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उत्तर प्रदेश चुनाव: 'यादव लैंड' में अखिलेश की प्रतिष्ठा दांव पर, क्या अपर्णा को प्रचार में उतारेगी भाजपा?

सार

भाजपा को 2017 के विधानसभा चुनाव में राष्ट्रवाद की नाव पर सवार यादव युवाओं का भी साथ मिला था। इसके अलावा इसी क्षेत्र में शाक्य मतदाता भी रहते हैं जो 2014 के चुनाव से भाजपा के साथ आ गए थे। इस क्षेत्र में लोध मतदाता भी काफी संख्या में रहते हैं जो कल्याण सिंह की राजनीति के कारण भाजपा से जुड़े हुए हैं। ऐसे में इस चरण में भाजपा के लिए कुछ राहत भरी खबर मिल सकती है...
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अपर्णा यादव, मुलायम सिंह यादव और अखिलेश यादव - फोटो : Agency (File Photo)
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विस्तार
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यूपी विधानसभा चुनाव के पहले दो चरणों में पश्चिमी उत्तर प्रदेश की 113 सीटों पर मतदान हो चुका है। अब तीसरे चरण में 16 जिलों की 59 सीटों पर 20 फरवरी को मतदान होगा। इसमें फिरोजाबाद, एटा, कन्नौज, मैनपुरी, कानपुर, ललितपुर और झांसी के विधानसभा क्षेत्र शामिल हैं। इन 59 सीटों में से 30 सीटों पर यादव मतदाताओं की बहुलता है जो पारंपरिक तौर पर समाजवादी पार्टी के वोटर माने जाते हैं। इस चरण में अखिलेश यादव की करहल (110 नंबर विधानसभा) और शिवपाल यादव की जसवंत नगर (199 नंबर विधानसभा सीट) सीट भी शामिल है। चूंकि, 2017 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने इन 59 सीटों में से 49 सीटें जीतकर अखिलेश यादव को जबरदस्त पटखनी दी थी, ऐसे में अखिलेश यादव को अपनी पारंपरिक जमीन पर अपनी साख बचाने की कड़ी चुनौती होगी।

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लोगों की निगाह अपर्णा बिष्ट यादव पर भी टिकी हुई हैं, जो मुलायम सिंह परिवार की बहू हैं। देखना होगा कि यादव बेल्ट में अखिलेश यादव को रोकने के लिए भाजपा उनका किस तरह इस्तेमाल करती है। बुधवार को लखनऊ कैंट सीट पर ब्रजेश पाठक के पक्ष में चुनाव प्रचार करते हुए उन्होंने अपने इटावा-मैनपुरी में चुनाव प्रचार के सवाल को टाल दिया। लेकिन माना जा रहा है कि भाजपा उनका इन क्षेत्रों में उपयोग कर अखिलेश यादव को असहज कर सकती है। हालांकि, भाजपा ने अभी तक अखिलेश यादव या शिवपाल सिंह यादव की सीटों पर चुनाव प्रचार कराने के लिए अपर्णा यादव का कार्यक्रम तय नहीं किया है। वे लगातार लखनऊ-सीतापुर-रायबरेली और आसपास के इलाकों में लगातार भाजपा के लिए प्रचार कर रही हैं।

किसके पक्ष में है समीकरण?

तीसरे चरण में अभी भी पश्चिमी उत्तर प्रदेश की 19 सीटें शामिल हैं, जहां जाट-मुस्लिम-किसान फैक्टर भाजपा के खिलाफ जाता हुआ  बताया जा रहा है। भाजपा को पश्चिमी उत्तर प्रदेश की बाकी बची इन सीटों पर भी नुकसान हो सकता है, तो समाजवादी पार्टी और आरएलडी गठबंधन को बढ़त मिल सकती है। हालांकि, इसी चरण में बुंदेलखंड की सीटें भी शामिल हैं जहां सिंचाई और कोरोना काल में राशन योजना का बेहतर इंतजाम करने के कारण भाजपा को बढ़त मिलने का अनुमान है। सपा इस बार यहां छह से सात सीटों पर वापसी करती हुई बताई जाती है, लेकिन इसके बाद भी भाजपा यहां बाकी सीटों पर मजबूत लड़ाई ल़ड़ रही है। भाजपा के लिए राहत की बात है कि तीसरे चरण में अवध क्षेत्र की 27 सीटें भी शामिल होंगी जहां भाजपा की राह अपेक्षाकृत आसान हो सकती है।

भाजपा को 2017 के विधानसभा चुनाव में राष्ट्रवाद की नाव पर सवार यादव युवाओं का भी साथ मिला था। इसके अलावा इसी क्षेत्र में शाक्य मतदाता भी रहते हैं जो 2014 के चुनाव से भाजपा के साथ आ गए थे। इस क्षेत्र में लोध मतदाता भी काफी संख्या में रहते हैं जो कल्याण सिंह की राजनीति के कारण भाजपा से जुड़े हुए हैं। ऐसे में इस चरण में भाजपा के लिए कुछ राहत भरी खबर मिल सकती है।   

सत्ता की राह नहीं आसान

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि 2017 के विधानसभा चुनाव में भाजपा की लड़ाई आसान थी। उस समय एक मुख्यमंत्री रहते हुए अखिलेश यादव को अपने कामों का हिसाब देना था। उनके साथ परिवारवाद, राज्य में बढ़े अपराध और सरकार के कुछ मंत्रियों के भ्रष्टाचार का भी जवाब देना था। जबकि भाजपा के खाते में प्रधानमंत्री मोदी का उभार चरम पर था। मोदी ने प्रधानमंत्री रहते हुए पहली बार विधानसभा चुनावों में प्रचार करना शुरू किया था। लोग उनके व्यक्तित्व से आकर्षित थे, लोगों को पीएम के मुंह से भ्रष्टाचार विरोधी नारे सुनना, विकासवाद और राष्ट्रवाद की बातें सुनना अच्छा लगता था।

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लेकिन इस चुनाव में परिस्थितियां बदल चुकी हैं। अब योगी आदित्यनाथ को अपने कामकाज का हिसाब देना है तो भाजपा सरकार पर हाथरस, फाफामऊ, आगरा में दलितों पर हुए अपराध का हिसाब देना है। पीएम मोदी और योगी आदित्यनाथ पर व्यक्तिगत तौर पर भ्रष्टाचार के कोई आरोप नहीं हैं, लेकिन इसके बाद भी अयोध्या भूमि विवाद में हुए कथित घोटाले, युवाओं में बढ़ती बेरोजगारी के मुद्दे पर भाजपा को जनता का सामना करना है।

भाजपा नेता हमेशा डबल इंजन की सरकार की बात करते हैं, इसलिए राज्यों का चुनाव होने के बाद भी केंद्र को महंगाई, कई बड़े उद्योगपतियों द्वारा लाखों करोड़ रुपये लेकर फरार हो जाने की घटनाओं, एबीजी शिपयार्ड कंपनी द्वारा 28 हजार करोड़ रुपये के घोटाले, हर साल बैंकों के बढ़ते एनपीए और पेट्रोल-डीजल की बढ़ती कीमतों पर जवाब देना पड़ेगा। इसलिए यूपी चुनाव का रास्ता तय करना भाजपा के लिए कतई आसान नहीं होगा।

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