उत्तर प्रदेश विधासभा के चुनाव में भले अभी कुछ महीने बाकी हों लेकिन नेताओं में जुबानी जंग शुरू हो गई है। भारतीय किसान यूनियन के राकेश टिकैत ने हापुड़ में एक रैली के दौरान ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहाद-उल-मुस्लिमीन (एआईएमआईएम) प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी को भारतीय जनता पार्टी का ‘चाचाजान’ कह दिया है। टिकैत ने कहा कि इस चुनाव में भाजपा के चचाजान आ गए हैं। वे यदि भाजपा को गाली भी देते हैं तो उन पर केस दर्ज नहीं होता क्योंकि वे दोनों एक ही टीम है। उससे पहले पटना में ओवैसी ने कल कहा था- क्या मुसलमान राजद-सपा का गुलाम है जो उन्हीं को वोट देता रहेगा।
राकेश टिकैत से पहले कई पार्टियां ओवैसी पर भाजपा की बी टीम होने का आरोप लगा चुकी है। ओवैसी के एजेंडे पर सवाल उठाने वालों में सबसे पहले कांग्रेस नेता अधीर रंजन चौधरी थे। कांग्रेस के बाद राजद सपा और तृणमूल कांग्रेस तक ने उन पर भाजपा की भी पार्टी होने का आरोप मढ़ा। अधीर रंजन चौधरी ने बिहार चुनाव के बाद कहा था " बिहार चुनाव में असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी को इस्तेमाल करने की भाजपा की रणनीति एक हद तक सफल रही। यही आरोप यूपी विधानसभा चुनाव को लेकर भी ओवैसी पर लग रहे हैं। माना जा रहा है कि हिंदू-मुस्लिम वोटों के ध्रुवीकरण के लिए ओवैसी यूपी के चुनाव मैदान में उतरे हैं।
भाजपा के साथ सांठगांठ है
उत्तर प्रदेश से कांग्रेस के वरिष्ठ नेता पी एल पुनिया ने अमर उजाला डिजिटल से बातचीत में कहा निश्चित तौर पर ओवैसी यूपी चुनाव केवल भाजपा के इशारे पर लड़ रहे हैं। उन्होंने 100 सीटों पर चुनाव लड़ने की बात कही है और वे हमेशा ऐसा करते हैं। चाहे महाराष्ट्र का चुनाव हो या बिहार का ये साफ है कि भाजपा के साथ पूरी तरह उनकी सांठगांठ है। वे ऊपरी तौर पर भाजपा के साथ विरोध दिखाते हैं लेकिन हैं वे भाजपा की बी टीम। उन पर निरंतर यह आरोप लगते रहे हैं कि वे केवल भाजपा को लाभ पहुंचाने के लिए ही अपने उम्मीदवार उतारते हैं और यह आरोप उन पर बिना वजह नहीं लगते हैं। वे जहां-जहां चुनाव लड़ते हैं भाजपा को वहां- वहां फायदा मिलता है।
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भाजपा से हुआ ओवैसी का उदय
सपा प्रवक्ता आईपी सिंह ने बताया- यह साफ है कि भाजपा ओवैसी की पार्टी को प्रश्रय देती है। वे बिहार मे राजद को रोकने के लिए भाजपा के प्लान के हिसाब से वहां चुनाव लड़े और अब यूपी आ गए हैं। ओवैसी दक्षिण भारत के अन्य राज्य में चुनाव लड़ने नहीं जाते, वे केवल तेलंगाना तक सीमित हैं। नोटबंदी के दौरान उनके बैंक में करोड़ों रूपए जमा हुए लेकिन न तो ईडी ने पूछा और न सीबीआई। 2014 से पहले ओवैसी को कौन जानता था। इनका उदय ही केंद्र में भाजपा की सरकार बनने के बाद हुआ है।
असदुद्दीन ओवैसी ने बिहार की राजधानी पटना में प्रेस कॉन्फ्रेंस आयोजित किया।
- फोटो : एएनआई
हालांकि एआईएमआईएम प्रवक्ता सईद असीम वकर ने अमर उजाला डिजिटल से कहा- राकेश टिकैत किसानों के कंधों पर बैठकर अपना प्रचार कर रहे हैं। वे अपनी बताएं, हमें तो उनमें ही भाजपा का असली और सच्चा वफादार दिख रहा है। भाजपा के असली एजेंट तो राकेश टिकैत हैं और यह 2022 के चुनाव में भी साफ हो जाएगा। 2017 के पहले भाजपा को जीत दिलाने का काम कर रहे थे। 2014 में भाजपा को जीत दिलाने के लिए खूब मेहनत की, प्रधानमंत्री के तौर पर नरेंद्र मोदी का समर्थन किया। जो कल तक भाजपा के साथ खड़े थे, वो हम पर भाजपा का एजेंट होने का आरोप लगा रहे हैं।
ओवैसी पर भाजपा की बी टीम होने का आरोप क्यों है?
