अलकायदा के शार्प शूटर और कभी ओसामा बिन लादेन के दाहिने हाथ रहे अमीन उल हक ने शाम को काबुल में एंट्री। जिस तरीके से अमीन उल हक का काबुल में एंट्री के वक्त स्वागत किया गया उससे एक बात स्पष्ट हो गई है कि अलकायदा और तालिबान के रिश्ते कैसे हैं। क्योंकि ओसामा बिन लादेन के दाहिने हाथ रहे हक के स्वागत ने तालिबान के लड़ाको के साथ-साथ हक्कानी नेटवर्क की सुरक्षा का पूरा घेरा उसके साथ था। तालिबानी लड़ाके हक के साथ न सिर्फ सेल्फी ले रहे थे बल्कि फोटो भी खिंचवा रहे थे। रक्षा मामलों के विशेषज्ञ शर्मा कहते हैं कि अमीन उल हक का अफगानिस्तान की जमीन पर आने का मतलब साफ तौर से अलकायदा का फिर से सिर उठाना ही है। वे कहते हैं कि अमेरिका के अफगानिस्तान छोड़ते ही यहां की लगती हुई सरहदों वाले मुल्कों से आतंकवाद की फसल बोई जानी शुरू हो जाएगी। हक्कानी नेटवर्क, आईएस खोरासन, अलकायदा और पाकिस्तान तालिबान के आतंकवादी घात लगाकर तालिबान को मिले अमेरिकी हथियारों को हड़पने के जुगाड़ में लगे हुए हैं।
विदेश मामलों के जानकारों का कहना है जिस तरीके से अमेरिका ने अफगानिस्तान को सब कुछ संयमित तरीके से चलाने की नसीहत दी है वह एक बहुत बड़ा संदेश है। खुफिया विभाग में काफी लंबे वक्त तक मध्य एशिया के देशों में रहकर अपनी सेवाएं देने वाले एक वरिष्ठ सेवानिवृत्त अधिकारी बताते हैं कि अमेरिका ने अफगानिस्तान को जो नसीहत दी है दरअसल वह दूर से ही सही लेकिन बताती है कि तालिबान को सत्ता चलाने के लिए पूरी ताकत अमेरिका देता रहेगा। कहने को तो अमेरिका ने काबुल से अपना दूतावास शिफ्ट कर लिया है लेकिन कतर से रहकर अफगानिस्तान में होने वाली हर हलचल पर नजर रखेगा। दरअसल अफगानिस्तान में सत्ता बदलने से लेकर तालिबान को सत्ता हासिल होने तक की पूरी रणनीति दोहा की जमीन पर तैयार की गई है। इसलिए यह जमीन अफगानिस्तान की निगरानी के लिए सबसे मुफीद भी है।
विशेषज्ञों का कहना है कि अमेरिका के ऊपर अफगानिस्तान की जमीन छोड़ने का दबाव तो जरूर था लेकिन दूर से बैठ कर उसकी मॉनिटरिंग करना और हस्तक्षेप करना उसकी न सिर्फ मजबूरी होगी बल्कि जरूरत भी होगी। विशेषज्ञों का कहना है की अमेरिका ने अपने करोड़ों डॉलर के अपने रक्षा उपकरणों को ऐसे ही अफगानिस्तान में नहीं छोड़ दिया। इसके पीछे बहुत से राज हैं। अमेरिका ने अफगानिस्तान में लंबे समय तक सैन्य कार्रवाई को देखने वाले दूसरे नंबर के सबसे बड़े अधिकारी को दोहा मैं तैनात भी कर दिया है। विशेषज्ञों का कहना है काबुल और कतर के अमेरिकी दूतावास का कनेक्शन बना रहे इसीलिए पेंटागन के रणनीतिकारों की पूरी टीम इसकी निगरानी भी कर रही है।