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Supreme Court: तमिलनाडु मनी लॉन्ड्रिंग केस में बालाजी की मेडिकल रिपोर्ट तलब, 'ज्ञानवापी' पर दिसंबर में सुनवाई

Mon, 20 Nov 2023 04:22 PM IST
ज्योति भास्कर न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

सुप्रीम कोर्ट में सोमवार को कई अहम मामलों पर सुनवाई हुई। तमिलनाडु के मनी लॉन्ड्रिंग मामले में अदालत ने डीएमके नेता सेंथिल बालाजी की नई मेडिकल रिपोर्ट मांगी है। इसके अलावा उत्तर प्रदेश के ज्ञानवापी मस्जिद केस पर एक दिसंबर को सुनवाई होगी।
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सुप्रीम कोर्ट - फोटो : ANI
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विस्तार
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तमिलनाडु के मनी लॉन्ड्रिंग मामले में सुप्रीम कोर्ट ने मुख्यमंत्री एमके स्टालिन की डीएमके सरकार में मंत्री रहे सेंथिल बालाजी से नवीनतम मेडिकल रिपोर्ट मांगी है। अदालत ने बालाजी से मेडिकल रिपोर्ट मांगने के बाद मामले की सुनवाई 28 नवंबर को तय की। बता दें कि मनी लॉन्ड्रिंग मामले में द्रमुक सरकार में पूर्व मंत्री वी सेंथिल बालाजी को प्रवर्तन निदेशालय ने गिरफ्तार किया है। जमानत की अपील पर संक्षिप्त सुनवाई के दौरान सोमवार को उच्चतम न्यायालय ने बालाजी के वकील को नवीनतम मेडिकल रिपोर्ट पेश करने का निर्देश दिया।
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बता दें कि शीर्ष अदालत मद्रास उच्च न्यायालय के एक आदेश के खिलाफ दायर बालाजी की अपील पर सुनवाई कर रही थी। हाईकोर्ट ने करीब एक महीने पहले, बीते 19 अक्तूबर को बालाजी की जमानत याचिका खारिज कर दी थी। उच्च न्यायालय का मानना है कि जमानत मिलने पर वह गवाहों को प्रभावित कर सकते हैं।

तमिलनाडु वाले मामले में सुप्रीम कोर्ट में दायर अपील पर न्यायमूर्ति बेला एम त्रिवेदी और न्यायमूर्ति एससी शर्मा की पीठ में सुनवाई हुई। वरिष्ठ वकील और पूर्व अटॉर्नी जनरल मुकुल रोहतगी बालाजी की ओर से पैरवी कर रहे हैं। रोहतगी ने तर्क दिया कि बालाजी कई बीमारियों से पीड़ित हैं और उनके मस्तिष्क की एमआरआई रिपोर्ट चिंताजनक है। उन्होंने मेडिकल रिपोर्ट का हवाला देते हुए सुप्रीम कोर्ट को बताया कि अगर बालाजी का जल्द इलाज नहीं किया गया तो उन्हें स्ट्रोक होने का खतरा है।
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दलीलों को सुनने के बाद शीर्ष अदालत ने कहा कि यह बहुत गंभीर नहीं लगता है और पुरानी समस्या लगती है। ईडी की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि ये पुराने, पुराने मुद्दे हैं। दोनों पक्षों की संक्षिप्त दलीलों को सुनने के बाद अदालत ने बालाजी की नवीनतम मेडिकल रिपोर्ट पेश करने को कहा। 

गौरतलब है कि बालाजी की जमानत याचिका खारिज करते हुए उच्च न्यायालय ने कहा था कि जमानत पर रिहा करने के बाद ही उनकी स्वास्थ्य देखभाल की जा सकती है, ऐसी स्थिति नहीं दिखाई देती। उच्च न्यायालय ने कहा, बालाजी की स्वास्थ्य रिपोर्ट से इतर उनके पिछले आचरण पर भी टिप्पणी की थी। उच्च न्यायालय ने कहा था, ''निश्चित रूप से, जमानत पर रिहा होने पर, वह प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से गवाहों को प्रभावित करेगा या उनके उत्पीड़न का कारण बनेगा।'' 

सुप्रीम कोर्ट के अनुसार, डीएमके सरकार ने गिरफ्तारी के बाद भी बालाजी को बिना विभाग के मंत्री बनाए रखा है। उनकी वर्तमान स्थिति और उनके भाई अशोक कुमार का गायब होना मामले को गंभीर बनाता है। इसके अलावा केंद्रीय एजेंसियों की कार्रवाई के दौरान आयकर अधिकारियों पर हमले की घटना भी चिंताजनक है। बता दें कि कथित तौर पर पहले तलाशी के दौरान करूर में बालाजी के समर्थकों ने अधिकारियों को निशाना बनाया था। तमाम कारणों के आधार पर हाईकोर्ट ने बालाजी को जमानत देने से इनकार कर दिया था।

