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Supreme Court: झारखंड सरकार और कार्यवाहक DGP को नोटिस जारी, छत्तीसगढ़ में नन के खिलाफ कार्यवाही पर लगी रोक

Fri, 06 Sep 2024 11:09 AM IST
अभिषेक दीक्षित न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

न्यायमूर्ति संजीव खन्ना और जस्टिस संजय कुमार की पीठ ने कहा कि सिंघल 16 महीने से जेल में हैं और सुनवाई जल्द खत्म होने की संभावना नहीं है। पीठ ने कहा कि अपीलकर्ता अपना पासपोर्ट जमा कराए। कोर्ट की अनुमति के बिना वह भारत नहीं छोड़ सकते।
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सुप्रीम कोर्ट - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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सुप्रीम कोर्ट ने धनशोधन मामले में भूषण स्टील के पूर्व प्रमोटर नीरज सिंघल को जमानत दे दी है। दरअसल, भूषण स्टील के पूर्व प्रवर्तक नीरज सिंघल पर 46,000 करोड़ रुपये की कथित बैंक धोखाधड़ी से उपजे धनशोधन मामले में कार्रवाई की गई थी। इसी मामले में जमानत के लिए उन्होंने शीर्ष कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। इस पर कोर्ट ने शुक्रवार को फैसला सुनाया।

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न्यायमूर्ति संजीव खन्ना और जस्टिस संजय कुमार की पीठ ने कहा कि सिंघल 16 महीने से जेल में हैं और सुनवाई जल्द खत्म होने की संभावना नहीं है। पीठ ने कहा कि अपीलकर्ता अपना पासपोर्ट जमा कराए। कोर्ट की अनुमति के बिना वह भारत नहीं छोड़ सकते। यदि कोई उल्लंघन होता है तो अभियोजन पक्ष के पास जमानत के फैसले को वापस लेने के लिए याचिका लगाने का विकल्प होगा।

सिंघल ने दिल्ली हाईकोर्ट के आठ जनवरी के आदेश के खिलाफ अपील की है, जिसमें उनकी जमानत याचिका खारिज कर दी गई थी। हाईकोर्ट ने मामले में प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) द्वारा उनकी गिरफ्तारी को चुनौती देने वाली उनकी याचिका भी खारिज कर दी थी। इसे भी उच्चतम न्यायालय में चुनौती दी गई है। ईडी ने उच्च न्यायालय में कहा था कि सिंघल सबसे बड़े बैंकिंग धोखाधड़ी में शामिल थे। इसमें धनशोधन का अपराध भी शामिल है। इससे 46,000 करोड़ रुपये से अधिक के सार्वजनिक धन की हानि हुई।

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जमानत की शर्त के रूप में यूट्यूब चैनल बंद करने के आदेश पर रोक
सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को मद्रास हाईकोर्ट उच्च न्यायालय के उस निर्देश पर रोक लगा दी, जिसमें यूट्यूबर फेलिक्स जेराल्ड को जमानत देने की शर्तों के तहत अपना चैनल ‘रेडपिक्स 24x7’ बंद करने का निर्देश दिया गया था। जेराल्ड को अपने यूट्यूब चैनल पर एक अन्य यूट्यूबर सवुक्कू शंकर का आपत्तिजनक साक्षात्कार प्रसारित करने के लिए गिरफ्तार किया गया था। शंकर ने मद्रास उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों और राज्य की महिला पुलिस अधिकारियों के खिलाफ साक्षात्कार के दौरान कुछ टिप्पणियां की थीं। उच्च न्यायालय ने दोनों यूट्यूबर को जमानत देते हुए जेराल्ड को एक शर्त के रूप में अपना चैनल बंद करने को कहा था।

