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एलओसी फेंसिंग की फांस में फंसे जम्मू कश्मीर के 14 गांव 

Sun, 13 Mar 2016 12:35 PM IST
भूपेंदर सिंह भाटिया, अमर उजाला/ जम्मू

सार

  • बालाकोट सेक्टर में सेना की फेंसिंग के अंदर यह ऐसे गांव हैं, जहां स्कूल और अस्पताल के लिए उन्हें फेंसिंग से बाहर आना पड़ता है।
  • हमीरपुर के पास सेना की ओर से बनाए गए पाइनवुड स्कूल ने उन्हें शिक्षा का मौका तो दिया है, लेकिन गांव से आने-जाने में ही काफी वक्त लग जाता है।
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आपातकालीन स्थिति में फेंसिंग से निकलने में भी होती है मुश्किल - फोटो : PTI
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विस्तार
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15 अगस्त 2015 को जब सारा देश आजादी के जश्न में डूबा था, तो उस वक्त लाइन आफ कंट्रोल की फेंसिंग के अंदर रहने वाले 14 गांवों के लोग गोलाबारी के धमकों के बीच अपने परिवार को बचाने में लगे हुए थे। बालाकोट सेक्टर में सेना की फेंसिंग के अंदर यह ऐसे गांव हैं, जहां स्कूल और अस्पताल के लिए उन्हें फेंसिंग से बाहर आना पड़ता है। न सड़क है और न ही किसी तरह के वाहन की व्यवस्था। 
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15 अगस्त को पाकिस्तान की गोलाबारी का शिकार होने वाले बसुनी गांव में रहने वाले सरपंच करमातुल्ला की नन्ही बेटी शमीज कौसर कहती है कि वह और उनके गांव के बच्चे स्कूल में पढ़ना चाहते हैं, लेकिन वह फेंसिंग के अंदर कैद हैं। 

हमीरपुर के पास सेना की ओर से बनाए गए पाइनवुड स्कूल ने उन्हें शिक्षा का मौका तो दिया है, लेकिन गांव से आने-जाने में ही काफी वक्त लग जाता है। दसवीं कक्षा में 80 फीसदी अंक हासिल करने वाली कौसर कहती है कि स्कूल में ही वह पढ़ाई कर पाते हैं। गांव में उन्हें ट्यूशन तक की सुविधा नहीं है। 
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आपातकालीन स्थिति में फेंसिंग से निकलने में भी होती है मुश्किल

- फोटो : PTI
गांव के ही जावेद का कहना है कि शाम सात बजे के बाद उन्हें अपने घरों में कैद हो जाना पड़ता है। सेना की हिदायत होती है कि घरों से बाहर निकलने पर दुश्मन गोलाबारी कर सकते हैं। यदि गांव का कोई बीमार हो जाए तो उन्हें रात के समय बाहर भी नहीं ले जाया जा सकता। 

आपातकालीन स्थिति में फेंसिंग से निकलने में भी समस्या होती है, क्योंकि फेंसिंग खुलवाने के लिए उन्हें सेना के उच्च अफसरों की मंजूरी का इंतजार करना पड़ता है। हालांकि सेना ने इन गांवों के लोगों की जिंदगी को कुछ हद तक आसान किया है। सेना की ओर से गांवों में कई सुविधाएं प्रदान की गई हैं, लेकिन यहां के लोग फेंसिंग के बाहर अन्य स्थान पर विस्थापित करने के पक्ष में हैं। 


उनका कहना है कि फेंसिंग के बाहर उन्हें सरकार जगह मुहैया करवाए तो वह भी सामान्य नागरिकों की तरह जिंदगी जी सकते हैं। गांव का कोई बुजुर्ग बीमार हो जाए तो उन्हें उठाकर बाहर लाना भी काफी मुश्किल होता है। खेती और पशुपालन पर ही मुख्य रूप से निर्भर गांवों के लोगों को इस बात का भी डर होता है कि कब उनके खेत और पशु गोलाबारी का शिकार हो जाएंगे, पता नहीं। 
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