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तीन सितंबर को छड़ी के साथ निभाई जाएगी कैलाश कुंड यात्रा की परंपरा

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कठुआ। भाद्रपद माह की कृष्ण पक्ष सप्तमी से वार्षिक कैलाश वासुकी कुंड की यात्रा का आगाज होने जा रहा है। तीन सितंबर को आयोजित होने वाली कैलाश कुंड यात्रा पर इस बार भी कोरोना का साया है।
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प्रशासन ने साफ किया है कि छड़ी की परंपरा को भद्रवाह से निभाते हुए मात्र 25 भक्तों को ही यात्रा की अनुमति दी जाएगी। इसी तरह बनी की ओर से चलने वाली कैलाश कुंड यात्रा में भी सिर्फ छड़ी के साथ सीमित भक्तों को भी यात्रा पर जाने की अनुमति रहेगी। अन्य भक्त इस बार भी कैलाश कुंड के दर्शनों से वंचित रह जाएंगे।
छत्रगलां टॉप और बेहाली के रास्ते कैलाश कुंड तक यात्रा में भक्त हर साल सम्मिलित होते रहे हैं। आस्था के सरोवर में डुबकी लगाने के लिए हर साल हजारों भक्त दुर्गम पहाड़ों पर मीलों पैदल सफर कर वहां पहुंचते हैं। भक्त सर्पराज भगवान वासुकीनाग को समर्पित इस यात्रा में हर साल चंबा, कठुआ, उधमपुर, डोडा व जम्मू के साथ-साथ पड़ोसी राज्यों से हजारों भक्त कैलाश कुंड यात्रा में भाग लेते हैं।
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वासुकी कुंड के नाम से भी प्रसिद्ध है कैलाश कुंड
कैलाश कुंड (कपलाश) को वासुकी कुंड भी कहा जाता है। हिंदू मान्यता के अनुसार यह कुंड नागराज वासुकी का वास है। समुद्र तल से 14500 फीट की ऊंचाई पर स्थित इस शीतल और स्वच्छ जल के बड़े कुंड में पवित्र स्नान के लिए भारी संख्या में लोग पहुंचते रहे हैं। श्रावण पूर्णिमा के 14वें दिन शुरू होने वाली यात्रा में विभिन्न यात्रा मार्ग से आने वाले भक्त भजन-कीर्तन व जयघोष के साथ ढक्कू की सुन्दर धुन पर नृत्य करते हुए पहुंचते हैं। मुख्य यात्रा भद्रवाह के गाठा से शुरू होती है, जहां भगवान वासुकी नाग का प्राचीन मंदिर है। लोग इसे कुलदेव के रूप में पूजते हैं। बनी के डुग्गन का वासुकी नाग मंदिर पनियालग के वासुकी नाग मंदिर से करीब चार दशक पहले बनाया गया माना जाता है।
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