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उत्तर प्रदेश चुनाव: गैर-भाजपाई वोटरों का विकल्प कौन बनेगा? सपा कमजोर हुई तो क्या कांग्रेस बनेगी लोगों की पहली पसंद

सार

यूपी के संदर्भ में एक बात ध्यान देने योग्य है। समाजवादी पार्टी के नेता मुलायम सिंह की राजनीति रही हो या बसपा के संस्थापक कांशीराम की, दोनों ही नेताओं ने सड़कों पर संघर्ष करके अपनी जमीन बनाई। लेकिन जनहित के मुद्दे पर इन दोनों ही दलों का कोई बड़ा जनआंदोलन पिछले पांच साल में दिखाई नहीं दिया। पूरे पांच साल तक प्रदेश में विपक्ष की अनुपस्थिति महसूस की गई...
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उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2022 - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के तमाम एक्जिट पोल्स में योगी आदित्यनाथ सरकार की वापसी होने की संभावना जताई गई है। समाजवादी पार्टी इस चुनाव में गैर-भाजपाई वोटरों की पहली पसंद बनकर उभरती हुई दिखाई पड़ रही है। पूरे चुनाव में उसे समाज के उन विभिन्न वर्गों का खुला साथ मिलता दिखा, जो किसी भी कारण से भाजपा से नाराज थे और एक गैर-भाजपाई सरकार के विकल्प के लिए उसकी ओर देख रहे थे। लेकिन इन तमाम वर्गों के समर्थन के बाद भी वह भाजपा को रोक पाने में नाकाम होती दिखाई पड़ रही है। यदि एक्जिट पोल के मुताबिक ही चुनाव परिणाम आते हैं तो इससे गैर-भाजपाई विकल्प की तलाश में समाजवादी पार्टी की ओर मुड़ने वाले वोटरों को निराशा हाथ लग सकती है। बड़ा प्रश्न है कि क्या इस स्थिति में वोटर गैर-भाजपाई विकल्प के लिए किसी अन्य पार्टी की तरफ रुख कर सकते हैं? क्या कांग्रेस लोगों की इस उम्मीद पर खरा उतरने के लिए तैयार है?

सड़क की राजनीति करना भूलीं सपा-बसपा

यूपी के संदर्भ में एक बात ध्यान देने योग्य है। समाजवादी पार्टी के नेता मुलायम सिंह की राजनीति रही हो या बसपा के संस्थापक कांशीराम की, दोनों ही नेताओं ने सड़कों पर संघर्ष करके अपनी जमीन बनाई। लेकिन जनहित के मुद्दे पर इन दोनों ही दलों का कोई बड़ा जनआंदोलन पिछले पांच साल में दिखाई नहीं दिया। पूरे पांच साल तक प्रदेश में विपक्ष की अनुपस्थिति महसूस की गई। कोरोना काल हो या महंगाई का मुद्दा, बेरोजगारी हो या किसानों की समस्या, सपा-बसपा दोनों ही प्रमुख दल इन जनहित के मुद्दों पर सड़कों पर नहीं उतरे। माना जा रहा है कि इससे उनका जनता से संबंध कमजोर हुआ।

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वहीं, कांग्रेस पिछले दो साल से लगातार सड़कों पर उतरती रही। कांग्रेस कार्यकर्ता कोरोना काल में लगातार लोगों की मदद के लिए खड़े दिखाई पड़े। प्रियंका गांधी और उत्तर प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अजय कुमार लल्लू लगातार सरकार के निशाने पर रहे। इसी संघर्ष के कारण अजय कुमार लल्लू को जेल तक जाना पड़ा। लेकिन इसके बाद भी कांग्रेस लगातार सरकार पर हमलावर बनी रही। इसका उसे फायदा भी हुआ और लोगों से उसका कनेक्ट मजबूत हुआ।

