मीर में कई कार्यशालाएं हो रही हैं। सोशल मीडिया पर भी लोगों को हिंदी के बारे में जागरूक किया जाना चाहिए। सरकार को चाहिए कि प्रदेश में हिंदी को रोजगार परक बनाया जाए। हिंदी पढ़े-लिखे युवाओं के लिए विशेष स्थान निकाले जाएं।