बसपा सुप्रीमो मायावती ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के खिलाफ मुस्लिम प्रत्याशी उतारकर राजनीतिक चर्चाओं को एक नई हवा दे दी है। सिर्फ योगी आदित्यनाथ के खिलाफ ही नहीं बल्कि बसपा ने तो उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्या के खिलाफ भी मुस्लिम प्रत्याशी चुनावी मैदान में उतार दिया है। इसे लेकर अब उत्तर प्रदेश के राजनीतिक गलियारे में तमाम तरह की चर्चाएं हो रही हैं। कोई इसे भारतीय जनता पार्टी के लिए "सपोर्टिव नजरिए" से देख रहा है, तो कुछ राजनीतिक विशेषज्ञों का कहना है कि बहुजन समाज पार्टी ने इतने कद्दावर नेताओं के खिलाफ मुस्लिम प्रत्याशी उतारकर समाजवादी पार्टी के कोर वोटरों पर निशाना साधा है।
मायावती ने मुस्लिम प्रत्याशी उतारकर जो भी गणित साधने की कोशिश की हो, लेकिन गोरखपुर शहर की विधानसभा सीट की अपनी एक अलग कहानी है। गोरखपुर में 1962 में नियामतुल्लाह अंसारी आखिरी मुस्लिम विधायक बने थे। उसके बाद से लेकर अब तक कोई भी मुस्लिम चेहरा गोरखपुर शहर विधानसभा सीट से चुनाव नहीं जीता। 1962 से पहले 1951 में इस्तफा हुसैन चुनाव जीते थे। बीते कुछ विधानसभा चुनावों में बहुजन समाज पार्टी गोरखपुर शहर में हमेशा तीसरे नंबर पर रही। 2017 में बहुजन समाज पार्टी के जनार्दन चौधरी 11 फ़ीसदी वोटों के साथ तीसरे नंबर पर रहे थे। जबकि 2012 के विधानसभा चुनावों में पार्टी ने दिवेश श्रीवास्तव पर दांव लगाया था। श्रीवास्तव भी तीसरे नंबर पर ही रहे थे। 2007 में जब बहुजन समाज पार्टी पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में आई थी, तब भी गोरखपुर शहर विधानसभा सीट पर भारतीय जनता पार्टी का ही कब्जा रहा था।
मायावती ने सिर्फ योगी आदित्यनाथ के खिलाफ ही नहीं बल्कि उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य के खिलाफ भी मुस्लिम प्रत्याशी मैदान में उतारा है। मुस्लिम प्रत्याशी को उतारने का फैसला मायावती ने यहां पर ब्राह्मण प्रत्याशी को टिकट देने के बाद हटाकर किया है। राजनीतिक विशेषज्ञ जीडी शुक्ला कहते हैं कि वैसे तो परंपरागत तौर पर अगर देखा जाए, तो सिराथू विधानसभा सीट बहुजन समाज पार्टी लंबे समय से अपने कब्जे में किए हुए थी। 2012 में केशव प्रसाद मौर्य के आने से पहली बार इस सीट पर कमल खिला था। अब मुस्लिम प्रत्याशी को उतारने के साथ मायावती ने यहां पर जातिगत समीकरणों को साधते हुए निश्चित तौर पर निशाना लगाया है। शुक्ला कहते हैं कि जो रणनीति मायावती ने गोरखपुर में मुस्लिम प्रत्याशी को उतार कर बनाई है, कमोबेश यही स्थिति सिराथू में भी है। बहुजन समाज पार्टी के एक वरिष्ठ नेता कहते हैं कि ब्राह्मण प्रत्याशी को बदलकर मुस्लिम प्रत्याशी को सिराथू विधानसभा में लाने का सीधा मकसद मायावती का इस सीट पर चुनाव जीतना ही है। वे कहते हैं कि इस सीट से कोई डमी कैंडिडेट जैसा प्रत्याशी नहीं उतारा गया है। बहुजन समाज पार्टी के नेताओं का मानना है कि बसपा की परंपरागत सीट पर उसका एक बार फिर से कब्जा होगा।
कौशांबी की सिराथू विधानसभा सीट बहुजन समाज पार्टी का गढ़ मानी जाती रही है। राजनीतिक जानकार प्रोफेसर प्रभु दयाल बताते हैं कि सिराथू विधानसभा में आज तक कभी कोई मुस्लिम प्रत्याशी चुनाव जीता ही नहीं। हालांकि यह बात दीगर है कि बसपा ने अगर इस बार मुस्लिम प्रत्याशी उतारा है तो 2017 में भी बहुजन समाज पार्टी ने सईदुलरब को टिकट देकर मुस्लिम और दलित जातिगत समीकरणों को साधते हुए मैदान में उतारा था। 2017 के विधानसभा चुनावों में बसपा तीसरे नंबर पर रही थी। प्रोफेसर प्रभु दयाल बताते हैं कि 1993 में बहुजन समाज पार्टी से राम सजीवन विधायक बने। फिर 1996 में बहुजन समाज पार्टी ने सीट पर कब्जा बनाया और मातेश सोनकर विधायक बने। 2002 में एक बार फिर बहुजन समाज पार्टी ने यहां पर चुनावी हैट्रिक लगाते हुए मातेश सोनकर को विधानसभा पहुंचाया। बसपा की जीत का सिलसिला सिर्फ यही नहीं रुका। 2007 में जब बहुजन समाज पार्टी पूर्ण बहुमत से सरकार में आई तो सिराथू विधानसभा से वाचस्पति चुनाव जीतकर लखनऊ पहुंचे थे। 2012 में बसपा की जीत का सिलसिला टूटा और पहली बार इस सीट पर भाजपा ने झंडा फहराया और केशव प्रसाद मौर्या विधायक चुने गए। उसके बाद 2014 में जब केशव प्रसाद मौर्य लोकसभा पहुंचे तो उपचुनाव में सिराथू विधानसभा सीट पर समाजवादी पार्टी से चुनाव लड़े वाचस्पति विधायक बने। लेकिन 2017 में यहां से फिर भारतीय जनता पार्टी के शीतला प्रसाद ने कब्जा कर ली।