किसी भी दुष्कर्म पीड़िता के लिए टू-फिंगर टेस्ट दोबारा उसके सम्मान पर हमले के समान माना जाता है। इस पर सुप्रीम कोर्ट प्रतिबंध लगा चुका है। फिर भी देश में यह जारी है। अभी यह अचानक क्यों चर्चा में आ गया है.....
हाल में ही एयरफोर्स की एक महिला अधिकारी का टू-फिंगर टेस्ट (किसी महिला के साथ दुष्कर्म की पुष्टि करने के लिए होने वाला परीक्षण) करने के मामले के बाद यह टेस्ट एक बार फिर सुर्खियों में है। कोयंबटूर में इंडियन एयरफोर्स की एक महिला अधिकारी ने अपने सहयोगी फ्लाइट लेफ्टिनेंट पर दुष्कर्म का आरोप लगाया है। महिला अधिकारी की शिकायत पर छत्तीसगढ़ के रहने वाले फ्लाइट लेफ्टिनेंट अमितेश हरमुख को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है।
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महिला अधिकारी का आरोप है कि दुष्कर्म की पुष्टि के लिए उसका टू फिंगर टेस्ट किया गया जिससे उसे गहरा सदमा पहुंचा है। राष्ट्रीय महिला आयोग ने इस पर कड़ी आपत्ति जताई है। महिला आयोग की अध्यक्ष रेखा शर्मा ने एयर चीफ मार्शल को पत्र भी लिखा है और इस मामले पर कार्रवाई की मांग की है।
महिला पर अविश्वास के कारण बनी यह व्यवस्था
महिला संगठनों का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट के प्रतिबंध के बाद भी यौन उत्पीड़न की शिकायत करने वाली किसी भी महिला पर अविश्वास करने की वजह से यह पूरी व्यवस्था बनी है और यह पूर्वाग्रही रवैया है। दूसरी तरफ संवेदनशीलता की कमी यौन उत्पीड़न के मामलों से निपटने के लिए आवश्यक सहानुभूति और संवेदनशीलता की कमी के कारण अब भी इस तरह का परीक्षण जारी है।
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क्या है सुप्रीम कोर्ट का फैसला
2013 में, शीर्ष अदालत ने लिलु राजेश बनाम हरियाणा राज्य के मामले में कहा कि टू-फिंगर टेस्ट का नहीं किया जाना चाहिए क्योंकि यह असंवैधानिक है। कोर्ट ने इस टेस्ट पर सख्त टिप्पणी करते हुए कहा था कि पीड़िता के पिछले यौन अनुभव को ध्यान में रखकर इसे सहमति के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए। यह टेस्ट पॉजिटिव भी आ जाए तो नहीं माना जा सकता है कि संबंध सहमति से बने हैं। शीर्ष अदालत ने इसे दुष्कर्मी पीड़िता की निजता और उसके सम्मान का हनन करने वाला परीक्षम करार दिया था। कोर्ट ने कहा था कि यह शारीरिक और मानसिक चोट पहुंचाने वाला टेस्ट है।
सुप्रीम कोर्ट
- फोटो : एएनआई
प्रतिबंध के बाद भी परीक्षण जारी
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट के इस टेस्ट पर प्रतिबंध लगाने के बाद भी यह टू-फिंगर टेस्ट होता रहा है। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक 2019 में ही करीब 1500 दुष्कर्म पीड़ितों ने अपनी शिकायत में कहा था कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद उनका यह टेस्ट किया गया।
कुछ कानून जानते नहीं, जो जानते हैं वे परवाह करते नहीं
सुप्रीम कोर्ट की वरिष्ठ अधिवक्ता कमलेश जैन बताती हैं कि सुप्रीम कोर्ट आदेश तो कई देता है लेकिन उसका उल्लंघन भी होता रहता है। बहुत सारे डॉक्टर्स और कई पुलिस अफसरों को भी इस कानून के बारे में नहीं पता है। जो जानते भी हैं वे उसकी परवाह नहीं करते हैं, क्योंकि कानून या आदेश का उल्लंघन करने पर उन्हें सजा ही नहीं मिलती है। इसलिए किसी महिला के आरोप की सत्यता जानने के लिए टू फिंगर टेस्ट जैसे अपमानजनक तरीके का इस्तेमाल किया जाता है।
