सुप्रीम कोर्ट में चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली नौ जजों की पीठ ने टैक्स से जुड़े मुकदमे पर केंद्र सरकार से सवाल किया है। खनिजों पर टैक्स लगाने की ताकत से जुड़े एक मामले में शीर्ष अदालत ने केंद्र से कहा, केवल संसद के पास ही खनिजों पर टैक्स लगाने का अधिकार है। राज्यों को खनिजों पर टैक्स की वसूली करने का अधिकार नहीं है। अगर कानून ऐसा है तो देश की खनिज संपदा पर टैक्स वसूली से जुड़े संबंधित कानून में यह प्रावधान स्पष्ट शब्दों में क्यों नहीं है? मामले में सुनवाई 13 मार्च को भी जारी रहेगी।
नौ जजों की संविधान पीठ ने CJI चंद्रचूड़ के अलावा कौन न्यायमूर्ति शामिल हैं
मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली नौ-न्यायाधीशों की पीठ में जस्टिस हृषिकेश रॉय, न्यायमूर्ति अभय एस ओका, जस्टिस बीवी नागरत्ना, जस्टिस जेबी पारदीवाला, न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा, जस्टिस उज्ज्वल भुइयां, जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा और न्यायमूर्ति ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह भी शामिल हैं।
क्या केंद्र और राज्य की अलग-अलग शक्तियों पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं
केंद्र की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता से अदालत के समक्ष मंगलवार को हुई सुनवाई के दौरान कहा, केंद्र सरकार एकरूपता लाने के लिए खनिजों पर टैक्स की दरें तय करती है। इस पर नौ सदस्यीय संविधान पीठ ने पूछा, क्या इस तर्क से संविधान के तहत केंद्र और राज्य सरकारों को मिली अलग-अलग शक्तियों पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ता?
अनुमान / व्याख्या के निष्कर्ष आधार पर क्यों है कानूनी प्रावधान
अदालत ने पूछा, कानून स्पष्ट रूप से यह क्यों नहीं कहता कि केवल केंद्र सरकार ही खनिजों पर टैक्स वसूल करेगा। इस हद तक राज्य की शक्ति का हनन होगा (power of state is denuded)। सीजेआई की पीठ ने पूछा कि आपको टैक्स के संबंध में यह बात अनुमान या व्याख्या के निष्कर्ष के आधार पर (say this by inference) क्यों कहनी है?
राज्यों में टैक्स और रॉयल्टी सैकड़ों प्रतिशत वसूले
तुषार मेहता ने केंद्र सरकार की तरफ से पेश दलीलों में कहा, खान और खनिज (विकास और विनियमन) कानून (एमएमडीआरए) के प्रावधान ऐसे हैं, जिसमें खनिजों पर टैक्स लगाने की शक्ति केवल केंद्र की है और राज्यों की विधायी शक्ति को सीमित रखा गया है। बकौल मेहता, अगर राज्यों की तरफ से टैक्स वसूलने के नियम बनाए जाएं तो यह अमान्य या असंवैधानिक कर होगा। 1989 में पारित सुप्रीम कोर्ट के फैसले का जिक्र करते हुए मेहता ने कहा, खनिज अधिकार टैक्स पर कुछ राज्यों ने 300 प्रतिशत रॉयल्टी वसूले। कुछ राज्यों में रॉयल्टी पर 500 प्रतिशत टैक्स लिए गए।
दलीलें सुनने के बाद सीजेआई चंद्रचूड़ ने मेहता से कहा, इस दलील का संघीय व्यवस्था पर प्रभाव पड़ सकता है। उन्होंने कहा, यह तर्क हो सकता है कि टैक्स की दरों में एकरूपता के लिए केंद्र ही करों को तय करेगा। यह नीतिगत मामला है। तर्कों के बावजूद अहम सवाल यह है कि क्या यह संविधान के तहत केंद्र और राज्य के बीच बंटी हुई शक्ति की व्यवस्था पर भी असर डालेगा।
बता दें कि नौ न्यायाधीशों की संविधान पीठ बेहद जटिल प्रश्न पर विचार कर रही है। इसके मुताबिक क्या केंद्र खनन पट्टों पर रॉयल्टी वसूल सकता है, जिसे टैक्स माना जाएगा। 1989 में सात-न्यायाधीशों की पीठ ने यही फैसला पारित किया था। 1989 में इंडिया सीमेंट्स लिमिटेड बनाम तमिलनाडु राज्य सरकार के मुकदमे पर शीर्ष अदालत की सात-न्यायाधीशों की पीठ ने कहा था कि रॉयल्टी एक टैक्स ही है।
विगत 27 फरवरी को, शीर्ष अदालत ने इस विवादास्पद मुद्दे पर सुनवाई शुरू की थी। शीर्ष अदालत में इस मुद्दे पर विभिन्न उच्च न्यायालयों द्वारा पारित विरोधाभासी फैसलों के खिलाफ याचिका दायर की गई है। खनन कंपनियों, सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (पीएसयू) और राज्य सरकारों की तरफ से दायर 86 अपीलों पर एकसाथ सुनवाई हो रही है। अदालत विचार कर रही है कि क्या एमएमडीआर अधिनियम, 1957 के तहत निकाले गए खनिजों पर देय रॉयल्टी टैक्स जैसी ही है।