राजनीतिक विशेषज्ञ मानते हैं कि प्रियंका गांधी की टीम ने सरकार के विरोध में जो माहौल तैयार किया, उसका लाभ समाजवादी पार्टी को मिला। इसका बड़ा कारण यह है कि लोग अपना वोट खराब नहीं करना चाहते थे, लोग किसी भी कीमत पर सरकार में परिवर्तन करना चाहते थे। लेकिन कांग्रेस को भाजपा का मुकाबला करने में सक्षम न मानकर ही लोगों ने सपा को समर्थन दिया। यानी प्रियंका गांधी की मेहनत का फल भी सपा के खाते में जुड़ गया।

अब मजबूत हो सकती है कांग्रेस

राजनीतिक विश्लेषक सुनील पांडेय ने अमर उजाला से कहा कि बसपा के कमजोर होने से उसके वोटरों में भी बिखराव हुआ। उसका एक वोटर वर्ग सपा के साथ, तो कुछ फीसदी वोटर भाजपा के पास चला गया। यहां तक कि कांग्रेस का एक वोटर वर्ग भी सपा के पास चला गया। इसका बड़ा कारण यह है कि लोग किसी भी कीमत पर एक गैर-भाजपाई विकल्प की सरकार बनाना चाहते थे।

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लेकिन अब, जबकि यह लग रहा है कि सपा लोगों की उम्मीदों पर खरा उतर नहीं पाई है, और प्रदेश में बसपा भी कमजोर हो चुकी है, गैर-भाजपाई विकल्प के लिए वोटर कांग्रेस की ओर मुड़ सकता है। लेकिन इसके लिए उसे मतदाताओं में वह भरोसा पैदा करना होगा कि वह इस जिम्मेदारी को संभालने के लिए तैयार है। इसके लिए उसे अपने कैडर को भी मजबूत करना होगा और उसे भाजपा से जीत सकने के आत्मविश्वास से भी भरना होगा।

कांग्रेस के कमजोर होने का मतलब

एक्जिट पोल में कांग्रेस के कमजोर होने की आशंका भी जताई गई है। कांग्रेस कमजोर हालात में भी 6-7 फीसदी वोट पाती रही है, लेकिन इस बार उसका वोट शेयर तीन फीसदी तक ही सिमट सकता है। सुनील पांडेय ने कहा कि यदि ऐसा होता है तो इसका एक ही अर्थ होगा कि मतदाताओं ने गैर-भाजपाई विकल्प की सरकार बनाने के लिए पूरी ताकत के साथ सपा का साथ दिया। संभावना है कि मुस्लिम मतदाताओं के पूरी तरह सपा के पक्ष में मुड़ जाने के कारण भी कांग्रेस के वोट शेयर में कमी आती दिख रही हो।

लेकिन कांग्रेस नेताओं को समझना पड़ेगा कि मतदाताओं ने यह फैसला केवल इसलिए लिया होगा क्योंकि वे किसी भी कीमत पर एक गैर-भाजपाई सरकार बनाने के लिए वोट कर रहे थे। यदि कांग्रेस यही भरोसा मतदाताओं के बीच पैदा करने में कामयाब हो जाती है तो यह पूरा समर्थन उसकी ओर मुड़ सकता है। फिलहाल वर्तमान हालात में उसके लिए कड़ी मेहनत करनी होगी। इसके लिए कांग्रेस को अपनी संगठनात्मक कमजोरियों से भी पार पाना होगा।     

क्या तैयार है कांग्रेस?

उत्तर प्रदेश कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता ने अमर उजाला से कहा कि इस चुनाव में भी कांग्रेस को बेहतर प्रदर्शन करने की उम्मीद है। लेकिन चुनाव परिणाम कुछ भी हों, उनकी पार्टी संघर्ष करने के लिए तैयार है। एक्जिट पोल में हार देखकर जहां सपा-बसपा अपने-अपने घर में सिमट गए हैं, वहीं प्रियंका गांधी आठ मार्च को भी लखनऊ में महिलाओं की एक बड़ी रैली आयोजित कर रही हैं। इसका इशारा साफ है कि कांग्रेस यहां ठहरने के लिए तैयार नहीं है। वह आगे बढ़ेगी और पूरी मजबूती के साथ लड़ेगी। यदि कांग्रेस संघर्ष की राजनीति करती है तो वह गैर-भाजपाई सरकार के विकल्प के रूप में जनता की पहली पसंद बन सकती है।

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