आपातकालीन स्थिति में फेंसिंग से निकलने में भी होती है मुश्किल
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15 अगस्त 2015 को जब सारा देश आजादी के जश्न में डूबा था, तो उस वक्त लाइन आफ कंट्रोल की फेंसिंग के अंदर रहने वाले 14 गांवों के लोग गोलाबारी के धमकों के बीच अपने परिवार को बचाने में लगे हुए थे। बालाकोट सेक्टर में सेना की फेंसिंग के अंदर यह ऐसे गांव हैं, जहां स्कूल और अस्पताल के लिए उन्हें फेंसिंग से बाहर आना पड़ता है। न सड़क है और न ही किसी तरह के वाहन की व्यवस्था।
15 अगस्त को पाकिस्तान की गोलाबारी का शिकार होने वाले बसुनी गांव में रहने वाले सरपंच करमातुल्ला की नन्ही बेटी शमीज कौसर कहती है कि वह और उनके गांव के बच्चे स्कूल में पढ़ना चाहते हैं, लेकिन वह फेंसिंग के अंदर कैद हैं।
हमीरपुर के पास सेना की ओर से बनाए गए पाइनवुड स्कूल ने उन्हें शिक्षा का मौका तो दिया है, लेकिन गांव से आने-जाने में ही काफी वक्त लग जाता है। दसवीं कक्षा में 80 फीसदी अंक हासिल करने वाली कौसर कहती है कि स्कूल में ही वह पढ़ाई कर पाते हैं। गांव में उन्हें ट्यूशन तक की सुविधा नहीं है।