फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

Supreme Court: कुछ मुकदमे 50 वर्षों से लंबित, सुप्रीम कोर्ट ने कहा- न्यायिक व्यवस्था से भरोसा उठ जाएगा

Fri, 20 Oct 2023 10:43 PM IST
अभिषेक दीक्षित न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
विज्ञापन
supreme court - फोटो : ANI
विज्ञापन

सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को कांग्रेस नेता राहुल गांधी की लोकसभा सदस्यता की बहाली को चुनौती देने वाली एक जनहित याचिका खारिज कर दी। कोर्ट ने याचिकाकर्ता पर एक लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया है। जस्टिस बीआर गवई की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि याचिका कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग है, क्योंकि याचिकाकर्ता के किसी भी मौलिक अधिकार का उल्लंघन नहीं किया गया है।

विज्ञापन


शीर्ष अदालत गांधी की लोकसभा सदस्यता की बहाली को चुनौती देने वाली वकील अशोक पांडे की याचिका पर सुनवाई कर रही थी। सुप्रीम कोर्ट ने चार अगस्त को राहुल गांधी की मोदी उपनाम पर एक टिप्पणी से संबंधित मामले में उनकी सजा पर रोक लगा लगा दी थी। इसके बाद  लोकसभा सचिवालय ने राहुल गांधी की सदस्यता बहाल कर दी थी। कांग्रेस नेता को मार्च 2023 में निचले सदन से अयोग्य घोषित कर दिया गया था।

भाजपा नेता पूर्णेश मोदी ने 2019 में राहुल गांधी के खिलाफ उनके 'सभी चोरों का सामान्य उपनाम मोदी कैसे है?' पर आपराधिक मानहानि का मुकदमा दायर किया था। टिप्पणी 13 अप्रैल, 2019 को कर्नाटक के कोलार में एक चुनावी रैली के दौरान की गई थी।

विज्ञापन

एन. चंद्रबाबू नायडू। - फोटो : ANI
तेदेपा प्रमुख चंद्रबाबू नायडू को गिरफ्तार न करे पुलिस: कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को आंध्र प्रदेश पुलिस से कहा कि वह कौशल विकास घोटाला मामले में याचिका पर फैसला आने तक फाइबरनेट मामले में तेलुगु देशम पार्टी (तेदेपा) के प्रमुख एन चंद्रबाबू नायडू को गिरफ्तार न करे। जस्टिस अनिरुद्ध बोस और न्यायमूर्ति बेला एम त्रिवेदी की पीठ ने फाइबरनेट मामले में नायडू की अग्रिम जमानत संबंधी याचिका को नौ नवंबर को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया। कोर्ट ने आंध्र प्रदेश पुलिस से कहा कि पूर्व में दी गई व्यवस्था को बरकरार रखें। पीठ ने आंध्र प्रदेश पुलिस के 13 अक्तूबर के बयान का भी जिक्र किया, जिसमें कोर्ट ने कहा था कि पुलिस नायडू को हिरासत में नहीं लेगी।

न्यायमूर्ति बोस ने कहा कि चूंकि आदेश एक अन्य याचिका पर सुरक्षित रखा गया है, इसलिए यह उचित होगा कि अदालत के फैसला सुनाए जाने के बाद नायडू की तत्काल याचिका पर विचार किया जाए। नायडू की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता सिद्धार्थ लूथरा ने कहा कि वह (नायडू) कौशल विकास घोटाला मामले में पहले से ही हिरासत में हैं, इसके बावजूद पुलिस फाइबरनेट मामले में उन्हें हिरासत में लेना चाह रही है।

फाइबरनेट मामला पसंदीदा कंपनी को 330 करोड़ रुपये की ‘एपी फाइबरनेट’ परियोजना के चरण-1 के तहत कार्य आदेश आवंटित करने में निविदा में कथित हेरफेर से संबंधित है। आंध्र प्रदेश पुलिस के अपराध जांच विभाग (सीआईडी) ने आरोप लगाया कि निविदा आवंटित करने से लेकर परियोजना को पूरा करने तक अनियमितताएं हुईं, जिससे राज्य के खजाने को भारी नुकसान हुआ।

