फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

पूर्ण राज्य और केंद्रशासित प्रदेश में क्या है अंतर

Mon, 05 Aug 2019 01:33 PM IST
पंखुड़ी सिंह न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
विज्ञापन
विज्ञापन
भारत को राज्यों का संघ कहा जाता है जिसमें 29 राज्य हैं। जिनमें से 7 केंद्र शासित प्रदेश है। दिल्ली, अंडमान और निकोबार द्वीपसमूह, चंडीगढ़, दादरा और नगर हवेली, दमन और दीव, लक्षद्वीप और पुडुचेरी ये सभी राज्य केंद्र शासित प्रदेशों के तहत आते हैं।  केंद्र शासित प्रदेश में केंद्र सरकार द्वारा बनाए गए कानून के तहत काम होता है। हालांकि भले ही यहां मुख्यमंत्री को जनता चुनकर भेजती है। संविधान के अनुसार यहां के कार्यों को करने का अधिकार सीधे राष्ट्रपति को होता है। अंडमान-निकोबार, दिल्ली और पुडुचेरी का कार्यभार उपराज्यपाल संभालता है। इन राज्यों में राज्यपाल को मु्ख्यमंत्री से ज्यादा अधिकार होते हैं। वहीं पूर्ण राज्य दर्जा प्राप्त राज्यों में राज्य सरकार का मुखिया मुख्यमंत्री होता है। यहां के सभी विकास कार्यों का निर्णय मुख्यमंत्री अपने मंत्रिमंडल की मदद से लेता है। 
विज्ञापन

 

केंद्रीय सरकार द्वारा उठाए गए कदम के बाद आने वाले समय में 28 राज्य और 9 केंद्र शासित प्रदेश हो सकते हैं क्योंकि जम्मू और कश्मीर को केंद्र शासित प्रदेश बनाने का प्रस्ताव रखा गया है। साथ ही, लद्दाक को भी जम्मू और कश्मीर से अलग करके केंद्र शासित प्रदेश बनाने का प्रस्ताव रखा गया है। ऐसे में ये जानना जरूरी है कि भारत में केंद्र शासित प्रदेशों को बनाने की जरुरत क्यों पड़ी? 

भारत में केंद्र शासित प्रदेश क्यों बनाए गए इसके पीछे की वजह भी खास है जैसे, जैसे छोटा आकार और कम जनसंख्या, अलग संस्कृति,अन्य राज्यों से दूरी, प्रशासनिक महत्व, स्थानीय संस्कृतियों की सुरक्षा करना, शासन के मामलों से संबंधित राजनीतिक उथल-पुथल को दूर करना और सुरक्षा की दृष्टि से महत्वपूर्ण स्थिति।  दिल्ली, चंडीगढ़ और पुडुचेरी जैसे केंद्र शासित राज्यों के अलावा सभी केंद्र शासित प्रदेश अन्य राज्यों से बहुत दूर हैं, इस कारण इनके अन्य राज्यों के साथ आर्थिक और सामाजिक संबंध नही बन सकते हैं।

ऐसे में इन केंद्र शासित प्रदेशों में किसी भी आपातकालीन स्थिति को सिर्फ केंद्र सरकार संभाल सकती है। भारत में सभी केंद्र शासित प्रदेशों का आकार इतना बड़ा नहीं है कि उन्हें एक पूर्ण राज्य का दर्जा दिया जा सके। दिल्ली के अलावा अन्य केंद्र शासित प्रदेशों में बहुत कम आबादी है और एक राज्य की तुलना में जमीन का क्षेत्रफल भी बहुत कम है, इसलिए विधानसभा का गठन और उसके लिए मंत्रिपरिषद बनाने से सरकारी खजाने पर अतिरिक्त बोझ पड़ेगा। 

लक्षद्वीप और अंडमान और निकोबार द्वीप हमारे देश के बहुत दूर पश्चिम और पूर्व छोर पर स्थित हैं और वे मुख्य क्षेत्र से काफी दूर हैं। इसलिए केंद्र सरकार के जरिए उन्हें सीधे नियंत्रित करना आसान है क्योंकि वे भारत के लिए रणनीतिक रूप से बहुत महत्वपूर्ण हैं और किसी भी आपातकालीन स्थिति में भारत सरकार सीधे वहां कार्यवाही कर सकती है। 

