SC Updates: वरिष्ठ वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा कि चुनाव आयोग के आदेश के चलते शरद पवार को अजीत पवार के व्हिप का सामना करना पड़ सकता है। इसलिए मामले पर जल्द सुनवाई होनी चाहिए।
चुनाव आयोग की तरफ से राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (राकांपा) का नाम और चुनाव चिह्न अजित पवार के गुट को दिए जाने के खिलाफ शरद पवार गुट ने याचिका दायर कर सुप्रीम कोर्ट से जल्द सुनवाई की मांग की गई है।
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वरिष्ठ वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने मामले को तत्काल सूचीबद्ध करने का उल्लेख करते हुए कहा कि चुनाव आयोग के आदेश के चलते शरद पवार को अजीत पवार के व्हिप का सामना करना पड़ सकता है। इसलिए मामले पर जल्द सुनवाई होनी चाहिए। भारत के मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि वह मामले की तत्काल सुनवाई पर गौर करेगी।
क्या था चुनाव आयोग का फैसला?
राकांपा के दो धड़े बनने के बाद छह महीने से अधिक समय तक पार्टी पर हक को लेकर चुनाव आयोग में सुनवाई चली। 10 से ज्यादा सुनवाई के बाद चुनाव आयोग ने एनसीपी में विवाद का निपटारा किया और अजित पवार के नेतृत्व वाले गुट के पक्ष में फैसला सुनाया था। अब एनसीपी का नाम और चुनाव चिह्न 'घड़ी' अजित पवार के पास रहेगा। इस फैसले पर शरद पवार के धड़े ने नाराजगी जताई थी। वहीं, महाविकास अघाड़ी में उनकी साथी रही उद्धव शिवसेना और कांग्रेस ने भी चुनाव आयोग के फैसले का विरोध किया था और कोर्ट जाने की बात कही थी।
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शिक्षक भर्ती घोटाला: तृणमूल विधायक के बेटे को जमानत
उच्चतम न्यायालय ने पश्चिम बंगाल शिक्षक भर्ती ''घोटाले'' से संबंधित धनशोधन के एक मामले में तृणमूल कांग्रेस विधायक माणिक भट्टाचार्य के बेटे सौविक भट्टाचार्य को शुक्रवार को जमानत दे दी। सौविक भट्टाचार्य को पिछले साल इस मामले में निचली अदालत ने तलब किया था और उन्होंने आत्मसमर्पण कर दिया था जिसके बाद उन्हें न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया था। शीर्ष अदालत ने इस तथ्य पर ध्यान दिया कि सौविक ने आत्मसमर्पण किया और इस तथ्य के बावजूद न्यायिक हिरासत में चला गया कि उसे विशेष रूप से आरोपी के रूप में नहीं बुलाया गया था। न्यायमूर्ति बेला एम त्रिवेदी और न्यायमूर्ति पंकज मित्तल की पीठ ने यह कहते हुए राहत दी कि सौविक को आरोपी के तौर पर तलब करने संबंधी कोई विशिष्ट आदेश पारित नहीं किया गया था।
तीन तलाक: याचिका को लंबित मामलों के साथ जोड़ने का निर्देश
उच्चतम न्यायालय ने शुक्रवार को 2019 के तीन तलाक कानून के कुछ प्रावधानों की वैधता पर सवाल उठाने से जुड़ी याचिका को जो उसे दंडनीय बनाते हैं को एक साथ चलाने का निर्देश दिया। इस कानून का उल्लंघन करने पर तीन साल तक की कैद हो सकती है। प्रधान न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़, न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला और न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा की पीठ ने याचिका पर उन लंबित याचिकाओं के साथ सुनवाई करने पर सहमति व्यक्त की, जिन पर 2019 में केंद्र को नोटिस जारी किए गए थे। यह नई याचिका उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ निवासी आमिर रशादी मदनी ने दायर की है।
शीर्ष अदालत ने बर्खास्त कर्मचारी को बहाल किया, कहा- हाईकोर्ट और CM को सीधे आवेदन देना कदाचार नहीं
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जब चतुर्थ श्रेणी का कर्मचारी आर्थिक रूप से परेशान होता है और ऐसे में सीधे अपने वरिष्ठ को अभ्यावेदन भेज देता है तो इसे अपने आप में कोई बड़ा कदाचार नहीं माना जा सकता। इसके लिए सेवा से बर्खास्तगी की सजा देना गलत है। शीर्ष कोर्ट ने रिश्वतखोरी व जातिगत भेदभाव के झूठे आरोप लगाने और उचित चैनल के बिना सीधे ही इलाहाबाद हाईकोर्ट और मुख्यमंत्री को अभ्यावेदन भेजने के आधार पर 2007 में बर्खास्त यूपी की एक जिला अदालत के चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी छत्रपाल को बहाली करने का निर्देश दिया।
सुप्रीम कोर्ट ने एक डॉक्टर को लाइसेंस के बिना अपने क्लीनिक में एलोपैथिक दवाओं की छोटी मात्रा का भंडारण करने के लिए दी गई दो साल कारावास की सजा को रद्द कर दिया है। पीठ ने कैद की सजा की बजाय डॉक्टर की सजा को एक लाख रुपये जुर्माने के भुगतान तक सीमित कर दिया, क्योंकि जब्त की गई दवाएं ड्रग्स और कॉस्मेटिक्स अधिनियम, 1940 के तहत कम मात्रा में थीं। पीठ ने पाया कि डॉक्टर का इरादा उन्हें वितरित करने या बेचने का नहीं था।