क्रिकेट खिलाड़ियों के लिए सुविधाओं की मांग वाली जनहित याचिका खारिज
शीर्ष अदलत ने शुक्रवार को बंबई उच्च न्यायालय के उस आदेश को चुनौती देने वाली याचिका खारिज कर दी, जिसमें मुंबई में सार्वजनिक मैदानों पर अभ्यास या अनौपचारिक मैच के दौरान क्रिकेट खिलाड़ियों को पेयजल और अन्य सुविधाएं प्रदान करने के निर्देश देने संबंधी याचिका का निपटारा किया गया था। न्यायमूर्ति ए एस ओका और न्यायमूर्ति ए जी मसीह की पीठ ने कहा कि यह किस तरह की जनहित याचिका है? यदि क्रिकेटरों के लिए शौचालय नहीं हैं तो वे खुद ही इसे देखेंगे। किसी वकील को इसकी चिंता क्यों करनी चाहिए। पीठ एक वकील द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई कर रही थी। उच्च न्यायालय ने पिछले वर्ष जून में उसकी याचिका का निपटारा कर दिया था।

झारखंड सरकार और कार्यवाहक डीजीपी को 'सु्प्रीम' नोटिस जारी

सुप्रीम कोर्ट ने झारखंड सरकार और राज्य के कार्यवाहक डीजीपी अनुराग गुप्ता को डीजीपी की नियुक्ति को रद्द करने के निर्देश देने की मांग वाली याचिका पर नोटिस जारी किया है। सुप्रीम कोर्ट ने मुख्य सचिव एल खियांगते और कार्यवाहक डीजीपी से अवमानना याचिका पर जवाब मांगा है, जिसमें कहा गया है कि अनुराग गुप्ता को शीर्ष अदालत के फैसले का उल्लंघन करते हुए अनौपचारिक आधार पर नियुक्त किया गया था, जिसमें राज्यों में डीजीपी की नियुक्ति के लिए प्रक्रियाएं निर्धारित की गई थीं।

ITAT में रिक्तियों पर विचार किया जा रहा है- सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को बेंगलुरू स्थित बार निकाय को बताया कि वह आयकर अपीलीय न्यायाधिकरणों (आईटीएटी) में रिक्तियों से संबंधित मुद्दों पर विचार कर रहा है। जैसे ही मुख्य न्यायाधीश डी वाई चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला और न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा की पीठ सूचीबद्ध मामलों की सुनवाई के लिए एकत्रित हुई, बेंगलुरू बार एसोसिएशन (बीबीए) का प्रतिनिधित्व करने वाले एक वकील ने शहर में आईटीएटी में रिक्तियों के बारे में उल्लेख किया। हम मामले पर विचार कर रहे हैं... हम लंबित रिक्तियों के मुद्दे पर विचार करेंगे, सीजेआई ने कहा और जल्द सुनवाई का आश्वासन दिया। आईटीएटी देश में प्रत्यक्ष करों से संबंधित कानूनों के तहत अपीलों से निपटने के लिए एक अर्ध न्यायिक निकाय है और इसके आदेशों के खिलाफ अपील उच्च न्यायालयों में की जा सकती है।

SC ने नन के खिलाफ कार्यवाही पर लगाई रोक

सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को छत्तीसगढ़ में 12 वर्षीय स्कूली छात्रा को आत्महत्या के लिए उकसाने के मामले में शिक्षिका के तौर पर काम कर रही नन के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही पर रोक लगा दी। मामले में जस्टिस हृषिकेश रॉय और पीके मिश्रा की पीठ छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले के अंबिकापुर शहर में कार्मेल कॉन्वेंट स्कूल में शिक्षिका के तौर पर काम कर रही नन सिस्टर मर्सी उर्फ एलिजाबेथ की ओर से हाईकोर्ट के आदेश के खिलाफ दायर अपील पर सुनवाई कर रही थी। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने उनके खिलाफ आपराधिक मामले में आरोपपत्र रद्द करने की उनकी याचिका खारिज कर दी थी। छत्तीसगढ़ पुलिस ने आरोप लगाया था कि शिक्षिका ने 2 फरवरी को छठी कक्षा की छात्रा को फांसी लगाकर आत्महत्या करने के लिए उकसाया था। छत्तीसगढ़ की एक अदालत में भारतीय दंड संहिता की धारा 305 (बच्चे या पागल व्यक्ति को आत्महत्या के लिए उकसाना) के तहत उनके खिलाफ अंतिम रिपोर्ट दाखिल की गई थी।