चंद्रबाबू नायडू (73) को 2015 में मुख्यमंत्री रहते हुए कौशल विकास निगम से कथित रूप से धन का गबन करने के मामले में नौ सितंबर को गिरफ्तार किया गया था। इस कथित घोटाले से सरकारी खजाने को 371 करोड़ रुपये का नुकसान होने का दावा किया गया। नायडू राजामहेंद्रवरम केंद्रीय जेल में न्यायिक हिरासत में हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने बीआरएस की याचिका खारिज की; कहा लोग कार और रोड रोलर के बीच अंतर समझते हैं
सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को भारत राष्ट्र समिति (बीआरएस) की उस याचिका पर विचार करने से इन्कार कर दिया, जिसमें चुनाव आयोग को यह निर्देश देने की मांग की गई थी कि वह तेलंगाना में होने वाले विधानसभा चुनाव में उसके ’कार’ जैसे चुनाव चिह्न किसी को नहीं दे।

पार्टी ने दावा किया कि रोड रोलर जैसे चुनाव चिह्न किसी भी उम्मीदवार को नहीं दिए जाने चाहिए क्योंकि इससे उसके कार चुनाव चिह्न को लेकर भ्रम पैदा होगा। जस्टिस अभय एस ओका और जस्टिस पंकज मिथल की पीठ ने कहा कि भारतीय मतदाता इतने बुद्धिमान हैं कि कार और रोड रोलर के बीच अंतर कर सकते हैं। दलीलें सुनने के बाद पीठ ने याचिका पर विचार करने से इन्कार कर दिया। वकील विनोद कुमार तिवारी के माध्यम से दायर बीआरएस की याचिका में कहा गया था कि चुनाव आयोग ने उन प्रतीकों को आवंटित किया है जो भ्रामक रूप से समान हैं और 'कार' के समान दिखते हैं। कार याचिकाकर्ता की राजनीतिक पार्टी का प्रतीक है।

याचिका में दावा किया गया कि चुनाव आयोग के इस कदम से राजनीतिक दल पर गंभीर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। याचिका में तर्क दिया गया था कि बीआरएस को दो दशकों से अधिक समय से ’कार’ का चुनाव चिह्न आवंटित किया गया है, जिसे वह सभी चुनावों में लगातार जारी रखता है। इसमें दावा किया गया है कि ’युग तुलसी पार्टी’ को रोड रोलर चुनाव चिह्न और ’एलायंस ऑफ डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स पार्टी’ को बेलन चुनाव चिह्न आवंटित करने का कपटपूर्ण प्रयास किया गया है। याचिका में इस बात पर जोर दिया गया कि ये प्रतीक भ्रामक रूप से समान हैं और ’कार’ के प्रतीक की तरह दिखते हैं।

प्रतिबंध के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट पहुंचा पीएफआई
 पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (पीएफआई) ने गैरकानूनी गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम (यूएपीए) न्यायाधिकरण की ओर से उस पर लगाए गए पांच साल के प्रतिबंध के केंद्र सरकार के फैसले की पुष्टि के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का रुख किया है।

जस्टिस अनिरुद्ध बोस और जस्टिस बेला एम त्रिवेदी की पीठ पीजीआई की याचिका पर सुनवाई करने वाली थी, लेकिन पीठ ने मामले को यह कहते हुए स्थगित कर दिया कि याचिकाकर्ता ने स्थगन का आग्रह किया है। पीएफआई ने अपनी याचिका में यूएपीए ट्रिब्यूनल के 21 मार्च के आदेश को चुनौती दी है, जिसके द्वारा उसने केंद्र के 27 सितंबर, 2022 के फैसले की पुष्टि की थी। केंद्र ने आईएसआईएस जैसे वैश्विक आतंकवादी संगठनों के साथ कथित संबंधों और देश में सांप्रदायिक नफरत फैलाने की कोशिश के लिए पीएफआई पर पांच साल के लिए प्रतिबंध लगा दिया था।

सुप्रीम कोर्ट ने वन अधिनियम में संशोधन को चुनौती पर केंद्र से मांगा जवाब
सुप्रीम कोर्ट ने वन (संरक्षण) अधिनियम में हाल में किए गए संशोधन की संवैधानिकता को चुनौती देने वाली याचिका पर केंद्र सरकार से जवाब मांगा है। जस्टिस बीआर गवई की अध्यक्षता वाली पीठ ने पर्यावरण व वन मंत्रालय और कानून व न्याय मंत्रालय को नोटिस जारी किया है। पीठ सेवानिवृत्त नौकरशाह अशोक कुमार शर्मा और अन्य की तरफ से दायर याचिका पर सुनवाई कर रही थी। याचिका में कहा गया कि संशोधित कानून देश के लंबे समय से चले आ रहे वन प्रशासनिक ढांचे को काफी कमजोर कर देगा। 2023 का संशोधन अधिनियम मनमाने ढंग से वन भूमि में कई श्रेणियों की परियोजनाओं और गतिविधियों की अनुमति देता है और वन संरक्षण अधिनियम के दायरे से छूट भी प्रदान करता है। इन परियोजनाओं और गतिविधियों को इस तरह से परिभाषित किया गया है जिससे व्यापक सार्वजनिक हित की कीमत पर व्यावसायिक गतिविधियों को बल मिले।

