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पवित्रता और विशुद्ध प्रेम का है गुरु-शिष्य संबंध

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उधमपुर। गुरु-शिष्य का संबंध पवित्रता और विशुद्ध प्रेम का है। परस्पर दोनों एक-दूसरे से प्रेम करते हैं। यह वासना का नहीं बल्कि साधना, आराधना, उपासना का संबंध है। यह भोग का नहीं योग और परमार्थ का संबंध है। यह ज्ञान संत सुभाष शास्त्री ने ओमाला क्षेत्र के अखंड परमधाम आश्रम में गुरु पूर्णिमा (व्यास पूर्णिमा) के उपलक्ष्य में हुए सत्संग में दिया। इस दौरान उन्होंने संगत को समझाते हुए कहीं।
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उन्होंने कहा कि गुरु पूर्णिमा (व्यास पूर्णिमा) का विशुद्ध अध्यात्मिक उत्सव पूरे विश्व में मनाया जाता है। उन्होंने कहा कि जहां स्वार्थ है वहां परमार्थ नहीं होता। गुरु पूजा में शिष्य चाहता है मैं गुरु को क्या भेंट दूं। तन, मन, धन से क्या सेवा करूं कि सद्गुरु मुझ पर प्रसन्न हो जाएं। वहीं गुरु सोचते हैं कि हम शिष्य को क्या दें, क्या लुटाएं जिससे शिष्य का कल्याण हो जाए। उन्होंने कहा कि सद्गुरु सदैव यही चाहते हैं कि जैसी दृष्टि, जैसी निष्ठिा, जैसी समझ, जैसा बोध और जो आनंद मुझे मिला है वैसा मेरे शिष्य को भी प्राप्त हो जाए। गुरु अपने जैसे शिष्य को देखकर प्रसन्न होते हैं। जैसी भक्ति प्रभु के प्रति होती है वैसी ही गुरु के प्रति भी हो। गुरु भगवान है और भगवान ही गुरु है।
उन्होंने कहा कि अध्यात्म का श्रीगणेश सद्गुरु से ही प्रारंभ होता है और जब जीवन में अध्यात्म का विकास होता है तो फिर शिष्य का चहुंमुखी विकास होता है। अध्यात्म पथ पर सद्गुरु ही अग्रसर करते हैं तभी तो प्रभु भी खुद की बजाय सर्वप्रथम गुरु को पूजने की बात करते हैं। शास्त्री ने समझाया कि मां हमारी प्रथम गुरु होती है। जीवन के हर विषय के लिए गुरु होते हैं। उन्होंने कहा कि एक ही सामर्थ्य गुरु में यह सब गुण भी हो सकते हैं। मनुष्यों में मनुष्य मात्र का गुरु ब्रह्मज्ञानी सन्यासी है। चारों वर्णों का गुरु ब्रह्मज्ञानी ब्राह्मण है। अक्षरों, वर्णों में ओंकार गुरु है। रेंगने वालों का सर्प गुरु, हिंसक जानवरों का गुरु शेर, जलचरों का कछुआ गुरु, आदि-आदि धर्म ग्रंथों का गुरु श्रीमद्भागवत गीता है। जो गीता को ठीक से समझ लेता है वे सारे ग्रंथों का सार निकाल सकता है, अर्थात सबको समझ सकता है। धर्म ग्रंथों में जो भी अच्छी बातें हैं, वे लगभग भगवान वेद व्यास द्वारा कहीं गई हैं।
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