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कहानी रघुकुल की, जानिए श्रीराम की वंशावली

सार

  • कहानी रघुकुल और उसकी वंशावली की
  • वाल्मीकि रामायण और रामचरितमानस के राम 
  • इक्ष्वाकु वंश के गुरु वशिष्ठ के अनुसार श्री राम की वंशावली का वर्णन
  • क्या भगवान राम के वंशजों में से कोई अब भी अयोध्या में रह रहा है?
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राम वंशावली - फोटो : amar ujala
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विस्तार
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कोरोना वायरस के बढ़ते संक्रमण की चेन को तोड़ने के लिए पूरे भारत में लॉकडाउन लागू किया गया है। लॉकडाउन के कारण इस समय पूरा देश अपने घरों में बंद है। घरों में बंद रहने के कारण बोरियत महसूस होना स्वभाविक सी बात है। हालांकि भारत सरकार ने लोगों के मनोरंजन को ध्यान में रखते हुए दूरदर्शन और प्रसार भारती पर रामानंद सागर की बेहद लोकप्रिय रामायण का प्रसारण फिर से शुरू कर दिया है।

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हिंदू धर्म में आस्था रखने वाले लोगों में रामायण का खास महत्व है। इस महाकाव्य में हिंदू रघुवंश के राजा मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम की कहानी है। ऐसे में राम के जन्म से लेकर उनके वंशावली के बारे में विस्तार से जानना बेहद दिलचस्प हो जाता है। भगवान श्री राम की कहानी का मनमोहक वर्णन वाल्मीकि रामायण और रामचरितमानस समते कई श्रेत्रीय भाषाओं की लोककथाओं में मिलता है। तो आइए जानते हैं मर्यादा, नैतिकता, विनम्रता, करुणा, क्षमा, धैर्य, त्याग और पराक्रम के सर्वश्रेष्ठ उदाहरण राम से जुड़ी जानकारियों के बारे में विस्तार से...

 

सुर समूह बिनती करि पहुंचे निज निज धाम

श्रीराम - फोटो : lord ram

राम जन्म की कहानी 

सुर समूह बिनती करि पहुंचे निज निज धाम।
जग निवास प्रभु प्रगटेउ अखिल लोक विश्राम॥

गोस्वामी तुलसीदास ने रामचरितमानस के बालकांड में एक दोहे के माध्यम से श्री राम के प्रकट होने की बात कही।

सुर समूह बिनती करि पहुंचे निज निज धाम।
जगनिवास प्रभु प्रगटे अखिल लोक बिश्राम॥191॥

मतलब देवताओं के समूह विनती करके अपने-अपने लोक में जा पहुंचे। समस्त लोकों को शांति देने वाले, जगदाधार प्रभु प्रकट हुए।

राम जन्म की कहानी 

श्रीराम - फोटो : amar ujala
तुलसीदास द्वारा रचित रामचरितमानस के प्रथम सोपान बालकाण्ड में श्रीराम की विशेषता और सब कारणों के कारण और सबसे श्रेष्ठ का वर्णन करते हुए लिखा है कि,

यन्मायावशवर्तिं विश्वमखिलं ब्रह्मादिदेवासुरा
यत्सत्वादमृषैव भाति सकलं रज्जौ यथाहेर्भ्रमः।
यत्पादप्लवमेकमेव हि भवाम्भोधेस्तितीर्षावतां
वन्देऽहं तमशेषकारणपरं रामाख्यमीशं हरिम् (श्लोक ।।6।।) 


जिसका अर्थ है "जिनकी माया के वशीभूत सम्पूर्ण विश्व, ब्रह्मादि देवता और असुर हैं, जिनकी सत्ता से रस्सी में सर्प के भ्रम की भांति यह सारा दृश्य जगत सत्य ही प्रतीत होता है और जिनके केवल चरण कमल ही भवसागर से तरने की इच्छा वालों के लिए एकमात्र नौका है, उन समस्त कारणों से पर राम कहलाने वाले भगवान हरि की मैं वंदना करता हूं।

हरि अनंत हरि कथा अनंता

महर्षि वाल्मीकि - फोटो : amar ujala
तुलसीदास ने रामचरितमानस के "बालकाण्ड" के प्रथम श्लोक से सातवें श्लोक तक इस बात को लिखा हैं कि राम एक पौराणिक पुरुष हैं इसका वर्णन रामचरितमानस में मिलता है

