वह कहते हैं राजनीति में इस बयानों के बहुत मायने होते हैं। उनका कहना है कि शिवपाल यादव और अखिलेश यादव के आपस में समझौते को अगर आप बारीकी से समझे तो पाएंगे कि जिस तरीके से शिवपाल यादव के सिवाय अब तक किसी भी उनके बड़े नेता को टिकट नहीं दिया गया है उससे स्पष्ट होता है कि समझौता सिर्फ शिवपाल यादव ने ही किया है।
प्रसपा के नेताओं को नहीं दिया टिकट
उत्तर प्रदेश में होने वाले विधानसभा चुनाव की तैयारियों पर अगर नजर डालें तो पाएंगे शिवपाल यादव की प्रगतिशील समाजवादी पार्टी ने पिछले साल से ही जबरदस्त तैयारियां शुरू कर दी थीं। उत्तर प्रदेश में राजनीति को करीब से समझने वाले डॉ शांतनु मौर्य कहते हैं कि शिवपाल यादव ने तो अपने राजनीतिक गठबंधन से पहले ही कई सीटों पर प्रत्याशियों को चुनाव लड़ाने की न सिर्फ हामी भरी थी बल्कि उनका टिकट तक फाइनल कर दिया था। लेकिन जब समझौता समाजवादी पार्टी से हुआ तो शिवपाल यादव की पार्टी से टिकट की चाह रखने वाले ऐसे कई बड़े-बड़े नेताओं का अब फिलहाल कोई राजनीतिक भविष्य नजर नहीं आ रहा है। क्योंकि समाजवादी पार्टी शिवपाल यादव की पार्टी में पद और कद रखने वाले नेताओं को फिलहाल टिकट देने के मूड में नजर नहीं आ रही है।
मौर्य उदाहरण देकर कहते हैं कि इटावा की भरथना सीट पर शिवपाल यादव ने सुशांत वर्मा को उम्मीदवार घोषित किया था। चूंकि अब शिवपाल का समाजवादी पार्टी से गठबंधन है और समाजवादी पार्टी ने इसी भरथना सीट से राघवेंद्र गौतम को टिकट दे दिया है। यानी जिस सीट के लिए शिवपाल यादव ने अपना प्रत्याशी घोषित किया, समाजवादी पार्टी ने उसको दरकिनार करके वहां अपना प्रत्याशी तय कर दिया। इसी तरीके से पूर्व राज्यसभा सांसद वीरपाल यादव को शिवपाल यादव ने समाजवादी पार्टी से हुए गठबंधन से पहले बिथरी चैनपुर से प्रगतिशील समाजवादी पार्टी का प्रत्याशी घोषित किया, लेकिन अखिलेश यादव ने इस चुनाव में अगम मौर्य को उम्मीदवार बना दिया। शांतनु कहते हैं कि यह तो महज उदाहरण है। शिवपाल यादव की पार्टी से ताल्लुक रखने वाले पूर्व मंत्री शारदा प्रताप शुक्ला, अरुणा कोरी, शादाब फातिमा समेत कई बड़े-बड़े नेताओं को अब अपने राजनीतिक भविष्य की निश्चित तौर पर चिंता सता रही होगी। क्योंकि अखिलेश यादव ने अभी तक शिवपाल यादव की पार्टी से ताल्लुक रखने वाले बड़े नेताओं को टिकट देने के लिए अभी पत्ते नहीं खोले हैं।
चाचा-भतीजा एक झंडे के नीचे
राजनीतिक विश्लेषक ओपी आर्या कहते हैं कि शिवपाल यादव और अखिलेश यादव की पार्टी के बीच हुए समझौते को सिर्फ राजनीतिक समझौता नहीं माना जाना चाहिए। क्योंकि यह परिवार से अलग हुआ एक बड़ा धड़ा था जो समझौते के साथ समाजवादी पार्टी में विलय जैसी ऐसी स्थिति में पहुंच गया। वह कहते हैं कि मान लीजिए शिवपाल यादव के कहने पर कुछ जिताऊ कैंडिडेट के नाम समाजवादी पार्टी कुछ लोगों को टिकट दे देती है, तो वह चुनाव समाजवादी पार्टी के चुनाव चिन्ह पर ही लड़ेंगे। ऐसे में अगर उनमें से कोई प्रत्याशी जीतता भी है तो वह समाजवादी पार्टी का ही प्रत्याशी माना जाएगा। वे कहते हैं जिस तरह से शिवपाल यादव अब समाजवादी पार्टी को लेकर के एक नरम रवैया अपना रहे हैं उससे दूरगामी संदेश भी मिल रहा है। पूरा संदेश यही है कि आज नहीं तो कल संभव है कि चाचा और भतीजा मिलकर आधिकारिक तौर पर एक ही झंडे के नीचे न सिर्फ आगे के चुनाव लड़ें, बल्कि आगे की सपा की राजनीतिक नीतियां भी बनाएं।