साल 2014 में केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने दुष्कर्म पीड़ितों के इलाज के लिए नए दिशा-निर्देश बनाए हैं। उन दिशानिर्देशों के दायरे में, प्रत्येक अस्पताल में पीड़ित की चिकित्सा और फोरेंसिक जांच के लिए एक अलग कमरा होने की उम्मीद थी। साथ ही इस दिशानिर्देश में भी टू-फिंगर टेस्ट को अवैज्ञानिक बताते हुए गैरकानूनी करार दिया गया। 2014 में इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च ने भी टू-फिंगर टेस्ट को अवैज्ञानिक माना था।
डब्लूएचओ ने माना परीक्षण अनैतिक
विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्लूएचओ) के अनुसार, इस तरह का परीक्षण "अनैतिक" है, क्योंकि संदिग्ध दुष्कर्म के मामलों में केवल हाइमन की जांच पर अक्सर सवाल होते हैं। डब्लूएचओ यह भी मानता है कि मानवाधिकारों के उल्लंघन के अलावा, इस तरह का परीक्षण "अतिरिक्त दर्द का कारण बन सकता है और यौन हिंसा के उसी घटना की पुनरावृति होती है जिससे पीड़िता पहले ही गुजर चुकी है। इससे पीड़िता को फिर से आघात और पीड़ा पहुंचती है।"
2010 में गैर सरकारी संस्था ह्यूमन राइट्स वॉच ने एक रिपोर्ट जारी की थी। जिसमें महिलाओं, कार्यकर्ताओं, वकीलों और डॉक्टरों और इस तरह के परीक्षण से गुजरने वाली महिलाओं से साक्षात्कार के आधार पर इस तरह के परीक्षण पर प्रतिबंध लगाने की मांग की थी। ह्यूमन राइट्स वॉच की महिला अधिकार शोधकर्ता अरुणा कश्यप ने मीडिया को दिए एक बयान में कहा था, "यह परीक्षण दुष्कर्म पीड़िता पर एक और हमला है, इससे महिला के अपमान का खतरा और बढ़ जाता है।
संवेदनशील दृष्टिकोण की जरूरत
महिला संगठनों का कहना है कि यौन उत्पीड़न के मामलों के एक संवेदनशील दृष्टिकोण की जरूरत है। शुरुआती शिकायत जिसे मिलती है उससे लेकर डॉक्टर, पुलिस और खुद अदालत को भी ऐसे मामलों में सहानुभूति और करुणा दिखाने की जरूरत है।
जनवादी महिला समिति की पूर्व राष्ट्रीय महासचिव जगमती सांगवान ने मानती हैं कि टू फिंगर टेस्ट तो पीड़िता पर दोबारा यौन हमले की तरह है। उनका कहना है कि क्या बड़े पदों पर बैठे लोग इस कानून से वाकिफ नहीं है, यदि नहीं है तो यह सरकार की जिम्मेवारी है कि महिला सुरक्षा और महिला अधिकार से जुड़े मुद्दों को लेकर अफसरों को संवेदनशील बनाया जाए। उन्होंने इस घटना के जिम्मेवार लोगों को कटघरे में लाने की मांग की। सांगवान का यह भी कहना है कि दरअसल दुष्कर्म पीड़िता के लिए समाज का एक पक्षपातपूर्ण व्यवहार होता है और टू फिंगर टेस्ट उसकी एक बानगी है।
दुष्कर्म पीड़िता को सहना पड़ता है अपमान
ह्यूमन राइट्स वॉच की 2017 की एक रिपोर्ट भी इस बात पर प्रकाश डालती है कि दुष्कर्म पीड़ितों के लिए पुलिस में शिकायत दर्ज करना मुश्किल होता है। उन्हें अक्सर पुलिस थानों और अस्पतालों में अपमान सहना पड़ता है। महिलाओं के लिए इस बारे में बात करने भर से बहुत सारी सामाजिक बाधाएं सामने आ जाती हैं। उसके बाद पुलिसिया और अदालती कार्रवाई में भी महिला को अपमानजनक स्थिति से गुजरना पड़ता है।
कमलेश जैन के मुताबिक ऐसे में यदि किसी महिला का टू फिंगर टेस्ट होता है तो यह पीड़ित को और शर्मिंदा कर देता है। प्रभावी कानूनी सहायता इस तरह के पूर्वाग्रह को दूर करने में मदद कर सकती है और इस पर पर्याप्त जागरूकता फैलाने की जरूरत है।