नानापुराणनिगमागमसम्मतं यद् रामायणे निगदितं क्वचिदन्यतोऽपि।
स्वान्तःसुखाय तुलसी रघुनाथगाथा-भाषानिबन्धमतिमञ्जुलमातनोति।।7।।


जिसका अर्थ बिलकुल साफ हैं कि, अनेक पुराण, वेद और (तंत्र) शास्त्र से सम्मत तथा जो रामायण में वर्णित है और कुछ अन्यत्र से भी उपलब्ध श्री रघुनाथजी की कथा को तुलसीदास अपने अन्तःकरण के सुख के लिए अत्यन्त मनोहर भाषा रचना में विस्तृत करते है॥7॥

इक्ष्वाकु वंश यानि रघुवंश की कहानी 

सीता राम विवाह
अयोध्या मामले पर जब सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पांच न्यायाधीशों की पीठ ने रामलला विराजमान के वरिष्ठ अधिवक्ता से यह सवाल पूछा "क्या भगवान राम के वंशज अब भी अयोध्या में हैं?"
पांच न्यायधीशों की पीठ ने रामलला विराजमान के वरिष्ठ अधिवक्ता के पराशरन यह भी साफ कहा कि यह सवाल जिज्ञासा के तहत पूछा जा रहा है, मगर इस पर रामलला के अधिवक्ता ने जवाब दिया, इसका पता लगाने की जरूर कोशिश करेंगे कि कोई वंशज अभी अयोध्या में हैं।

क्या भगवान राम के वंशजों में से कोई अब भी अयोध्या में रह रहा है ? 
इस सवाल के साथ एक बड़ी बहस शुरू हुई और जिज्ञासा भी मन मे उठी कि रघुवंश की वंशावली क्या हैं? आइए जानते हैं श्री राम की वंशावली के बारे में

इक्ष्वाकु के पुत्र कुक्षि से प्रभु राम के पुत्र लव- कुश तक

राम वंशावली - फोटो : अमर उजाला

इक्ष्वाकु वंश के गुरु वशिष्ठ जी थे जिन्होंने इस प्रकार श्री राम की वंशावली का वर्णन किया।

  • ब्रह्मा जी से मरीचि का जन्म हुआ। मरीचि के पुत्र कश्यप थे। कश्यप के पुत्र विवस्वान हुए, विवस्वान के वैवस्वत मनु हुए और वैवस्वत मनु के पुत्र इक्ष्वाकु
  • इक्ष्वाकु के पुत्र कुक्षि थे।
  • कुक्षि के पुत्र का नाम विकुक्षि था।
  • विकुक्षि के पुत्र बाण
  • बाण के पुत्र अनरण्य हुये।
  • अनरण्य से पृथु
  • पृथु से त्रिशंकु का जन्म हुआ था
  • त्रिशंकु के पुत्र धुन्धुमार
  • धुन्धुमार के पुत्र युवनाश्व हुए
  • युवनाश्व के पुत्र मान्धाता हुये और
  • मान्धाता से सुसन्धि का जन्म हुआ।
  • सुसन्धि के दो पुत्र हुये- ध्रुवसन्धि एवं प्रसेनजित। 
  • ध्रुवसन्धि के पुत्र भरत हुये। 
  • भरत के पुत्र असित हुये और 
  • असित के पुत्र सगर हुये। 
  • सगर के पुत्र का नाम असमञ्ज था। 
  • असमञ्ज के पुत्र अंशुमान 
  • अंशुमान के पुत्र दिलीप हुये। 
  • दिलीप के पुत्र भगीरथ हुये
  • भागीरथ के पुत्र ककुत्स्थ 
  • ककुत्स्थ के पुत्र रघु हुये। 
  • रघु बहुत पराक्रमी और तेजस्वी राजा थे और उनका प्रताप अत्यधिक था जिसकी वजह से इस वंश का नाम रघुवंश पड़ा। 
  • रघु के पुत्र प्रवृद्ध हुये
  • प्रवृद्ध के पुत्र शंखण 
  • शंखण के पुत्र सुदर्शन हुये। 
  • सुदर्शन के पुत्र अग्निवर्ण 
  • अग्निवर्ण के पुत्र शीघ्रग 
  • शीघ्रग के पुत्र मरु
  • मरु के पुत्र प्रशुश्रुक 
  • प्रशुश्रुक के पुत्र का नाम अम्बरीश
  • अम्बरीश के पुत्र का नाम नहुष
  • नहुष के पुत्र ययाति 
  • ययाति के पुत्र नाभाग 
  • नाभाग के पुत्र का नाम अज
  • अज के पुत्र दशरथ 
  • राजा दशरथ के चार पुत्र हुए श्री रामचन्द्र, भरत, लक्ष्मण तथा शत्रुघ्न। 
  • श्री रामचंद्र के दो पुत्र लव और कुश हुए।

