भाजपा में टिकट की घोषणा होने से पहले राजनीतिक गलियारो में चर्चाओं का बाजार गर्म था कि इस बार वर्तमान विधायकों के भाजपा खूब टिकट काटेगी, लेकिन अब तक जितने टिकट भाजपा ने दिए हैं उसमें यह अनुमान पूरी तरह से गलत साबित हुआ है। राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि भाजपा ने ऐसा करके एक संदेश देने की कोशिश की है कि ना तो जनता में विधायकों के प्रति कोई नाराजगी है और ना ही सरकार विधायकों के काम से असंतुष्ट है, यानी सब कुछ बेहतर चल रहा है।
भाजपा ने शुक्रवार को 85 प्रत्याशियों की दूसरी सूची जारी की। इस सूची में 60 पुराने विधायकों पर भरोसा जताते हुए उनको दोबारा मैदान में उतारा गया है, जबकि 12 विधानसभा सीटों नए प्रत्याशी को उतारा गया है। इनमें पांच विधानसभा सीटें ऐसी हैं जिनके विधायक पार्टी छोड़कर समाजवादी पार्टी में शामिल हो गए।
भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष स्वतंत्र देव सिंह कहते हैं कि उनकी पार्टी में टिकट देने की परंपरा बहुत साफ-सुथरी है। जनता में जिसकी स्वीकार्यता हो और वह पार्टी की विचारधारा के साथ लोगों की समस्याओं का निराकरण करता हो टिकट उसी को मिलता है। इसके अलावा पार्टी खुद चरणबद्ध तरीके से किस विधानसभा में कौन से प्रत्याशी को टिकट देना है इसका सर्वे भी कराती है। विधानसभा के लोगों से पूछा जाता है। और उन सब के बाद विधानसभा के चुनाव में उम्मीदवार को टिकट दिया जाता है। इस बार जो टिकट दिए जा रहे हैं उससे बिल्कुल स्पष्ट तौर पर अंदाजा लग रहा है कि जनता न सिर्फ विधायकों के काम से खुश है बल्कि सरकार के काम से भी बहुत खुश है। यही वजह है कि जनता ने अपने सभी पुराने भरोसेमंद विधायकों पर भरोसा किया और उनको पार्टी ने टिकट देकर दोबारा विधानसभा में भाजपा का परचम लहराने के लिए मैदान में उतारा है। उत्तर प्रदेश भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष स्वतंत्र देव सिंह कहते हैं कि इस बार फिर 300 के पार विधायकों की संख्या होगी।
गलत संदेश न जाए, इसलिए कम कटे टिकट
राजनीतिक विश्लेषक एसएन शुक्ला कहते हैं कि ज्यादातर विधायकों को रिपीट करने का मनोवैज्ञानिक असर भी जनता पर पड़ता है। वह कहते हैं कि इससे एक बात तो बिल्कुल स्पष्ट हो जाती है कि पुराने विधायकों को रिपीट करने वाली पार्टी यह मानती है कि जनता में उसके प्रति कोई नाराजगी नहीं है। अगर विधानसभा में अचानक बड़े स्तर पर सिटिंग एमएलए के टिकट काट दिए जाते हैं तो जनता में संदेश भी बड़ा नकारात्मक जाता है।
वो कहते हैं कि इसका सीधा-सीधा मतलब यही होता है या तो उस पार्टी के विधायक जनता में अपनी अच्छी पैठ नहीं बना पाए या उक्त पार्टी के विधायकों के प्रति क्षेत्र में बहुत नाराजगी है। अब विधायकों के प्रति नाराजगी का मतलब सरकार से नाराजगी माना जाता है। ऐसे में अगर ताबड़तोड़ तरीके से विधायकों के टिकट काटे जाते हैं तो यह संदेश जाता है कि सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है और पार्टी को सब कुछ दुरुस्त करने के लिए व्यापक स्तर पर फेरबदल करना पड़ रहा है। इसका असर चुनाव के परिणामों पर भी पड़ता है।
शुक्ला का मानना है कि भाजपा ने इसी रणनीति को अपनाते हुए अपने ज्यादातर विधायकों के टिकट नहीं काटे हैं और उनको रिपीट करके दोबारा मैदान में उतारा है। वह कहते हैं ऐसा करके भारतीय जनता पार्टी ने अपनी सरकार और अपने नेताओं की जनता के बीच स्वीकार्यता का एक बड़ा संदेश दिया है।
जातिगत संतुलन बनाने की कोशिश
भाजपा ने शुक्रवार को जो टिकट घोषित किए हैं उसमें सभी जातियों के समीकरण और हर वर्ग की हिस्सेदारी को भी समानांतर बरकरार रखा है। इन सीटों में भी 30 पिछड़ों और 19 दलितों को टिकट देकर भाजपा ने पिछड़ों और दलितों की मजबूत साझेदारी को आगे बढ़ाया है, जबकि अगड़ी जातियों में 15 ठाकुर और 14 ब्राह्मण समेत 4 टिकट वैश्य समुदाय को भी दिया है। इसके अलावा तीन टिकट पंजाबी समुदाय को भी भाजपा ने देखकर इलाकाई जातिगत समीकरणों को साधने की कोशिश की है। भाजपा ने दलित और पिछड़ों में भी दो जाटव, सात पासी, सात कुर्मी, दस लोधी, पांच कुशवाहा और मौर्य समेत एक धनकर को शामिल कर संतुलन बनाने की कोशिश की है।