जस्टिस संजीव खन्ना और जस्टिस पीवी संजय कुमार की पीठ ने इस बात पर जोर दिया कि एक वादी को सुप्रीम कोर्ट में पूरी जिम्मेदारी के साथ आना चाहिए। पीठ ने कहा, हम यह समझने में विफल हैं कि छोटी रकम के लिए यह मामला क्यों है। यहां इतनी मुकदमेबाजी आयकर विभाग की वजह से है! आप इस पर कितना खर्च कर रहे हैं? इससे तो अधिक खर्च सुप्रीम कोर्ट में एक दिन के लिए उपस्थिति की फीस है। पीठ ने कहा कि यदि कोई कानूनी प्रश्न है तो उसे उचित मामले में जांचा जा सकता है।
अनुचित मुकदमेबाजी पर पहले
यह पहली बार नहीं है जब सुप्रीम कोर्ट ने अनावश्यक मुकदमेबाजी पर नाराजगी जताई है। पिछले साल अगस्त में सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर दुख जताया था कि सरकारी मुकदमों का एक बड़ा हिस्सा निरर्थक है। कोर्ट ने कहा था कि निरर्थक याचिकाएं दायर करने से अदालत का कार्यभार अनावश्यक रूप से बढ़ रहा है। पिछले साल मई में जस्टिस बीआर गवई की अध्यक्षता वाली एक पीठ ने टिप्पणी की थी कि केंद्र और राज्य सरकारों के कम से कम 40 फीसदी मुकदमे निरर्थक हैं। अप्रैल 2023 में, सीजेआई जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने कहा था कि केंद्र सरकार को कानूनी विवादों को सुलझाने के लिए मुकदमेबाजी का सहारा लेने के बजाय बड़े पैमाने पर मध्यस्थता को अपनाना चाहिए
लड्डू विवाद की जांच के लिए समिति के गठन की मांग
तिरुमला तिरुपति देवस्थानम के पूर्व चेयरमैन और वाईएसआर पार्टी सांसद वाईवी सुब्बा रेड्डी ने तिरुमाला के वेंकटेश्वर स्वामी मंदिर में प्रसाद के रूप में परोसे गए लड्डू बनाने के लिए घी में पशु वसा के आरोपों की जांच के लिए सुप्रीम कोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश की अध्यक्षता में एक स्वतंत्र समिति के गठन के लिए सुप्रीम कोर्ट का रुख किया।
अगर कोई व्यक्ति अपनी बालिग पत्नी को यौन संबंध बनाने के लिए मजबूर करता है तो क्या ऐसे में पति को दुष्कर्म के अपराध के लिए मुकदमे से छूट मिलनी चाहिए? इन्हीं सब सवालों की याचिका पर अब सुप्रीम कोर्ट मंगलवार को सुनवाई करेगा। देश के प्रधान न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ ने कहा कियाचिकाएं पहले ही कल सूचीबद्ध हो चुकी हैं और कुछ मामलों की आंशिक सुनवाई के बाद इन पर सुनवाई होगी। बता दें, पीठ में न्यायमूर्ति जे बी पारदीवाला और न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा भी शामिल हैं। मामले में वादी की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता करुणा नंदी ने मामले को शीघ्र सूचीबद्ध करने की याचिकाओं का उल्लेख किया।
इससे पहले, शीर्ष अदालत ने 16 जुलाई को इस मामले से जुड़ी याचिकाओं को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करने पर सहमति व्यक्त की थी। उस समय सीजेआई ने संकेत दिया था कि मामलों की सुनवाई 18 जुलाई को हो सकती है।
क्या है दुष्कर्म की धारा में अपवाद?
भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 375, जिसे अब निरस्त कर दिया गया है और भारतीय न्याय संहित द्वारा प्रतिस्थापित किया गया है, दुष्कर्म (रेप) को परिभाषित करती है। इस धारा में वर्णित शर्तों में एक अपवाद भी दर्ज है जिसकी संवैधानिक वैधता को चुनौती दी गई है। दरअसल, इस अपवाद में पति को अपनी बालिग पत्नी के साथ गैर-सहमति से यौन संबंध बनाने के लिए दुष्कर्म के तहत मुकदमा चलाने से छूट देता है। इसमें कहा गया है, 'पति अगर अपनी पत्नी के साथ, जिसकी उम्र 15 वर्ष से कम नहीं है, तो वह दुष्कर्म नहीं है।'
वहीं, नए कानून के तहत भी धारा 63 (रेप) का अपवाद 2 कहता है कि किसी शख्स द्वारा अपनी पत्नी के साथ गैर-सहमति से यौन संबंध बनाया जाता है, जिसकी उम्र 18 वर्ष से कम नहीं है, तो वह दुष्कर्म नहीं है।'
सुप्रीम कोर्ट के नोटिस पर केंद्र सरकार ने दिया था जवाब
इससे पहले, शीर्ष अदालत ने 16 जनवरी 2023 को वैवाहिक दुष्कर्म को अपराध के दायरे में लाने का अनुरोध करने वाली और आईपीसी के उस प्रावधान को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर केंद्र से जवाब मांगा था, जो पति को बालिग पत्नी के साथ जबरन यौन संबंध को दुष्कर्म नहीं ठहराता है। केंद्र की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा था कि इस मुद्दे के कानूनी तथा सामाजिक निहितार्थ हैं और सरकार इन याचिकाओं पर अपना जवाब दाखिल करेगी।
बाद में, 17 मई को पीठ ने इसी तरह की याचिका पर केंद्र को नोटिस जारी किया, जिसमें इस मुद्दे पर बीएनएस प्रावधान को चुनौती दी गई थी। बता दें, आईपीसी, सीआरपीसी और साक्ष्य अधिनियम की जगह एक जुलाई से भारतीय न्याय संहिता, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) और भारतीय सक्षम अधिनियम लागू किए गए हैं।
हमें वैवाहिक दुष्कर्म संबंधी मामलों को निपटाना होगा: पीठ
पीठ ने कहा था, 'हमें वैवाहिक दुष्कर्म संबंधी मामलों को निपटाना होगा।' इन याचिकाओं में से एक याचिका वैवाहिक दुष्कर्म के मुद्दे पर दिल्ली हाईकोर्ट के 11 मई, 2022 के खंडित फैसले के संबंध में दायर की गई है। यह अपील दिल्ली हाईकोर्ट के सामने याचिकाकर्ताओं में से एक महिला ने दायर की थी।
दिल्ली हाईकोर्ट के दो जजों के बीच मतभेद
दिल्ली हाईकोर्ट की पीठ में शामिल दो जजों, जस्टिस राजीव शकधर और जस्टिस सी हरिशंकर ने मामले में सुप्रीम कोर्ट में अपील करने की अनुमति दी थी, क्योंकि इसमें कानून से जुड़े महत्वपूर्ण सवाल शामिल हैं, जिनपर अदालत द्वारा गौर किए जाने की आवश्यकता है। खंडपीठ का नेतृत्व करने वाले जस्टिस शकधर ने वैवाहिक दुष्कर्म अपवाद को 'असंवैधानिक' बताते हुए रद्द करने का समर्थन किया और कहा था कि यह दुखद होगा अगर आईपीसी के लागू होने के 162 साल बाद भी एक विवाहित महिला की न्याय के लिए गुहार नहीं सुनी गई। हालांकि, न्यायमूर्ति शंकर ने कहा था कि दुष्कर्म कानून के तहत पति को दी गई छूटअसंवैधानिक नहीं है और यह बोधगम्य अंतर (Comprehensible Difference) पर आधारित है। बोधगम्य अंतर की अवधारणा उन लोगों या चीजों के समूह से अलग करती है जो बाकियों से अलग हैं।
कर्नाटक हाईकोर्ट ने कहा था- पति को छूट सही नहीं
एक व्यक्ति ने ऐसे ही मामले में कर्नाटक हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ याचिका दायर की थी। इस फैसले के चलते उस पर अपनी पत्नी से कथित तौर पर दुष्कर्म करने का मुकदमा चलाने का रास्ता साफ हो गया था। दरअसल, कर्नाटक हाईकोर्ट ने पिछले साल 23 मार्च को पारित आदेश में कहा था कि अपनी पत्नी के साथ दुष्कर्म तथा अप्राकृतिक यौन संबंध के आरोप से पति को छूट देना संविधान के अनुच्छेद 14 (कानून के समक्ष समानता) के खिलाफ है।
सुप्रीम कोर्ट में इस मामले में कुछ अन्य याचिकाएं भी दायर की गई हैं। कुछ याचिकाकर्ताओं ने आईपीसी के सेक्शन 375 (रेप) के तहत वैवाहिक दुष्कर्म को मिली छूट की संवैधानिकता को इस आधार पर चुनौती दी है कि यह उन विवाहित महिलाओं के खिलाफ भेदभाव है, जिनका उनके पति ही यौन शोषण करते हैं।