परिचय: मर्यादा पुरुषोत्तम राम का

श्रीराम - फोटो : अमर उजाला
विष्णु के सातवें अवतार श्रीराम का जन्म चैत्र माह, शुक्ल नवमी के दिन अयोध्या में हुआ था
  • पिता: दशरथ 
  • माता: कौशल्या 
  • गुरु: वशिष्ठ, विश्वामित्र
  • पत्नी : सीता 
  • पुत्र : लव और कुश
  • सौतेली मां: सुमित्रा और कैकेयी 
  • भाई: लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न
  • कुल: इक्ष्वाकु
(संदर्भ ग्रंथ: वाल्मीकि रामायण )

कैसे कहलाया रघुवंश "रघुकुल"  

रामचरितमानस - फोटो : amar ujala
गंगा पृथ्वी पर कैसे आयी
राजा दिलीप के पुत्र भागीरथ ने अपनी तपोबल से गंगा को पृथ्वी पर लाये थे 

कैसे कहलाया रघुवंश "रघुकुल"
रघु के बहुत पराक्रमी और तेजस्वी राजा थे और उनका प्रताप अत्यधिक था जिसकी वजह से इस वंश का नाम रघुवंश पड़ा। 

इक्ष्वाकु ने स्थापित की अयोध्या 
इक्ष्वाकु ने अपनी राजधानी अयोध्या को बनाया और इस तरह से इक्ष्वाकु वंश यानि रघुकुल की स्थापना हुई।

वाल्मीकि रामायण के अनुसार : एक कथा 

राम सीता लक्ष्मण वन गमन
एक बार महर्षि वाल्मीकि अपने आश्रम में बैठे हुये थे और अचानक महर्षि नारद वाल्मीकि जी के आश्रम में पहुंच गए। ऋषि वाल्मीकि उन्हे देखकर बहुत प्रसन्न हुये और उनसे कुशल-मंगल पूछकर एक प्रश्न नारद जी से किया।

"हे मुने! आप सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में भ्रमण करते हैं,सभी प्रकार के प्राणियों के बीच विचरण करते हैं। इसलिये कृपा करके यह बताए  कि इस समय सारे भूमण्डल और नौ द्वीपों में ऐसा कौन सा मेधावी, विद्वान, परोपकारी, धर्मात्मा तथा समस्त सद्गुणों से परिपूर्ण व्यक्ति है जो मनुष्य मात्र का ही नहीं बल्कि सबका कल्याण करने के लिए तत्पर रहता हो? जिसने अपने पराक्रम और त्याग से सम्पूर्ण इन्द्रियों, विषय-वासनाओं एवं मन को वश में कर लिया हो, जो कभी क्रोध, अहंकार जैसी गलत प्रवृतियों के वशीभूत न होता हो ? यदि ऐसा कोई महा पुरुष हैं तो आप उसके विषय में मुझे बताये उसकी पुण्य कथा सुन कर मैं कृतार्थ होना चाहता हूं।"

कोन्वस्मिन् सांप्रतं लोके गुणवान् कश्च वीर्यवान् ।
धर्मज्ञश्च कृतज्ञश्च सत्यवाक्यो दृढव्रतः ॥ २ ॥

चारित्रेण च को युक्तः सर्वभूतेषु को हितः ।
विद्वान् कः कः समर्थश्च कश्चैकप्रियदर्शनः ॥ ३ ॥


और उसका उत्तर बालकांड के प्रथम सर्ग के तीसरे  श्लोक मे नारद जी देते हैं 
इक्ष्वाकुवंशप्रभवो रामो नाम जनैः श्रुतः ।
नियतात्मा महावीर्यो द्युतिमान् धृतिमान् वशी ॥ ८ ॥