मार्च में हुए पश्चिम बंगाल चुनाव से पहले उन्नाव से भाजपा सांसद साक्षी महाराज ने एआईएमआईएम के नेता असदुद्दीन ओवैसी के बारे में कहा था उनका बहुत धन्यवाद। भगवान उन्हें शक्ति दे और उनकी मदद करे। उन्होंने बिहार में हमारा समर्थन किया, वह पश्चिम बंगाल और यूपी चुनावों में भी हमारी मदद करेंगे। साक्षी महाराज के इस बयान से विपक्षी पार्टियों को ओवैसी पर हमला करने का बल मिला।
हालांकि भाजपा सांसद यह दावा करने वाले पहले नेता नहीं थे। भाजपा के कुछ नेता भी दबे स्वर में कहते रहे हैं कि ओवैसी जहां-जहां जाते हैं वहां हमें फायदा होता है और उनकी मौजूदगी से पार्टी को मदद मिलती है। लेकिन एआईएमआईएम प्रमुख हमेशा इन आरोपों का खंडन करते रहे हैं। उनका कहना है कि उनका भाजपा के साथ कोई राजनीतिक समझौता नहीं है।
लेकिन बिहार चुनाव में राजद की हार के बाद विपक्ष को इस आरोप में और सच्चाई नजर आई थी। एआईएमआईएम ने बिहार विधानसभा चुनाव में 19 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे थे, जिनमें से 14 मुस्लिम बहुल सीमांचल क्षेत्र में थे। पार्टी ने यहां उपेंद्र कुशवाहा की तब की राष्ट्रीय लोक समता पार्टी और मायावती की बहुजन समाज पार्टी के साथ गठबंधन किया था। एआईएमआईएम ने चुनाव में पांच सीटें जीती हैं और कम से कम 10 और सीटों पर वोटों को विभाजित करके परिणामों को प्रभावित किया है। प्रचार के दौरान ओवैसी ने बीजेपी-जेडीयू गठबंधन से ज्यादा राजद-कांग्रेस-लेफ्ट पर निशाना साधा था।
राजद नेताओं ने सीधे-सीधे हार का ठीकरा ओवैसी के सिर ही फोड़ा था। राजद के वरिष्ठ नेता शिवानंद तिवारी ने कहा था कि बिहार में महागठबंधन की हार के लिए एआईएमआईएम के नेता असदुद्दीन ओवैसी जिम्मेदार हैं। उन्होंने ओवैसी को भाजपा-आरएसएस की बी-टीम बताते हुए कहा था कि ओवैसी बिहार में महागठबंधन को हराने के लिए भाजपा के इशारे पर चुनाव लड़े।
बिहार चुनाव में कमाल का प्रदर्शन करके उत्साहित ओवैसी ने बंगाल में भी अपनी धाक जमानी चाही। प्रदेश के मुस्लिम वोटरों को रिझाने के लिए उन्होंने पूरी ताकत झोंक दी थी और मुस्लिम बहुल सात सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे थे। हालांकि बंगाल के मुसलमानों ने ममता का साथ नहीं छोड़ा और ओवैसी की पार्टी का बुरा हाल हो गया। पार्टी एक प्रतिशत वोट भी हासिल नहीं कर पाई।
यूपी में बड़ी पार्टियों की ओवैसी से दूरी
चुनाव पर्यवेक्षकों का कहना है कि यह ट्रेंड देखा गया है कि जहां भी ओवैसी अपने उम्मीदवार उतारते हैं, एकमुश्त हिंदू वोट भाजपा को चला जाता है। यही वजह है कि यूपी में बड़ी पार्टियां ओवैसी से हाथ मिलाने से डरती हैं और कोई बड़ी पार्टी उनके साथ गठबंधन करने को तैयार नहीं हुई। इन पार्टियों में डर है कि एआईएमआईएम के साथ गठजोड़ करने से बहुसंख्यक हिंदू उनसे दूर हो जाएंगे और भाजपा की ओर चले जाएंगे। गठबंधन को लेकर ओवैसी को यूपी में सबसे पहला झटका बसपा से लगा। जब बसपा प्रमुख मायावती ने 27 जून को एक ट्वीट में अगले साल होने वाले राज्य चुनाव के लिए एआईएमआईएम के साथ किसी भी तरह के गठबंधन की संभावना से इनकार किया।
मायावती ने ट्वीट में कहा 'अगले विधानसभा चुनाव में बसपा और एआईएमआईएम एक साथ लड़ेंगे, इन खबरों में कोई सच्चाई नहीं है। बसपा 2022 का विधानसभा चुनाव अकेले लड़ेगी'। जबकि एआईएमआईएम ने बसपा के साथ मिलकर ही बिहार चुनाव लड़ा था, और पांच सीटों पर जीत हासिल की थी। इसके बाद से कयास लगाए जा रहे थे कि दोनों पार्टियां यूपी चुनाव भी साथ में लड़ेंगी। हालांकि, बिहार के विपरीत मायावती ने यूपी में ओवैसी से दूरी बनाए रखना ही उचित समझा।
इसी तरह कई मौकों पर सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव की तारीफ करने के बावजूद सपा ने एआईएमआईएम से दूरी बनाए रखी है। सपा के एक नेता का कहना है ओवैसी अक्सर जनता को मूर्ख बनाने के लिए भाजपा पर तीखे प्रहार करते हैं उसके बाद भी भाजपा या आरएसएस ने ओवैसी के खिलाफ कुछ नहीं कहती। जहां चुनाव होते हैं, वहां मुस्लिम बहुल इलाकों में ओवैसी अपनी पार्टी के उम्मीदवारों को मैदान में उतार देते हैं। यह जानते हुए भी कि वह भाजपा-आरएसएस को हरा नहीं पाएंगे या सरकार नहीं बना पाएंगे, वह लड़ते हैं। क्योंकि उनका मकसद बीजेपी-आरएसएस के ध्रुवीकरण के एजेंडे को आगे बढ़ाना होता है। इसलिए बड़ी पार्टियों के लिए एआईएमआईएम अछूत की तरह है।
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यूपी में पार्टी कार्यालय के उद्घाटन के दौरान ओवैसी
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