इस कानून में देश की सीमाओं के 100 किलोमीटर के भीतर भूमि को संरक्षण कानूनों के दायरे से छूट देने और वन क्षेत्रों में चिड़ियाघर, सफारी और इको-पर्यटन सुविधाओं की अनुमति देने का प्रावधान है।

सुप्रीम कोर्ट पीएफआई से जुड़े मामले में एनआईए की याचिका पर सुनवाई को सहमत
सुप्रीम कोर्ट पीएफआई के आठ कैडरों के खिलाफ यूएपीए के तहत दर्ज मामले में जमानत देने के मद्रास हाईकोर्ट के आदेश को चुनौती वाली एनआईए की याचिका पर सुनवाई को सहमत हो गया है। इस पर अगली सुनवाई 30 अक्तूबर को होगी।

राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) ने अपनी याचिका में दावा किया है कि पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (पीएफआई) एक कट्टरपंथी इस्लामी संगठन है। इसका गठन केवल शरिया कानून से शासित भारत में मुस्लिम शासन स्थापित करने के 'विजन इंडिया 2047' के खतरनाक लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए किया गया था। जस्टिस संजय किशन कौल, जस्टिस सुधांशु धुलिया और जस्टिस मनोज मिश्रा की पीठ के समक्ष याचिका को तत्काल सूचीबद्ध करने का अनुरोध किया गया था। एनआईए की ओर से पेश वकील रजत नायर ने शीर्ष अदालत से मामले को दिन में सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करने का आग्रह किया और कहा कि हाईकोर्ट ने बृहस्पतिवार को आठ आरोपियों को जमानत दे दी।

उत्पीड़न मामले में युवा कांग्रेस अध्यक्ष को सुप्रीम कोर्ट से बड़ी राहत
सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय युवा कांग्रेस के अध्यक्ष बीवी श्रीनिवास को उत्पीड़न के मामले में अग्रिम जमानत दे दी है। जस्टिस बीआर गवई, जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस पीके मिश्र की पीठ ने अपने 17 मई के अंतरिम संरक्षण के आदेश को यह कहते हुए अग्रिम जमानत में बदल दिया कि वह जांच में सहयोग कर रहे हैं। शीर्ष अदालत ने मई के अपने आदेश में श्रीनिवास को इस मामले में गिरफ्तारी से संरक्षण प्रदान किया था।

असम युवा कांग्रेस की अध्यक्ष ने श्रीनिवास के खिलाफ मानसिक उत्पीड़न का मामला दर्ज कराया था जिसमें कहा था कि वह उस पर अश्लील टिप्पणियां करते हैं। इसके बाद कांग्रेस ने असम युवा कांग्रेस अध्यक्ष को पार्टी से निकाल दिया था। गौहाटी हाईकोर्ट ने श्रीनिवास की जमानत याचिका खारिज कर दी थी। 17 मई के अपने आदेश में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि एफआईआर दर्ज कराने में लगभग दो महीने की देरी हुई है। इसको ध्यान में रखते हुए याचिकाकर्ता अंतरिम संरक्षण के योग्य है। शीर्ष अदालत ने कहा था कि इस मामले में अगर श्रीनिवास को गिरफ्तार किया जाता है तो 50,000 की एक या दो मुचलके पर अग्रिम जमानत पर रिहा कर दिया जाएगा।

मामलों के निपटारे में देरी, सुप्रीम कोर्ट ने कहा- न्यायिक व्यवस्था से भरोसा उठ जाएगा