बॉम्बे HC के आदेश के खिलाफ SC ने खारिज की याचिका

सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को बॉम्बे हाईकोर्ट के आदेश को चुनौती देने वाली उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें मुंबई में सार्वजनिक मैदानों पर अभ्यास या अनौपचारिक मैचों के दौरान क्रिकेट खिलाड़ियों को पेयजल और अन्य सुविधाएं उपलब्ध कराने के निर्देश देने की मांग की गई थी। न्यायमूर्ति एएस ओका और न्यायमूर्ति एजी मसीह की पीठ ने कहा कि यह किस प्रकार की जनहित याचिका है? यदि क्रिकेटरों को शौचालय उपलब्ध नहीं कराया जा रहा है तो इसमें अदालत क्या करेगी? इसे लेकर एक वकील क्यों परेशान है? यह याचिका एक वकील ने हाईकोर्ट की ओर से पिछले साल जून के आदेश को चुनौती देते हुए दायर की थी। हाईकोर्ट के समक्ष दायर अपनी जनहित याचिका में उन्होंने मुंबई क्रिकेट एसोसिएशन और भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड को सार्वजनिक मैदानों पर अभ्यास या अनौपचारिक मैचों के दौरान खिलाड़ियों को पेयजल और अन्य सुविधाएं प्रदान करने के निर्देश देने की मांग की थी। इस याचिका को हाईकोर्ट ने खारिज कर दिया था। इसके बाद वकील ने सुप्रीम अदालत का दरवाजा खटखटाया था। शीर्ष अदालत ने कहा कि जनहित याचिका पर विचार न करके हाईकोर्ट ने उचिता किया था।

अदालतें बच्चे को चल संपत्ति नहीं मान सकतीं- सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि नाबालिग के मामले में बंदी प्रत्यक्षीकरण के मामले से निपटने वाली अदालतें बच्चे को चल संपत्ति नहीं मान सकतीं और कस्टडी में व्यवधान से उन पर पड़ने वाले प्रभाव पर विचार किए बिना उनकी कस्टडी हस्तांतरित नहीं कर सकतीं। बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका किसी ऐसे व्यक्ति को अदालत के समक्ष पेश करने के निर्देश की मांग करते हुए दायर की जाती है जो लापता है या अवैध रूप से हिरासत में लिया गया है। जस्टिस एएस ओका और जस्टिस एजी मसीह की पीठ ने कहा कि ऐसे मुद्दों पर यांत्रिक रूप से निर्णय नहीं लिया जा सकता। अदालत को मानवीय आधार पर कार्य करना होगा। पीठ ने कहा, जब अदालत नाबालिग के संबंध में बंदी प्रत्यक्षीकरण के मुद्दे पर विचार करता है, तो बच्चे को चल संपत्ति नहीं मान सकता और हिरासत में व्यवधान के बच्चे पर पड़ने वाले प्रभाव पर विचार किए बिना हिरासत हस्तांतरित नहीं कर सकता। 

शीर्ष अदालत ने दो साल और सात महीने की एक बच्ची की कस्टडी से जुड़े मामले में अपना फैसला सुनाया। दिसंबर 2022 में उसकी मां की अप्राकृतिक मौत हो गई थी और वह फिलहाल अपनी मौसी के पास है। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के जून 2023 के फैसले को चुनौती देते हुए शीर्ष अदालत में एक याचिका दायर की गई थी, जिसमें मौसी को बच्चे की कस्टडी उसके पिता और दादा-दादी को सौंपने का निर्देश दिया गया था।

