एक नवजात से दुष्कर्म और उसकी हत्या के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने व्यक्ति की दोषसिद्धि को खारिज कर दिया है। कोर्ट ने मामले की फिर से सुनवाई का आदेश दिया है। कोर्ट ने माना कि इस मामले में आरोप पत्र दाखिल होने के बाद जल्दबाजी में सुनवाई की गई, जिससे व्यक्ति को अपने बचाव का पूरा अवसर नहीं मिला।
सुप्रीम कोर्ट ने क्यों खारिज की दोषसिद्धि
कोर्ट ने देखा कि साल 2018 में मामला दर्ज होने और आरोप पत्र दाखिल होने के 15 दिनों के भीतर मामले की सुनवाई पूरी कर ली गई थी। व्यक्ति को कई अपराधों में दोषी माना गया और ट्रायल कोर्ट द्वारा उसे मौत की सजा दे दी गई। जस्टिस बीआर गवई की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि ट्रायल कोर्ट में बहुत जल्दबाजी में सुनवाई पूरी की, जिसमें आरोपी को अपना बचाव करने का पर्याप्त मौका नहीं मिला। पीठ में जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा भी शामिल थे। कोर्ट ने बीती 19 अक्तूबर को यह आदेश दिया।
हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में की थी अपील
बता दें कि आरोपी पर तीन महीने के बच्चे से दुष्कर्म और उसकी हत्या करने का आरोप है। ट्रायल कोर्ट द्वारा मौत की सजा मिलने के बाद आरोपी ने मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में अपील की लेकिन हाईकोर्ट ने भी ट्रायल कोर्ट के फैसले को सही माना और आरोपी को पोक्सो एक्ट के तहत दोषी मानते हुए फांसी की सजा को बरकरार रखा। हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ व्यक्ति ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया, जहां सुप्रीम कोर्ट ने दोषसिद्धि खारिज कर दी है और मामले की फिर से सुनवाई का आदेश दिया है।
सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान आरोपी के वकील ने कहा कि व्यक्ति को ट्रायल कोर्ट में सुनवाई के दौरान पसंद का वकील भी नहीं मिला था। अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट पीठ ने कहा कि न्यायिक शांति ना सिर्फ संवैधानिक अखंडता का पिलर है, साथ ही यह कानूनी व्यवस्था में विश्वास का भी आधार है।