चंडीगढ़ पहले पंजाब का एक हिस्सा था। बाद में पंजाब को विभाजित किया गया और 1 नवंबर 1966 को हरियाणा राज्य अस्तित्व में आया लेकिन चंडीगढ़ के प्रशासनिक महत्व के कारण कोई भी राज्य इसे छोड़ने को तैयार नहीं था। यही वजह थी चंडीगढ़ को दोनों राज्यों की संयुक्त राजधानी बनाया गया था। 

दिल्ली भारत का राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र है। यह भारत का राजधानी शहर था, लेकिन इसके पास अपना उच्च न्यायालय, मुख्यमंत्री और मंत्रिपरिषद होने के कारण इसे 1991 में अर्द्ध-राज्य का दर्जा दिया गया था। दमन और दीव में पुर्तगीज का शासन था लेकिन 1961 में भारतीय सेना द्वारा इस पर बलपूर्वक कब्जा कर लिया गया और गोवा के साथ इसे भी केंद्रशासित प्रदेश बनाया गया था लेकिन गोवा को 1987 में पूर्ण राज्य का दर्जा दिया गया था और दमन और दीव केंद्र शासित प्रदेश हैं। 

दादरा और नगर हवेली में 1779 तक मराठाओं का फिर 1954 तक पुर्तगाली साम्राज्य का शासन था। इस प्रदेश को भारत में 11 अगस्त 1961 में शामिल किया गया था। आईएएस अधिकारी (केजी बदलानी) को एक दिन के लिए दादरा और नगर हवेली का प्रधानमंत्री बनाया गया था जहां उन्होंने औपचारिक रूप से भारत के साथ विलय करने के लिए हस्ताक्षर किए थे। 

अंडमान निकोबार द्वीप समूह और लक्षद्दीप द्वीप समूह भारत की सुरक्षा के लिए ये बहुत महत्वपूर्ण हैं। इन दोनों के संघीय राज्य होने के दो कारण हैं-
1.वे किसी भी राज्य में विलय किए जाने के लिए बहुत दूर हैं।
2.उनकी संस्कृति पूरी तरह अलग है इसलिए उन्हें किसी भी राज्य के साथ विलीन करना प्रशासनिक दृष्टि से ठीक नही है। अंडमान निकोबार द्वीप समूह पर जारवा जनजाति रहती है जो अभी भी आदिम जिंदगी जी रही है और उनकी संस्कृति से छेड़छाड़ करना भारत सरकार द्वारा अपराध घोषित किया गया है।
विज्ञापन

जम्मू-कश्मीर के हिंदू शासक हरी सिंह ने शुरुआत में स्वतंत्र अस्तित्व बनाए रखने के लिए भारत और पाकिस्तान से समझौते की कोशिश की थी। राज्य की मुस्लिम बहुल आबादी भी शेख अब्दुल्ला के नेतृत्व में स्वतंत्रता की पक्षधर थी। इसी बीच अक्टूबर 1947  में पाकिस्तानी सेना ने कबाइलियों के वेश में कश्मीर पर आक्रमण कर दिया। महाराजा हरी सिंह ने भारत से मदद की अपील की लेकिन भारत में पहले विलय पात्र पर हस्ताक्षर की शर्त रखी। 26 अक्टूबर 1947  को कश्मीर के महाराजा ने प्रधानमंत्री मेहर चंद महाजन को भारत के साथ विलय पात्र पर हस्ताक्षर के लिए भेजा। इसके बाद भारतीय सेना ने कश्मीर में हस्तक्षेप किया। मार्च 1948 में शेख अब्दुल्ला जम्मू-कश्मीर के प्रधानमंत्री बने। अगस्त 1948 को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के हस्तक्षेप से युद्धविराम लागू हुआ और इस तरह जम्मू-कश्मीर का भारत में विलय हुआ। 
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें