फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स

सीमा पर 'पछुआ हवा और सरकंडे' की कहानी: बीएसएफ 'दरांती और बाल्टी' से देती है पड़ोसी की 'ना-पाक' हरकत का जवाब

जितेंद्र भारद्वाज
Updated Mon, 27 Sep 2021 05:00 PM IST

सार

पूर्व एडीजी एसके सूद बताते हैं, पंजाब और जम्मू से लगती सीमा पर पछुआ पवन और सरकंडे की दिक्कत है। बॉर्डर पर ऐसा इलाका लगभग 450 किलोमीटर लंबा है। अधिकांश जगहों पर जवानों को ही 'वाइल्ड एलीफेंट ग्रास' काटनी पड़ती है। इसकी कटाई के दौरान बीएसएफ सावधानी बरतती है। चूंकि ये इतनी घनी और लंबी होती है कि कोई भी व्यक्ति या पशु वहां आसानी से छिप सकता है...
विज्ञापन
विज्ञापन
बीएसएफ (फाइल फोटो) - फोटो : पीटीआई

सीमा सुरक्षा बल 'बीएसएफ' के जवान बंदूक की गोली से पाकिस्तानी रेंजर्स को कठोर जवाब देते रहे हैं। प्राकृतिक बाधाएं आती हैं, लेकिन बीएसएफ अपनी ड्यूटी पर अडिग रहती है। खासतौर से, जम्मू और पंजाब से लगती अंतरराष्ट्रीय सीमा पर 'पछुआ पवन और सरकंडे' की कहानी लंबे समय से चल रही है। हालांकि पछुआ पवन और सरकंडे, ये दोनों ही 'सीमा सुरक्षा बल' के लिए मुसीबत बन जाते हैं। जब यह हवा चलती है तो पाकिस्तानी रेंजर्स ना-पाक हरकत करने लगते हैं। बीएसएफ के पूर्व डीजी संजीव कृष्ण सूद ने अपनी किताब 'बीएसएफ'- 'द आइज एंड ईयर्स ऑफ इंडिया' में लिखा है, जब पछुआ पवन चलती है तो पाकिस्तानी वहां पर आग जला देते हैं। चूंकि वह हवा पश्चिम दिशा से पूरब की तरफ चलती है, इसलिए वह चंद मिनटों में भारतीय सीमा की ओर बढ़ने लगती है।

बीएसएफ के जवान बाल्टी लेकर आग बुझाने के लिए दौड़ते हैं। सरकंडे, जिन्हें 'वाइल्ड एलीफेंट ग्रास' कहा जाता है, उसकी आड़ में पड़ोसी की तरफ से घुसपैठिये, स्मगलर और संदिग्ध गतिविधियों को अंजाम देने वाली आईएसआई समर्थित बॉर्डर एक्शन टीम 'बैट' हरकत करती है। इसके लिए बीएसएफ जवान दरांती की मदद से सरकंडे काटते हैं। एसके सूद कहते हैं कि अगर स्थानीय प्रशासन से बीएसएफ को फंड मिल जाए तो वे उपकरण खरीदकर सरकंडे काट सकते हैं। पानी के टैंकर द्वारा प्रभावी तरीके से आग पर काबू पा सकते हैं।



पूर्व एडीजी एसके सूद बताते हैं, पंजाब और जम्मू से लगती सीमा पर पछुआ पवन और सरकंडे की दिक्कत है। अगर दक्षिण पंजाब का कुछ हिस्सा छोड़ दें तो बाकी जगह पर सरकंडा खड़ा रहता है। बॉर्डर पर ऐसा इलाका लगभग 450 किलोमीटर लंबा है। जम्मू से लगती अंतरराष्ट्रीय सीमा रेखा 199 किलोमीटर लंबी है। यहां भी सरकंडा खूब उगता है। कुछ जगह ऐसी हैं जहां फेंसिंग और अंतरराष्ट्रीय सीमा रेखा के बीच खेती होती है। स्थानीय किसान वहां फसल बोते हैं। बीएसएफ, सरकंडे काटने में कई बार उनकी मदद ले लेती है। अधिकांश जगहों पर जवानों को ही 'वाइल्ड एलीफेंट ग्रास' काटनी पड़ती है। इसकी कटाई के दौरान बीएसएफ सावधानी बरतती है। चूंकि ये इतनी घनी और लंबी होती है कि कोई भी व्यक्ति या पशु वहां आसानी से छिप सकता है। दो तीन साल पहले बैट ने सरकंडों की ओट में बीएसएफ के एक जवान पर हमला कर दिया था। कई बार पाकिस्तानी रेंजर्स भी ऐसी हरकत करते हैं। वे अपनी तरफ के सरकंडे काटने में ना-नुकर करते हैं।

