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Infosys: 'शुरुआती दिनों में स्टोररूम में रखे बक्से पर सोना पड़ा', नारायण मूर्ति ने याद किया US में बिताया समय

Sun, 07 Jan 2024 03:13 PM IST
काव्या मिश्रा न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

‘एन अनकॉमन लव: द अर्ली लाइफ ऑफ सुधा एंड नारायण मूर्ति’ किताब में मूर्ति दंपति के शुरुआती वर्षों के बारे में बताया गया है, जिसमें उनके उनकी शादी से लेकर माता-पिता बनने तक की कहानी है।
 
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नारायण मूर्ति और सुधा मूर्ति - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
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विस्तार
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इंफोसिस के संस्थापक नारायण मूर्ति के जीवन से जुड़े कई दिलचस्प किस्से सामने आए हैं। दरअसल, भारतीय-अमेरिकी लेखिका चित्रा बनर्जी दिवाकरुणी ने नारायण मूर्ति और उनकी पत्नी सुधा मूर्ति के जीवन के शुरुआती वर्षों के बारे में बताते हुए एक पुस्तक लिखी है। इस पुस्तक में उनके बारे में कई बातें बताई गई हैं। इसमें बताया गया कि कैसे एक बार मूर्ति को स्टोररूम में एक बड़े बक्से पर सोना पड़ा था। 

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इंफोसिस के शुरुआती दिनों में जब नारायण मूर्ति एक बार किसी काम के सिलसिले में अमेरिका गए थे तो एक तुनकमिजाज के अमेरिकी व्यवसायी ने उन्हें अपने घर के स्टोररूम, जहां खिड़की भी नहीं थी, उसमें रखे एक बड़े बक्से पर सुलाया था, जबकि कारोबारी के घर में चार बेडरूम थे। 

जगरनॉट बुक्स द्वारा प्रकाशित ‘एन अनकॉमन लव: द अर्ली लाइफ ऑफ सुधा एंड नारायण मूर्ति’ में मूर्ति दंपति के शुरुआती वर्षों के बारे में बताया गया है, जिसमें उनके उनकी शादी से लेकर माता-पिता बनने तक की कहानी है।
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समय पर नहीं करते थे भुगतान
किताब में बताया गया है कि न्यूयॉर्क स्थित कंपनी ‘डाटा बेसिक्स कॉरपोरेशन’ के प्रमुख डॉन लिल्स एक तेज-मिजाज वाले इंसान थे और वह मूर्ति को ज्यादा पसंद नहीं करते थे। वह अक्सर काम के बदले में भुगतान करने में देरी करते थे और इस बात को लेकर मूर्ति उनके गुस्से का निशाना बन जाते थे, वह अपनी बात पर अड़े रहते थे और सेवाओं के लिए समय पर भुगतान करने से इनकार कर देते थे। जब मूर्ति और उनके इंफोसिस सहयोगियों को मैनहट्टन में उनसे मिलने जाना होता था तो डॉन उन्हें होटल बुक करने के लिए समय पर अनुमति नहीं देते थे।

स्टोररूम में सोना पड़ा था
इतना ही नहीं, एक बार जब मूर्ति काम के लिए अमेरिका गए तो डॉन ने उन्हें सोने के लिए स्टोररूम में भेज दिया, जहां एक खिड़की भी नहीं थी। वहां रखे एक बड़े बक्से पर उन्होंने अपनी रात बिताई। जबकि ऐसा नहीं था कि डॉन के घर में बेडरूम की कोई कमी थी। उनके घर में चार बेडरूम थे। इसके अलावा, डॉन ने अंतिम समय पर कई मांगें रखीं, जिन्हें मूर्ति को पूरा करना पड़ा था।

मूर्ति ने अपनी नई कंपनी के खातिर डॉन के ऐसे व्यवहार को सहन किया। हालांकि, बक्से पर सुलाने वाली घटना ने उन्हें झकझोर दिया। उन्होंने अपनी पत्नी सुधा से कहा, 'मेरी मां कहा करती थीं कि मेहमान भगवान के समान होता है और आप जिस तरह मेहमानों के साथ व्यवहार करते हैं उससे पता चलता है कि आप वास्तव में किस तरह के इंसान हैं।'

मां भूखी सो जाती थी
उन्होंने सुधा को गुस्से में बताया, 'बचपन में जब पिता जी किसी को अचानक बुला लेते थे तो मां अपने हाथ से बना खाना परोसती थीं और खुद बिना खाए सो जाती थीं। यहां डॉन ने मुझे स्टोररूम सोने के लिए दिया, जहां एक खिड़की भी नहीं थी। चारों तरफ डिब्बे रखे हुए थे। मुझे एक बड़े बक्से पर सोने के लिए खुद अपने बिस्तर पर नींद का आनंद ले रहा था।'

इसलिए मना किया पत्नी को काम नहीं करने के लिए
पुस्तक में यह भी बताया गया कि कैसे एक अच्छी इंजीनियर होने के बावजूद मूर्ति अपनी पत्नी के इन्फोसिस में शामिल होने के खिलाफ थे। 

नारायण मूर्ति ने बताया कि एक शाम को हम सब खाना खा रहे थे, तभी सुधा ने कंपनी में काम करने का विचार रखा। इस पर उन्होंने साफ मना कर दिया कि वह काम नहीं कर सकतीं। उन्होंने कहा, 'मेरा मानना था कि हम दोनों एक कंपनी में काम नहीं कर सकते। मैं नहीं चाहता था कि मेरी कंपनी में भी परिवार के स्वामित्व वाले व्यवसायों की वही डरावनी कहानियां हों जिन्हें वंशवादी या भाई-भतीजावाद के रूप में माना जाता है।' 

उन्होंने सुधा से कहा कि वह बहुत योग्य हैं और किसी के पास इस तरह का दृढ़ संकल्प नहीं है। लेकिन अगर वह शामिल होती हैं तो इंफोसिस एक पेशेवर कंपनी के बजाय पति-पत्नी की कंपनी बन जाएगी।

दिवाकरुणी ने किताब में बताया कि सुधा और मूर्ति में कन्नड़ पृष्ठभूमि और पढ़ने के लिए उनके प्यार के कारण बहुत सारी बातें एक जैसी थी। हालांकि, दोनों का बचपन काफी अलग था। मूर्ति एक कट्टर समाजवादी थे, जो एक किशोर के रूप में अपने पिता के विचारों के साथ-साथ जवाहरलाल नेहरू की सोवियत संघ की खुली प्रशंसा से प्रभावित थे।

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