UP Assembly Election 2022: अखिलेश ने क्यों लिया फूलन देवी की मां का आशीर्वाद, कान में क्या मिला जवाब
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली।
Published by: प्रतिभा ज्योति
Updated Thu, 14 Oct 2021 07:05 PM IST
सार
शायद यह याद दिलाने के लिए था कि वे मुलायम सिंह यादव थे जिन्होंने 1993 में फूलन देवी के खिलाफ मामले वापस ले लिए थे और बाद में राजनीति में उनका प्रवेश हुआ। वे सपा के टिकट पर चुनाव जीतकर संसद पहुंची।
फूलन की मां मूला देवी से मिले अखिलेश
- फोटो : अमर उजाला
समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष और उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव 2022 में जीत हासिल करने के लिए इन दिनों विजयी रथ यात्रा पर निकले हुए हैं। अखिलेश की रथ यात्रा जैसे ही बुधवार को जालौन पहुंची बैंडिट क्वीन के नाम से मशहूर पूर्व दस्यु और सांसद फूलन देवी की मां मूला देवी पर उनकी नजर पड़ी। उन्होंने मंच पर उन्हें बुलाया और उनका का आशीर्वाद लिया। मूला देवी ने भी उनके कान में कुछ कहा।
बाद में अखिलेश ने मीडिया को बताया कि उन्हें जीत का आशीर्वाद मिला है। अखिलेश का इस तरह फूलन देवी की मां से आशीर्वद लेना चर्चा का विषय बन गया और आशीर्वाद लेते उनका वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल भी हो रहा है। कहा जा रहा है कि अखिलेश और मूला देवी की यह मुलाकात निषाद वोट बैंक पर असर डाल सकती है और फूलन देवी की मां उनके पक्ष में चुनाव प्रचार भी कर सकती हैं।
क्या है फूलन देवी और सपा का रिश्ता
पूर्व दस्यु फूलन देवी को राजनीति में लाने का श्रेय सपा संस्थापक और पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव को जाता है। 1993 में उन्होंने फूलन देवी पर हत्या, डकैती और अपहरण के दर्ज करीब 18 मामले वापस ले लिए थे और उन्हें राजनीति में लेकर आए। इन मुकद्मों की वजह से फूलन देवी को 11 साल जेल की सजा काटनी पड़ी थी। वे पहली बार 1996 में मिर्जापुर से लोकसभा सांसद बनीं। 1999 में दोबारा सांसद बनी। जुलाई 2001 में दिल्ली में उनके सांसद आवास पर उनकी हत्या हो गई। 20 साल बाद जाकर अखिलेश को अब फिर उनकी याद आई है। वे गोरखपुर में फूलनदेवी की मूर्ति भी लगाने की घोषणा कर चुके हैं।
फूलन की मां मूला देवी से मिले अखिलेश
- फोटो : अमर उजाला
समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष और उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव 2022 में जीत हासिल करने के लिए इन दिनों विजयी रथ यात्रा पर निकले हुए हैं। अखिलेश की रथ यात्रा जैसे ही बुधवार को जालौन पहुंची बैंडिट क्वीन के नाम से मशहूर पूर्व दस्यु और सांसद फूलन देवी की मां मूला देवी पर उनकी नजर पड़ी। उन्होंने मंच पर उन्हें बुलाया और उनका का आशीर्वाद लिया। मूला देवी ने भी उनके कान में कुछ कहा।
बाद में अखिलेश ने मीडिया को बताया कि उन्हें जीत का आशीर्वाद मिला है। अखिलेश का इस तरह फूलन देवी की मां से आशीर्वद लेना चर्चा का विषय बन गया और आशीर्वाद लेते उनका वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल भी हो रहा है। कहा जा रहा है कि अखिलेश और मूला देवी की यह मुलाकात निषाद वोट बैंक पर असर डाल सकती है और फूलन देवी की मां उनके पक्ष में चुनाव प्रचार भी कर सकती हैं।
क्या है फूलन देवी और सपा का रिश्ता
पूर्व दस्यु फूलन देवी को राजनीति में लाने का श्रेय सपा संस्थापक और पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव को जाता है। 1993 में उन्होंने फूलन देवी पर हत्या, डकैती और अपहरण के दर्ज करीब 18 मामले वापस ले लिए थे और उन्हें राजनीति में लेकर आए। इन मुकद्मों की वजह से फूलन देवी को 11 साल जेल की सजा काटनी पड़ी थी। वे पहली बार 1996 में मिर्जापुर से लोकसभा सांसद बनीं। 1999 में दोबारा सांसद बनी। जुलाई 2001 में दिल्ली में उनके सांसद आवास पर उनकी हत्या हो गई। 20 साल बाद जाकर अखिलेश को अब फिर उनकी याद आई है। वे गोरखपुर में फूलनदेवी की मूर्ति भी लगाने की घोषणा कर चुके हैं।
फूलन देवी
- फोटो : अमर उजाला
क्या सिर्फ यही वजह काफी है
मुलायम सिंह यादव फूलन देवी को राजनीति में लेकर सिर्फ यही वजह नहीं है कि अखिलेश ने उनकी मां के पैर छुए। बल्कि इसके पीछे की अखिलेश की असल राजनीति निषाद वोट बैंक को साधने की है। फूलन देवी निषाद यानि मल्लाह जाति की थीं इसलिए उनकी मां से आशीर्वाद मांगकर अखिलेश यादव इस जाति को साथ लाने की कोशिश कर रहे हैं।
