भारत की छवि बेहतर
उन्होंने बताया कि भारत अफगानिस्तान के लोगों के दिलों में बसता है। इसका बड़ा कारण हमारे एतिहासिक सांस्कृतिक-आर्थिक संबंध रहे हैं, लेकिन इसके साथ ही भारत ने पिछले 15-20 सालों में अफगानिस्तान में अनेक तरह के निर्माण कर लोगों की जिंदगी को बेहतर करने में बड़ी भूमिका निभाई है। इससे लोग भारत के बेहद करीब आए हैं।
अफगानिस्तान के युवाओं को भारतीय प्रतिनिधियों द्वारा योग, कला, क्रिकेट और अनेक सांस्कृतिक गतिविधियों में प्रशिक्षण देकर उन्हें आधुनिकता का अनुभव कराया जा रहा था। यहां की महिलाएं भारतीय महिलाओं की तरह सज-धज कर स्वयं के आधुनिक होने का अनुभव किया करती थीं, लेकिन अब यह सब उनके लिए एक सपने की तरह बीता हुआ कल है। वे एक बार फिर एक लबादे के पीछे कैद कर दी गई हैं। अब उनकी जिंदगी में फिर से अंधेरा छा गया है।
अफगानिस्तान आर्थिक तौर पर पूरी तरह ध्वस्त हो चुका है। पहले यहां के कर्मचारियों का भ्रष्टाचार लोगों को भुखमरी के कगार पर ला रहा था तो अब उनके पास कुछ होने का कोई अर्थ नहीं रह गया है। कोई संपत्ति कब छीन ली जाए, कहा नहीं जा सकता।
यहां के लोगों के बीच भारत को उसी तरह देखा जाता है जैसे बेहतर करियर के लिए भारत के युवा अमेरिका या यूरोपीय देशों की ओर देखते हैं। अफगानिस्तान के युवा भारतीय संस्थाओं से बेहतर करियर का प्रशिक्षण लेकर भारत या यूरोपीय देशों में जाना पसंद करते हैं। लेकिन सांस्कृतिक करीबी होने के नाते उनकी पहली पसंद भारत ही है। यहां के अनेक परिवारों से उनके खून के रिश्ते भी उन्हें भारत आने के लिए प्रेरित करते हैं।
पाकिस्तान से दूरी
पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान ने अफगानिस्तान में तालिबान शासन की वापसी को गुलामी की जंजीरें तोड़ने के समान बताया है। लेकिन अफगानिस्तान के लोगों के बीच पाकिस्तान एक खलनायक की तरह देखा जा रहा है। लोगों को लग रहा है कि तालिबान के जरिए उनकी जिंदगी को खराब करने में पाकिस्तान ने ही सबसे बड़ी भूमिका निभाई है। अफगानी लोग पाकिस्तान को दुश्मन देश की तरह देख रहे हैं।
बेकार नहीं जाएगा भारत का प्रयास
अफगानिस्तान में काम कर चुके वरिष्ठ अधिकारी मानते हैं कि इस पहाड़ी देश में भारत ने जो भी प्रयास किए हैं, वे व्यर्थ नहीं जाएंगे। अफगानिस्तान के युवाओं ने आधुनिकता की जो रोशनी भारत जैसे देशों के माध्यम से देखी है, वह देर-सबेर यहां का अंधियारा मिटाने के लिए काम करेगा। भारत ने कुछ बीज रोपे हैं, वे देर-सबेर लोकतंत्र का पेड़ बनकर उभरेंगे। अगर कभी संभव हुआ और अफगानिस्तान लोगों के द्वारा चुनी हुई सरकार की तरफ आगे बढ़ सका तो तालिबान को सहमति देने वाले देशों की स्थिति अफगानिस्तान के संदर्भ में बेहद खराब होगी।