विज्ञापन

बीएसएफ (फाइल फोटो) - फोटो : पीटीआई
सीमा सुरक्षा बल 'बीएसएफ' के जवान बंदूक की गोली से पाकिस्तानी रेंजर्स को कठोर जवाब देते रहे हैं। प्राकृतिक बाधाएं आती हैं, लेकिन बीएसएफ अपनी ड्यूटी पर अडिग रहती है। खासतौर से, जम्मू और पंजाब से लगती अंतरराष्ट्रीय सीमा पर 'पछुआ पवन और सरकंडे' की कहानी लंबे समय से चल रही है। हालांकि पछुआ पवन और सरकंडे, ये दोनों ही 'सीमा सुरक्षा बल' के लिए मुसीबत बन जाते हैं। जब यह हवा चलती है तो पाकिस्तानी रेंजर्स ना-पाक हरकत करने लगते हैं। बीएसएफ के पूर्व डीजी संजीव कृष्ण सूद ने अपनी किताब 'बीएसएफ'- 'द आइज एंड ईयर्स ऑफ इंडिया' में लिखा है, जब पछुआ पवन चलती है तो पाकिस्तानी वहां पर आग जला देते हैं। चूंकि वह हवा पश्चिम दिशा से पूरब की तरफ चलती है, इसलिए वह चंद मिनटों में भारतीय सीमा की ओर बढ़ने लगती है।

बीएसएफ के जवान बाल्टी लेकर आग बुझाने के लिए दौड़ते हैं। सरकंडे, जिन्हें 'वाइल्ड एलीफेंट ग्रास' कहा जाता है, उसकी आड़ में पड़ोसी की तरफ से घुसपैठिये, स्मगलर और संदिग्ध गतिविधियों को अंजाम देने वाली आईएसआई समर्थित बॉर्डर एक्शन टीम 'बैट' हरकत करती है। इसके लिए बीएसएफ जवान दरांती की मदद से सरकंडे काटते हैं। एसके सूद कहते हैं कि अगर स्थानीय प्रशासन से बीएसएफ को फंड मिल जाए तो वे उपकरण खरीदकर सरकंडे काट सकते हैं। पानी के टैंकर द्वारा प्रभावी तरीके से आग पर काबू पा सकते हैं।

पूर्व एडीजी एसके सूद बताते हैं, पंजाब और जम्मू से लगती सीमा पर पछुआ पवन और सरकंडे की दिक्कत है। अगर दक्षिण पंजाब का कुछ हिस्सा छोड़ दें तो बाकी जगह पर सरकंडा खड़ा रहता है। बॉर्डर पर ऐसा इलाका लगभग 450 किलोमीटर लंबा है। जम्मू से लगती अंतरराष्ट्रीय सीमा रेखा 199 किलोमीटर लंबी है। यहां भी सरकंडा खूब उगता है। कुछ जगह ऐसी हैं जहां फेंसिंग और अंतरराष्ट्रीय सीमा रेखा के बीच खेती होती है। स्थानीय किसान वहां फसल बोते हैं। बीएसएफ, सरकंडे काटने में कई बार उनकी मदद ले लेती है। अधिकांश जगहों पर जवानों को ही 'वाइल्ड एलीफेंट ग्रास' काटनी पड़ती है। इसकी कटाई के दौरान बीएसएफ सावधानी बरतती है। चूंकि ये इतनी घनी और लंबी होती है कि कोई भी व्यक्ति या पशु वहां आसानी से छिप सकता है। दो तीन साल पहले बैट ने सरकंडों की ओट में बीएसएफ के एक जवान पर हमला कर दिया था। कई बार पाकिस्तानी रेंजर्स भी ऐसी हरकत करते हैं। वे अपनी तरफ के सरकंडे काटने में ना-नुकर करते हैं।

सरकंडों की आड़ में घुसपैठ

बतौर एसके सूद, जब सीमा पार से फायरिंग होती है तो घुसपैठिये और स्मगलर, इन्हीं सरकंडों का फायदा उठाकर भारतीय सीमा में घुसने का प्रयास करते हैं। सरकंडे काटने वाले बीएसएफ जवानों के साथ पेट्रोल पार्टी रहती है। वह पाकिस्तान की नापाक हरकत पर नजर रखती है। पछुआ पवन जब चलती है तो पाकिस्तानी अंतरराष्ट्रीय सीमा रेखा के आसपास सूखी घास में आग लगाकर भाग जाते हैं। चूंकि पछुआ का जोर भारतीय सीमा की तरफ रहता है, इसलिए वह तेजी से बढ़ती हुई भारतीय क्षेत्र के खेतों तक फैल जाती है। साल में बहुत से ऐसे दिन भी होते हैं, जब किसान खेत पर नहीं होता। ऐसी स्थिति में बीएसएफ के पास जो संसाधन जैसे बाल्टी आदि मौजूद होते हैं, उनकी मदद से आग पर काबू पाने का प्रयास किया जाता है। एसके सूद कहते हैं, सीमा पर जहां सरकारी जमीन है, कम से कम वहां के लिए स्थानीय जिला प्रशासन को आर्थिक मदद देनी चाहिए। बीएसएफ को अगर फंड मिल जाता है तो वह मशीनरी और पानी के टैंकर खरीद सकती है। सिविलियन मजदूरों की मदद से सरकंडे हटाए जा सकते हैं। बीएसएफ के एक अधिकारी बताते हैं कि वहां सिविलियन मजदूरों को इसलिए नहीं ले जाते, क्योंकि सीमा पार से फायरिंग का खतरा बना रहता है। बीएसएफ द्वारा आईबी तक का इलाका साफ रखा जाता है।
और पढ़ें...
विज्ञापन
विज्ञापन
Next