यूपी विधानसभा चुनाव के पहले दो चरणों में पश्चिमी उत्तर प्रदेश की 113 सीटों पर मतदान हो चुका है। अब तीसरे चरण में 16 जिलों की 59 सीटों पर 20 फरवरी को मतदान होगा। इसमें फिरोजाबाद, एटा, कन्नौज, मैनपुरी, कानपुर, ललितपुर और झांसी के विधानसभा क्षेत्र शामिल हैं। इन 59 सीटों में से 30 सीटों पर यादव मतदाताओं की बहुलता है जो पारंपरिक तौर पर समाजवादी पार्टी के वोटर माने जाते हैं। इस चरण में अखिलेश यादव की करहल (110 नंबर विधानसभा) और शिवपाल यादव की जसवंत नगर (199 नंबर विधानसभा सीट) सीट भी शामिल है। चूंकि, 2017 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने इन 59 सीटों में से 49 सीटें जीतकर अखिलेश यादव को जबरदस्त पटखनी दी थी, ऐसे में अखिलेश यादव को अपनी पारंपरिक जमीन पर अपनी साख बचाने की कड़ी चुनौती होगी।
तीसरे चरण में अभी भी पश्चिमी उत्तर प्रदेश की 19 सीटें शामिल हैं, जहां जाट-मुस्लिम-किसान फैक्टर भाजपा के खिलाफ जाता हुआ बताया जा रहा है। भाजपा को पश्चिमी उत्तर प्रदेश की बाकी बची इन सीटों पर भी नुकसान हो सकता है, तो समाजवादी पार्टी और आरएलडी गठबंधन को बढ़त मिल सकती है। हालांकि, इसी चरण में बुंदेलखंड की सीटें भी शामिल हैं जहां सिंचाई और कोरोना काल में राशन योजना का बेहतर इंतजाम करने के कारण भाजपा को बढ़त मिलने का अनुमान है। सपा इस बार यहां छह से सात सीटों पर वापसी करती हुई बताई जाती है, लेकिन इसके बाद भी भाजपा यहां बाकी सीटों पर मजबूत लड़ाई ल़ड़ रही है। भाजपा के लिए राहत की बात है कि तीसरे चरण में अवध क्षेत्र की 27 सीटें भी शामिल होंगी जहां भाजपा की राह अपेक्षाकृत आसान हो सकती है।
भाजपा को 2017 के विधानसभा चुनाव में राष्ट्रवाद की नाव पर सवार यादव युवाओं का भी साथ मिला था। इसके अलावा इसी क्षेत्र में शाक्य मतदाता भी रहते हैं जो 2014 के चुनाव से भाजपा के साथ आ गए थे। इस क्षेत्र में लोध मतदाता भी काफी संख्या में रहते हैं जो कल्याण सिंह की राजनीति के कारण भाजपा से जुड़े हुए हैं। ऐसे में इस चरण में भाजपा के लिए कुछ राहत भरी खबर मिल सकती है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि 2017 के विधानसभा चुनाव में भाजपा की लड़ाई आसान थी। उस समय एक मुख्यमंत्री रहते हुए अखिलेश यादव को अपने कामों का हिसाब देना था। उनके साथ परिवारवाद, राज्य में बढ़े अपराध और सरकार के कुछ मंत्रियों के भ्रष्टाचार का भी जवाब देना था। जबकि भाजपा के खाते में प्रधानमंत्री मोदी का उभार चरम पर था। मोदी ने प्रधानमंत्री रहते हुए पहली बार विधानसभा चुनावों में प्रचार करना शुरू किया था। लोग उनके व्यक्तित्व से आकर्षित थे, लोगों को पीएम के मुंह से भ्रष्टाचार विरोधी नारे सुनना, विकासवाद और राष्ट्रवाद की बातें सुनना अच्छा लगता था।