भारत में राजनीति, उद्योग-अर्थव्यवस्था, शिक्षा, नौकरशाही और सेना जैसे क्षेत्रों में महिलाओं की भागीदारी लगातार बढ़ रही है। खुद महिलाओं ने भी इन क्षेत्रों में खुद को शून्य से आगे बढ़ाते हुए स्थापित किया है। इन क्षेत्रों का विश्लेषण करने पर सामने आया कि देश ने अलग-अलग क्षेत्रों में महिलाओं की भागीदारी यानी समावेशन को बेहतर तो किया है, साथ ही भविष्य में इनमें सुधारों की रफ्तार बढ़ाने के भी इंतजाम किए हैं। हालांकि कुछ क्षेत्रों में अब भी काफी काम करने की जरूरत सामने आई है। इस वर्ष अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस की थीम भी 'समावेश को प्रेरित' करना है, जो भारत के प्रयासों से जुड़ रहा है।
लोकतंत्र: 1951 में 22 महिला सांसदाें से मौजूदा लोकसभा में 78 तक, 33 प्रतिशत आरक्षण से बड़े सुधारों की शुरुआत
सेना: 8 शाखाओं में महिला सैन्य अफसरों को स्थायी कमीशन, वर्ष 2019 के बाद बदल गया परिदृश्य
1950 में आर्मी एक्ट बना तो महिलाओं को नियमित कमीशन के लिए अयोग्य माना गया। हालांकि इसमें केंद्र सरकार के बताए कुछ अपवाद जरूर रखे गए। 1958 में आर्मी मेडिकल कोर बनी, जो महिलाओं को नियमित कमीशन देने वाली सेना की पहली यूनिट साबित हुई। वीमन स्पेशल एंट्री स्कीम के तहत 1992 में संसद ने महिला सैन्य अधिकारियों को सेना में शामिल करने की राह खोली। पर, स्थायी कमीशन साल 2019 में जाकर मिला, जब केंद्र सरकार से सेना की 8 शाखाओं में महिला सैन्य अधिकारियों को इसके लिए अनुमति दी गई।
सेनाओं में बढ़ी ताकत
स्टेम में बराबरी से दूर नहीं छात्राएं
मेडिकल: देश के कुल चिकित्सकों में 29 प्रतिशत इस समय महिलाएं, आधी से अधिक महिलाएं साबित कर रहीं कार्यकुशलता
साल 2021 में आई ऑल इंडिया सर्वे ऑफ हायर एजूकेशन ने दावा किया कि 2012 में मेडिकल व अन्य चिकित्सा संबंधित पाठ्यक्रमों में 63.41 प्रतिशत छात्राएं थीं, 2020 में यह संख्या 66.84 पहुंची। वहीं देश के कुल चिकित्सकों में 29 प्रतिशत इस समय महिलाएं है। हालांकि चिकित्सा संस्थानों व संगठनों में नेतृत्वकर्ता के रूप में उनका अनुपात 18 प्रतिशत ही है, यह वैश्विक औसत 25 प्रतिशत से भी कम है।
नर्सिंग में 80 प्रतिशत स्टाफ महिलाएं हैं, जो इस क्षेत्र में महिलाओं की कार्यकुशलता को साबित करता है। हेल्थकेयर सेक्टर में कुल स्टाफ में 70 प्रतिशत भागीदारी महिलाओं की मानी जा रही है। पीजी स्तर पर भी 55.5 प्रतिशत छात्राएं थीं, इससे 10 साल पहले आंकड़ा 42.69 प्रतिशत था।
(स्रोत : स्वास्थ्य मंत्रालय, संगठनों की रिपोर्ट्स)
शिक्षा: साक्षरता बढ़ी तो 50 गुना बढ़ गईं महिला शिक्षक
यूनेस्को के अनुसार 1951 में देश में महिला शिक्षकों की संख्या केवल 82,000 थी। 2022 की यूनिफाइड डिस्ट्रिक्ट इन्फॉर्मेशन सिस्टम फॉर एजुकेशन (यूडीआईएसई) रिपोर्ट के अनुसार यह संख्या अब 48.75 लाख से अधिक हो चुकी है। साल 2014-15 के मुकाबले स्कूलों में लड़कियों का नामांकन 31% बढ़ा। खास बात है कि इसमें वंचित समुदायों की वृद्धि और तेज रही। इसके नतीजे भावी जनगणना के परिणामों में भी देखने को मिल सकते हैं। भारत में 1951 में महिला साक्षरता दर 8.86% थी, 2011 में 65.46% हो गई।
(स्रोत : यूनेस्को, नीति आयोग रिपोर्ट्स और राज्यसभा में दिए उत्तर।)
उद्योग जगत: बाकी क्षेत्रों से बेहतर मगर सुधार की जरूरत
भारत में बाकी क्षेत्रों के मुकाबले उद्योग जगत में महिलाओं का प्रतिनिधित्व बेहतर है। 2022 में महिला उद्यमियों को सरकार का सहयोग नाम से आई नीति आयोग की रिपोर्ट दावा करती है कि सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम दर्जे के 20 प्रतिशत उद्योग (एमएसएमई) महिलाएं चला रही हैं। संख्या के लिहाज से यह करीब 1.23 करोड़ है। हालांकि, इनमें से 99% उद्योग सूक्ष्म स्तर के हैं। स्टार्ट-अप में उनकी हिस्सेदारी महज 10 प्रतिशत यानी एमएसएमई से आधी है। कुछ बड़े स्टार्ट-अप के अपवाद छोड़ दें, तो महिलाओं का प्रतिनिधित्व और बाजार में हिस्सेदारी सीमित है। इसमें सुधार लाने होंगे।
नेतृत्वकर्ता भी कम...सिर्फ 8 फीसदी सीईओ महिलाएं
नौकरशाही: प्रशासनिक पदों पर महिला प्रतिनिधित्व के लिए सुधार आवश्यक