बुद्धिमान् नीतिमान् वाग्मी श्रीमाञ्छत्रुनिबर्हणः ।
विपुलांसो महाबाहुः कंबुग्रीवो महाहनुः ॥ ९ ॥

महोरस्को महेष्वासो गूढजत्रुररिन्दमः ।
आजानुबाहुः सुशिराः सुललाटः सुविक्रमः ॥ १० ॥

समः समविभक्ताङ्गः स्निग्धवर्णः प्रतापवान् ।
पीनवक्षा विशालाक्षो लक्ष्मीवाञ्छुभलक्षणः ॥ ११ ॥

धर्मज्ञः सत्यसंधश्च प्रजानां च हिते रतः ।
यशस्वी ज्ञानसंपन्नः शुचिर्वश्यः समाधिमान् ॥ १२ ॥

प्रजापतिसमः श्रीमान् धाता रिपुनिषूदनः ।
रक्षिता जीवलोकस्य धर्मस्य परिरक्षिता ॥ १३ ॥

रक्षिता स्वस्य धर्मस्य स्वजनस्य च रक्षिता ।
वेदवेदाङ्गतत्त्वज्ञो धनुर्वेदे च निष्ठितः ॥ १४ ॥

सर्वशास्त्रार्थतत्त्वज्ञः स्मृतिमान् प्रतिभानवान् ।
सर्वलोकप्रियः साधुरदीनात्मा विचक्षणः ॥ १५ ॥


महर्षि वाल्मीकि का यह प्रश्न सुनकर नारद जी ने उत्तर दिया, इक्ष्वाकु वंश में उत्पन्न हुए राम का चरित्र बिलकुल ऐसा ही हैं वो वीर्यवान, तेजस्वी, विद्वान, धैर्यशील, जितेन्द्रिय,पराक्रमी, मर्यादा पुरुषोत्तम, प्रजावत्सल हैं। रामायण में वाल्मीकि नारद जी से पूछते हैं।

इक्ष्वाकुवंशे प्रभवो रामो नाम जनैः श्रुतः

श्रीराम दरबार
वाल्मीकि रामायण के अनुसार प्रभु राम ‘इक्ष्वाकु वंश’ में उत्पन्न हुए। राम की वंशावली का चित्रण महाकवि कालिदास द्वारा रचित ‘रघुवंश’ नामक महाकाव्य के अंतिम चार सर्गों में भी विस्तारपूर्वक वर्णन मिलता है।

इक्ष्वाकु वंश प्रभवो रामो नाम जनैः श्रुतः 
नियत आत्मा महावीर्यो द्युतिमान् धृतिमान्वशी ||


जिसका अर्थ हैं कि इक्ष्वाकु वंश प्राचीन भारत के शासकों का एक वंश है। इनकी उत्पत्ति सूर्यवंशियों में से हुई थी। 

 
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जान आदिकबि नाम प्रतापू। भयउ सुद्ध करि उलटा जापू॥

गोस्वामी तुलसीदास - फोटो : Amar Ujala
श्रीरामचरितमानस के बालकांड में श्री राम नाम वंदना और नाम महिमा का वर्णन हैं जिसके अंतर्गत एक चौपाई में वर्णित है,

बंदउँ नाम राम रघुबर को। हेतु कृसानु भानु हिमकर को॥
बिधि हरि हरमय बेद प्रान सो। अगुन अनूपम गुन निधान सो॥1॥


महामंत्र जोइ जपत महेसू। कासीं मुकुति हेतु उपदेसू॥
महिमा जासु जान गनराऊ। प्रथम पूजिअत नाम प्रभाऊ॥2॥ 


जान आदिकबि नाम प्रतापू। भयउ सुद्ध करि उलटा जापू॥
सहस नाम सम सुनि सिव बानी। जपि जेईं पिय संग भवानी॥3॥ 
श्रीरामचरितमानस के बालकांड  ( चौपाई )


इसका भावार्थ है, रामनाम के प्रताप को गहराई तक जानते हैं, जिसका उल्टा नाम ('मरा', 'मरा') जपकर भी वो पवित्र हो गए। श्री शंकरजी इस वचन की महिमा बताते हैं कि, एक राम-नाम सहस्र नाम के समान है और पार्वतीजी सदा अपने पति श्री शिवजी के साथ राम-नाम का जप करती रहती हैं।
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