बेटी ने दावा किया था कि उसे सूचना के अधिकार (आरटीआई) अधिनियम के माध्यम से कुछ दस्तावेज मिले हैं, जिनसे यह पता चलता है कि उसकी दाऊदी बोहरा समुदाय से आने वाली सौतेली मां का उसके पिछले पति से वैध रूप से तलाक नहीं हुआ था। जुलाई 2019 में परिवार अदालत ने बेटी की याचिका पर विचार करने से इनकार कर दिया, क्योंकि सौतेली मां ने कुछ फैसलों के हवाला देते हुए कहा था कि याचिकाकर्ता उनकी शादी के मामले में अजनबी है, इसलिए वह कानूनी रूप से विवाह की वैधता को लेकर सवाल नहीं उठा सकती।
फैमिली कोर्ट ने यह भी कहा था कि चूंकि बेटी ने अपने पिछले किसी भी मामले में चाहें वह सिविल कोर्ट में हो या बॉम्बे हाईकोर्ट में, शादी को अमान्य करने के लिए नहीं कहा था। ऐसे में उसे अब अपनी याचिका दायर करने की अनुमति नहीं दी जा सकती।
परिवार अदालत के आदेश को दी हाईकोर्ट में चुनौती
बेटी ने इस आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। गत मई में हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट के आदेश को पलट दिया। हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा था कि इस तरह की स्थिति में एक बच्चे को अजनबी नहीं कहा जा सकता है। वह भी तब जब उसके पिता का निधन हो गया हो और उसके द्वारा दावा किया गया हो कि उसे पिता की दूसरी शादी को अमान्य साबित करने के सुबूत मिले हैं।
हाईकोर्ट ने कहा था कि बेटी फैमिली कोर्ट एक्ट के तहत अपने पिता की शादी की वैधता और अपनी सौतेली मां की शादी की स्थिति को लेकर मामला लड़ सकती है। साथ ही हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट को छह महीने के भीतर बेटी द्वारा अपने पिता की दूसरी शादी की वैधता को चुनौती वाली याचिका का निपटारा करने का आदेश दिया था।
हाईकोर्ट के आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट पहुंची सौतेली मां
हाईकोर्ट के आदेश को अब सौतेली मां ने वकील गौरव अग्रवाल के माध्यम से सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है। याचिका में गुवाहाटी हाईकोर्ट के 2018 के फैसले का हवाला दिया गया है, जिसमें कहा गया था कि केवल विवाह के पक्षकार ही अपनी शादी और इससे संबंधित अन्य मुद्दों जैसे बच्चों की कस्टडी और भरण-पोषण के संबंध में फैमिली कोर्ट के समक्ष कार्यवाही शुरू कर सकते हैं।
यह फैसला जस्टिस एएस बोपन्ना ने लिखा था, जो उस समय हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश थे और अब सुप्रीम कोर्ट के जज हैं। सौतेली मां की ओर से पेश वरिष्ठ वकील हुजैफा अहमदी की दलीलों को सुनने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने बेटी को नोटिस जारी किया है।