कठुआ। अगर किसी के पास मौजूद किसी वस्तु का उसे अभिमान है, तो यह समझ लो कि उस वस्तु का आधार अधर्म है। क्योंकि, धर्म के पथ पर चलने वाले के स्वभाव में अभिमान नहीं आ सकता। जीवित प्राणी में लचीलापन होता है। इसके विपरीत मुर्दा अकड़ा हुआ होता है। इसलिए, अभिमान को त्यागना आवश्यक है। यह बात संत सुभाष शास्त्री ने शहर के शिवा नगर स्थित बाबा बड़भाग सिंह आश्रम में आयोजित सत्संग के दौरान कहीं।
उन्होंने श्रद्धालुओं का मार्गदर्शन करते हुए कहा कि इतिहासकार कहते हैं कि रावण और सिकंदर जैसे आततायी जब इस धरती पर चलते थे तो धरती कांपती थी। लेकिन, इसके विपरीत सच्चाई यह है कि धरती कांपती नहीं, बल्कि उनकी अकड़ पर हंसती थी। इस तरह के कर्म भले ही उसे कुछ दिनों के लिए वयस्त रखें, लेकिन एक दिन उसे खाली हाथ इसी मिट्टी में आना पड़ता है।
शास्त्री जी ने कहा कि सिकंदर विश्व विजेता था, और रावण ने अपनी मृत्यु को अपने सिरहाने बांधकर रखा था। वे दोनों जब मृत्यु को प्राप्त हुए तो उनको इस धरती पर याद करने वाला भी कोई नहीं है। क्योंकि, दोनों स्वभाव से अति अभिमानी थे और उनका यही अभिमान उनके अंत का कारण बना। लिहाजा हमें अपने जीवन में अभिमान से बचना होगा।
अपने प्रवचन के दौरान शास्त्री जी ने कहा कि मनुष्य के अभिमान का मुख्य कारण उसका मायावी संसार से जुड़ना है। लेकिन, सही मायने में हमारे इस जीवन में संसार का कोई स्थान नहीं है। यदि जीवन में कुछ मूल्यवान है, तो वह हम स्वयं हैं। क्योंकि, स्वयं की सत्ता से बढ़कर संसार में दूसरी कोई मूल्यवान वस्तु नहीं है। जो इसे पाता है, वह सब कुछ पा लेता है। और, जो खो देता है, वह सब कुछ खो देता है। मनुष्य और दानव दोनों के ही जीवन का मकसद स्वयं को जानना है। हमें स्वयं को जानने का प्रयास करना है। जब हम स्वयं को जान जाएंगे, तो हमारे स्वभाव में लचीलापन आ जाएगा, जो हमें अभिमान से बचाएगा। यही हमारे कल्याण के मार्ग को प्रशस्त बनाएगा। सत्संग का समापन सामूहिक आरती के साथ किया गया। वहीं, अंत में विशाल भंडारे का अयोजन हुआ, जिसमें भारी संख्या में भक्तों ने प्रसाद ग्रहण किया।
शहर के शिवानगर में आयोजित सत्संग के दौरान प्रवचन करते संत सुभाष शास्त्री, संवाद।- फोटो : KATHUA