2019 के लोकसभा चुनाव से पहले सपा ने निषाद पार्टी से गठबंधन तोड़ लिया था। लेकिन इस चुनाव में भाजपा को टक्कर देने के लिए फूलन देवी को चर्चा में लाकर सपा निषाद वोटों को फिर से अपनी तरफ खींचने की कोशिश कर रही है। अखिलेश यादव को भरोसा है कि मुलायम सिंह ने जिस तरह पहले फूलन देवी को पार्टी में शामिल करा निषाद समाज का विश्वास जीतने में कामयाबी हासिल की थी उसी तरह उन्हें भी सफलता मिलेगी।
बड़ा वोट बैंक है निषाद
यूपी की आबादी में करीब 14 फीसदी हिस्सेदारी निषाद वोट बैंक की है और लगभग 70 सीटों पर इसका प्रभाव है। निषाद समुदाय का पूर्वांचल में बड़ा वोट बैंक हैं। निषाद, केवट, बिंद, मल्लाह, कश्यप, मांझी, गोंड आदि उप जातियां जो निषाद समाज का हिस्सा हैं। इसलिए भाजपा भी 2022 के चुनाव के लिए निषाद वोट बैंक पर नजर गड़ाए हुए है। हाल ही में पार्टी ने संजय निषाद की निषाद पार्टी के साथ मिलकर चुनाव लड़ने की घोषणा की है।
इससे निषाद जाति से संबंधित करीब छह सात उपजातियों को भी सीधा साधा जा सकेगा। उससे पहले योगी सरकार ने 2019 में 17 ओबीसी जातियों को एससी कैटेगरी में शामिल किया था, जिसमें निषाद, बिंद, मल्लाह और केवट भी शामिल हैं। इसे सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़े वर्गों को आरक्षण का लाभ प्रदान करने के प्रयास के रूप में देखा गया।
जालौन पहुंचे अखिलेश यादव
- फोटो : अमर उजाला
सपा की छटपटाहट क्या
अभी तक सपा की केवल यादवों वाली पार्टी की इमेज रही है। अखिलेश इससे निकल नहीं पा रहे हैं। यूपी की तमाम ओबीसी जातियों में यादवों की हिस्सेदारी क़रीब 20 फीसदी है। यूपी की राजनीति में यादवों की पहचान मुलायम सिंह यादव और उनके परिवार से है और ज्यादातर यादव सपा से ही जुड़े माने जाते हैं। मुलायम सिंह यादव ने इसमें यादव-मुस्लिम वोट बैंक यानी एमवाई समीकरण जोड़ा। यह मुलायम सिंह की सियासी गणित का फार्मूला था।
जाने माने दलित चिंतक प्रोफेसर बद्री नारायण बताते हैं कि अखिलेश उसी एमवाई समीकरण वाली इमेज को तोड़ने की कोशिश में है। फूलन देवी की मां के जरिए वे पूर्वांचल में भी अपने पैर जमाने की कोशिश कर रहे हैं। सपा पहले भी निषाद पार्टी के साथ काम कर चुकी है लेकिन इस बार वे फिर उन्हें साथ लाने की कोशिश कर रहे हैं।
2019 के लोकसभा चुनाव में गठबंधन से बाहर हो गई थी निषाद पार्टी
इस साल हुए लोकसभा चुनाव में निषाद पार्टी ने का सपा-बसपा-रालोद के गठबंधन हुआ था। लेकिन पार्टी के प्रमुख संजय निषाद ने यह कहते हुए गठबंधन से बाहर निकलने का फैसला किया कि अखिलेश यादव ने यह वादा किया था वे हमारी पार्टी के लिए सीटें घोषित करेंगे, लेकिन उन्होंने पोस्टर से लेकर लेटरपैड तक सब जगह से हमारी पार्टी का नाम गायब कर दिया है। इससे मेरे पार्टी के कार्यकर्ता, संस्थाएं और कोर कमेटी दुखी है। इसलिए उन्होंने कहा कि वे स्वतंत्र रुप से चुनाव लड़ेंगे या किसी अन्य विकल्प पर भी विचार कर सकते हैं। बाद में निषाद पार्टी ने एनडीए के साथ गठबंधन कर लिया था।
प्रेस कांफ्रेंस में स्वतंत्र देव सिंह, धर्मेंद्र प्रधान और संजय निषाद
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भाजपा से सबक
2013 में जब अमित शाह यूपी में प्रभारी आए तो उन्होंने सोशल इंजीनियरिंग की तो उन्होंने यह महसूस किया कि ओबीसी सपा के साथ हैं और यादव और दूसरे ओबीसी और जाटव और दलित-पिछड़े मायावती के साथ हैं। इसलिए भाजपा ने गैर जाटव और गैर यादव पर भाजपा ने फोकस किया। अनुप्रिया पटेल की अपना दल (एस) और ओम प्रकाश राजभर की पार्टी के साथ हाथ मिलाया। इसका नतीजा यह हुआ है कि लोकसभा चुनाव में यूपी से 70 से ज्यादा सीटें मिली। 2017 के विधानसभा चुनाव में 300 से ज्यादा सीटें मिली।
सपा के एक नेता के मुताबिक हर बार चुनाव में कुछ राजनीतिक समीकरण अलग हो जाता है। सभी समुदाय का समर्थन हासिल होता है तो पार्टी की व्यापक तस्वीर बनती है इसलिए ब्राह्मणों के पास भी पहुंचने की कोशिश की है और गैर-सवर्णों की ओर भी देख रहे हैं।
प्रोफेसर बद्री नारयण कहते हैं निषाद पार्टी का भाजपा के साथ जो गठबंधन हुआ है उसे कामयाब मिल सकती है। निषाद पार्टी में पैठ बनाने की कोशिश में सपा को इसका आंशिक फायदा मिलने की संभावना है क्योंकि भाजपा ने निषाद पार्टी से दोस्ती करके पहले ही बढ़त हासिल कर ली है।