हाईकोर्ट में जजों की नियुक्ति पर किसी का विशेषाधिकार नहीं; हिमाचल हाईकोर्ट कॉलेजियम सामूहिक फैसला करे

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि उच्च अदालतों में न्यायिक नियुक्तियों की प्रक्रिया किसी व्यक्ति का विशेषाधिकार नहीं है। शीर्ष अदालत ने हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट कॉलेजियम को दो वरिष्ठतम जिला व सत्र न्यायाधीशों की पदोन्नति पर सामूहिक रूप से पुनर्विचार करना का निर्देश दिया, जिनकी पदोन्नति की अनदेखी की गई थी। जस्टिस ऋषिकेश रॉय और जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्र की पीठ जिला व सत्र न्यायालय के न्यायाधीश चिराग भानु सिंह और अरविंद मल्होत्रा की ओर से दायर याचिका को स्वीकार करते हुए यह टिप्पणी की। पीठ ने कहा, दोनों याचिकाकर्ताओं के नामों पर पुनर्विचार की प्रक्रिया दूसरे न्यायाधीशों के मामले के साथ असंगत पाई गई। कोई सामूहिक चर्चा और विचार-विमर्श नहीं हुआ। ऐसा लगता है कि यह अकेले मुख्य न्यायाधीश का निर्णय है। कॉलेजियम को सामूहिक रूप से विचार-विमर्श करना होगा। दोनों जजों की याचिका स्वीकार करते हुए पीठ ने न्यायाधीशों की नियुक्ति से जुड़े मामलों में कुछ संवेदनशील जानकारी की संरक्षा की आवश्यकता पर भी जोर दिया। पीठ ने कहा ऐसी जानकारी को उजागर करने से केवल किसी व्यक्ति की गोपनीयता ही नहीं, बल्कि प्रक्रिया की अखंडता से भी समझौता होगा।

सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम  के प्रस्ताव को ध्यान में रखें
शीर्ष अदालत ने यह भी फैसला सुनाया कि हाईकोर्ट के कॉलेजियम को 4 जनवरी को सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम की ओर से पारित प्रस्ताव को ध्यान में रखना होगा, जिसमें हाईकोर्ट से याचिकाकर्ताओं के नामों पर विचार करने के लिए कहा गया था। याचिकाकर्ताओं ने अदालत में यह तर्क देते हुए याचिका दायर की थी कि हाईकोर्ट कॉलेजियम ने 4 जनवरी के सर्वोच्च न्यायालय के कॉलेजियम के प्रस्ताव के बावजूद उनके नामों की अनदेखी की।
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कमल चुनाव चिह्न के इस्तेमाल पर रोक की मांग वाली याचिका खारिज

सुप्रीम कोर्ट ने भाजपा को चुनाव चिह्न के रूप में कमल का इस्तेमाल करने से रोकने की मांग वाली याचिका खारिज कर दी। साथ ही अदालत ने मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के आदेश को भी बरकरार रखा, जिसमें मुकदमा खारिज कर दिया गया था। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस पीबी वराले की पीठ ने कहा कि याचिका महज प्रचार के लिए दायर की गई थी। शीर्ष अदालत ने याचिकाकर्ता से पूछा, आप अपने लिए नाम और प्रसिद्धि चाहते हैं और साथ ही हमें भी प्रसिद्धि देना चाहते हैं। याचिका को देखें, आपने किस तरह का दावा किया है। याचिकाकर्ता जयंत विपट ने याचिका में तर्क दिया था कि चूंकि कमल का फूल भारत का राष्ट्रीय फूल है, इसलिए इसे किसी भी राजनीतिक दल को आवंटित नहीं किया जा सकता, क्योंकि ऐसा आवंटन राष्ट्रीय अखंडता के लिए अपमान है। 
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