दिल्ली विश्वविद्यालय के एक प्रोफेसर के अनुसार
इतिहास विचारधारा के अनुसार अपनी मनमर्जी से 'छेड़छाड़' की चीज नहीं है। यह प्रमाणों, तर्कों और साक्ष्यों के ऊपर निर्भर करती है। किसी भी वस्तु पर दो अलग-अलग विचारधारा के लोगों की राय अलग-अलग हो सकती है, लेकिन छात्रों के संपूर्ण विकास के लिए इस तथ्य को सामने रखते हुए दोनों विचारों को पेश करना चाहिए, जिससे छात्र सभी विचारों को पढ़कर एक उचित निष्कर्ष स्थापित कर सकें। यदि ऐसा नहीं किया जाता है तो किसी भी एक विचारधारा के साथ अन्याय होता है।
वर्तमान में इतिहास के पुनर्लेखन की जो कोशिशें चल रही हैं, इसमें भी दुर्भाग्य से वही गलती दोहराई जा रही है जो कभी इसके पहले राष्ट्रवादी विचारधारा के साथ हुई थी। उस समय राष्ट्रवादी विचारधारा को पर्याप्त महत्व नहीं दिया गया था, तो अब वामपंथी विचारधारा को पर्याप्त महत्व नहीं दिया जा रहा है। इससे एक बार फिर इतिहास की एक विशेष विचारधारा से प्रभावित होने का खतरा पैदा हो गया है। यह उचित नहीं है।