सुप्रीम कोर्ट ने मुकदमे के फैसले में होने वाली देरी पर गंभीर टिप्पणी की है। अदालत ने कहा, अगर कानूनी प्रक्रिया धीमी गति से चलती है तो वादकारियों का मोहभंग हो सकता है। इस टिप्पणी के साथ उच्चतम न्यायालय ने शुक्रवार को पुराने मामलों की तेजी से सुनवाई और निपटान सुनिश्चित करने के लिए कुछ उच्च न्यायालयों समेत अहम निर्देश जारी किए। न्यायमूर्ति एस रवींद्र भट्ट और न्यायमूर्ति अरविंद कुमार की पीठ ने लंबित मामलों पर राष्ट्रीय न्यायिक डेटा ग्रिड (एनजेडीजी) के देशव्यापी आंकड़ों का हवाला भी दिया। पीठ ने कहा कि इस मुद्दे से निपटने के लिए बार और बेंच को संयुक्त रूप से प्रयास करने की जरूरत है।

50-65 साल से लंबित हैं मुकदमे
सुप्रीम कोर्ट ने कहा, "जब कानूनी प्रक्रिया धीमी गति से चलती है तो वादी निराश हो सकते हैं। हमने अपनी पीड़ा व्यक्त की है जहां एनजेडीजी के अनुसार कुछ मुकदमे 50 वर्षों से लंबित हैं।" अदालत ने नोट किया कि पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों के कुछ मामलों में 65 साल में भी फैसला नहीं हो सका। जस्टिस भट्ट की पीठ ने 11 निर्देश जारी किए। पीठ में शामिल न्यायमूर्ति अरविंद कुमार ने कहा, अब फैसले लेने का समय आ गया है। न्याय किसी का इंतजार नहीं करता। सभी उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीशों से अनुरोध किया गया है और त्वरित न्याय सुनिश्चित करने के लिए ट्रायल कोर्ट को निर्देश जारी किए जाएं।" अदालत ने क्या निर्देश दिए हैं, इसका तब पता चलेगा जब फैसला शीर्ष अदालत की वेबसाइट पर अपलोड किया जाएगा।
विज्ञापन

PMLA वैधता: सुप्रीम कोर्ट ने दोहराया- व्यक्तिगत नहीं, केवल कानूनी मुद्दों का निपटारा

सुप्रीम कोर्ट ने दोहराया कि धन शोधन निवारण अधिनियम (पीएमएलए) के प्रावधानों की वैधता को बरकरार रखने के मामले में अदालत सिर्फ ‘कानूनी मुद्दों’ से निपटेगा और व्यक्तिगत मामलों में नहीं जाएगा। शीर्ष अदालत ने जुलाई 2022 के फैसले पर पुनर्विचार की अपील पर सुनवाई के दौरान यह टिप्पणी की। जस्टिस संजय किशन कौल की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय विशेष पीठ अंतरिम आवेदन पर सुनवाई कर रही थी। याचिकाकर्ता को ईडी ने कोयला परिवहन और स्टील व लोहे के छर्रे आदि के उत्पादन पर अवैध लेवी की कथित उगाही से संबंधित मनी लॉन्ड्रिंग मामले में तलब किया है। जस्टिस कौल ने कहा, जब मामला (18 अक्तूबर को) उठाया गया था, तो हमने कहा था कि हम सिर्फ कानूनी मुद्दों पर विचार करेंगे, व्यक्तिगत मुद्दों पर नहीं। हम दोहराते हैं कि विशेष पीठ के लिए इस कार्यवाही से उत्पन्न होने वाले सभी अंतरिम मामलों से निपटना संभव नहीं है।

मामले की तत्काल सुनवाई पर केंद्र की आपत्ति
केंद्र की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने ईडी के वकील को इसके बारे में सूचित किए बिना मामले को तत्काल सूचीबद्ध करने के लिए 16 अक्तूबर को इसका उल्लेख किए जाने पर आपत्ति जताई। उन्होंने कहा, मामले के एक आरोपी ने प्रवर्तन मामले की सूचना रिपोर्ट (ईसीआईआर) को रद्द करने की मांग करते हुए शीर्ष अदालत में एक अलग याचिका दायर की थी। वह याचिका एक अन्य पीठ के समक्ष सुनवाई के लिए आई थी। मेहता ने कहा कि याचिका वापस ले ली गई है। याचिका में की गई मांग बिल्कुल वैसी है जैसी कि अब विशेष पीठ के समक्ष है।

कार्रवाई से सुरक्षा की मांग
याचिकाकर्ता के वकील ने कहा, आवेदक को ईडी ने बुलाया था लेकिन यह स्पष्ट नहीं है कि उसे गवाह के रूप में बुलाया गया था या आरोपी के रूप में। आवेदक ने उत्पीड़नात्मक कार्रवाई से सुरक्षा की मांग की है। मेहता ने कहा, ईडी ने अदालत में एक हलफनामा भी दायर किया है।
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें