विधानसभा चुनाव के दौरान इंटरनेशनल बार्डर को एलओसी की तर्ज पर आरक्षण की सुविधा देने से लेकर पक्के बंकर, पांच-पांच मरला प्लाट भूमि, विशेष भर्ती देने के सब्जबाग दिखाए गए थे।
तमाम सियासी दलों ने वोट बैंक लुभाने के लिए इन बुनियादी मुद्दों को प्राथमिकता से हल करने का भरोसा दिलाया, लेकिन साल गुजरने को है और समस्याएं वैसी की वैसी हैं।
पिछले दिनों बोबिया, पार्टी, चक चंगा, मनियारी सहित जीरो लाइन के तमाम अन्य गांवों पर पाकिस्तान से गोले बरसे थे। ग्रामीणों को साल में चौथी दफा घर छोड़कर मंदिरों, स्कूलों में जाकर शरण लेनी पड़ी।
हालात सामान्य होते ही बिना देरी किए ग्रामीण घरों को लौट गए। वापसी के बाद कोई गोलाबारी से क्षतिग्रस्त हुए मकान की मरम्मत में जुट गया, तो कोई घायल हुए मवेशियों की सेवा में।
खरीफ सीजन की फसलों की कटाई और छंटाई को देखकर जनजीवन अपने सामान्य ढर्रे पर नजर आता है, लेकिन अंदर ही अंदर से सीमावर्ती ग्रामीण भविष्य को लेकर चिंतित हैं।
बोबिया के ग्रामीण नरेश सिंह, कमल सिंह के अनुसार सरहदी इलाकों की शांति भी अब चिंता का सबब हो गई है। कब कहां से गोलाबारी हो जाए, इसे लेकर कुछ कहा नहीं जा सकता।
सरकार को स्थायी हल के लिए इंतजाम करने चाहिए। सीमावर्ती ग्रामीणों के मुद्दों को लेकर संघर्ष कर रही बार्डर यूनियन की मानें, तो सत्ता परिवर्तन होने के बावजूद ग्रामीणों के जीवन में कोई सुधार नहीं हो पाया है।
यूनियन पदाधिकारी भारत भूषण का कहना है कि प्रशासन ने जीरो लाइन के गांवों को सामुदायिक बंकर की सुविधा देने का प्रस्ताव दिया है। लेकिन, हर घर में अलग से बंकर होना चाहिए।
इसी तरह से साल दर साल चौपट होने वाली फसलों का मुआवजा, भूमि का मुआवजा देने की कोई व्यवस्था नहीं हो पाई है। आर्थिक और जान माल की सुरक्षा दूर की कौड़ी बनी हुई है