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कश्मीर: अफस्पा के खिलाफ हुई एमनेस्टी इंटरनेशनल

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एमनेस्टी इंटरनेशनल ने जम्मू-कश्मीर में मानवाधिकारों के उल्लंघन के मामलों में जवाबदेही तय नहीं किए जाने पर सवाल उठाए हैं।
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बुधवार को इस बाबत नई रिपोर्ट जारी करते हुए संस्था ने कहा कि अफस्पा के लागू हुए 25 साल हो जाने के बाद अब भी उदासीनता के कारण दोषियों को बढ़ावा मिल रहा है। इस रिपोर्ट का भारत सरकार की ओर से कड़ा विरोध होने की उम्मीद है।

संस्था के ग्लोबल आपरेशंस के वरिष्ठ निदेशक मीनार पिम्पले ने प्रेस कांफ्रेंस में कहा कि पांच जुलाई को अफस्पा लागू होने की 25वीं वर्षगांठ है। लेकिन, अभी तक राज्य में तैनात सुरक्षा बल के किसी भी जवान के खिलाफ सिविल कोर्ट में मुकदमा नहीं चलाया गया है।
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सुरक्षा बलों पर कार्रवाई नहीं होने पर चिंता जताई

मुफ्ती मोहम्मद सईद जब केंद्र में गृह मंत्री थे तब 1990 में अफस्पा को लागू किया गया था। अब वह मुख्यमंत्री हैं और उनके समक्ष इस कानून को हटाने का ऐतिहासिक अवसर है।

उन्होंने मचेल में 2010 में फर्जी मुठभेड़ में तीन लोगों को मारे जाने की घटना में कोर्ट मार्शल कर पांच जवानों को दंडित करने की कार्रवाई को स्वागत योग्य बताया। बडगाम कांड की जांच का भी स्वागत किया। उन्होंने कहा कि सुरक्षा बलों द्वारा शोषण के शिकार हुए 58 परिवारों के सदस्यों से बातचीत के आधार पर नई रिपोर्ट तैयार की गई है।

संस्था ने इससे संबंधित वीडियो भी जारी किया। एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया की शोध प्रबंधक दिव्या अय्यर ने कहा कि पीड़ित परिवार के सदस्यों को उनके मामलों की स्वीकृति के बारे में नहीं बताया गया। संगठन ने अफस्पा हटाने की मांग की है।
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