बता दें कि सेंथिल बालाजी को करीब पांच महीने पहले गिरफ्तार किया था। बीते 14 जून को ईडी ने नौकरी के बदले नकदी घोटाले से जुड़े मनी लॉन्ड्रिंग मामले में बालाजी को गिरफ्तार किया। गिरफ्तारी के समय खूब ड्रामा भी हुआ था। बालाजी के रोने की तस्वीरें भी वायरल हुई थी। गिरफ्तारी के बाद ईडी की गिरफ्त में ही उनका इलाज भी कराया गया। बालाजी पूर्ववर्ती अन्नाद्रमुक शासन के दौरान परिवहन मंत्री भी रह चुके थे।

ज्ञानवापी मस्जिद मामले में सुनवाई की तारीख अगले महीने

सोमवार को शीर्ष अदालत में एक अन्य बड़ा मामला उत्तर प्रदेश से आया। वाराणसी के इस बहुचर्चित मुकदमे में सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई की अगली तारीख एक दिसंबर के लिए स्थगित कर दी। इस मामले में वाराणसी में ज्ञानवापी मस्जिद से संबंधित पक्षों की दलीलें सुनी जाएगी। बता दें कि काशी विश्वनाथ मंदिर के बगल में बनी ज्ञानवापी मस्जिद में शिवलिंग बरामद होने और पूजा के अधिकार को लेकर कानूनी जिरह हो रही है। मामले में पुरातात्विक सर्वेक्षण भी कराए गए हैं।


बच्चे को गोद लेना मामला: राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को सुप्रीम कोर्ट का अहम निर्देश
सोमवार को दिन के एक अन्य बड़े मामले में चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली तीन जजों की पीठ ने बच्चों को गोद लेने के मामले पर सुनवाई की। अदालत ने राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को निर्देश दिया है कि गोद लिए जा सकने वाले बच्चों की पहचान के लिए पहला अभियान सात दिसंबर तक पूरा किया जाए। अदालत ने सोमवार को सुनवाई में कहा कि हर दो महीने में ऐसे बच्चों की पहचान के लिए अभियान चलाया जाए। ऐसे बच्चों की पहचान उन संस्थाओं में की जानी है जो बच्चों की केयर करने के लिए चलाए जा रहे हैं। अदालत ने इन बच्चों को छोड़ दिए गए (Abandoned) और सरेंडर किए गए (Surrendered) यानी OAS श्रेणी में माना है। अदालत ने सभी प्रदेशों में 31 जनवरी, 2024 तक विशेषज्ञ अडॉप्शन एजेंसी (SAA) की स्थापना का निर्देश भी दिया है।

उत्तराधिकार मामले में सुप्रीम कोर्ट ने याचिका खारिज की
शीर्ष अदालत में सोमवार को एक अन्य बड़ा मामला उत्तराधिकार के कानून से जुड़ा आया। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने याचिका खारिज कर दी। मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरियत) एप्लिकेशन एक्ट, 1937 से जुड़े इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मामला विधायिका का है। इससे जुड़ा कानून बनाने के बाद ही मामलों की सुनवाई हो सकती है। शीर्ष अदालत ने कहा कि अलग-अलग धर्मों के लोगों के लिए पर्सनल लॉ अलग होते हैं। जस्टिस संजय किशन कौल और न्यायमूर्ति सुधांशु धूलिया की पीठ ने पूछा कि उत्तराधिकार के मामले में अदालत ऐसा फैसला पारित नहीं कर सकती, जो सभी समुदाय के लोगों पर लागू हों। हालांकि, विधायिका सब पर लागू किए जा सकें, ऐसा कानून बना सकती है।

नफरती भाषण : 28 राज्यों ने नियुक्त किए नोडल अधिकारी; केंद्र सरकार ने शीर्ष अदालत में दाखिल की स्टेटस रिपोर्ट
सुप्रीम कोर्ट में केंद्र सरकार ने बताया कि नफरती भाषण के बाद भीड़ हिंसा रोकने के लिए उसके दिशा निर्देशों के अनुसार 26 राज्यों व केंद्र शासित प्रदेशों ने नोडल अधिकारी नियुक्त किये हैं। केंद्रीय गृहमंत्रालय ने नफरती भाषणों पर अंकुश लगाने की मांग वाली याचिकाओं के समूह पर स्टेटस रिपोर्ट दाखिल की है।
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केंद्र ने शीर्ष अदालत को बताया कि आंध्र प्रदेश, अरुणाचल, असम, छत्तीसगढ़, दिल्ली, गोवा, हरियाणा, हिमाचल, झारखंड, कर्नाटक, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, मणिपुर, मेघालय, मिजोरम, ओडिशा, पंजाब, राजस्थान, सिक्किम, तेलंगाना, त्रिपुरा, उत्तराखंड, यूपी व जम्मू-कश्मीर, लद्दाख, लक्षद्वीप, पुडुचेरी, अंडमान निकोबार द्वीप समूह ने नोडल अधिकारी नियुक्त किए हैं। शीर्ष अदालत नफरती भाषण की घटनाओं के खिलाफ कदम उठाने की मांग वाली कई याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए, राज्यों को जिला-स्तरीय नोडल अधिकारियों की स्थापना की आवश्यकता वाले 2018 दिशा-निर्देशों के अनुपालन की स्थिति पर राज्य सरकार से प्रतिक्रिया मांगी थी।  
 
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