जस्टिस एमआर शाह और जस्टिस एएस बोपन्ना की पीठ ने कहा, इस तरह का विवाद केवल उस स्थिति में उत्पन्न होता है जहां तय समय के भीतर बकाए की वसूली न हो पाई हो और जमानत के रूप में जारी किया गया चेक न भुनाया जा सका हो।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सिक्योरिटी के तौर पर जारी चेक के बाउंस होने पर भी एनआई एक्ट की धारा-138 के तहत अपराध हो सकता है। शीर्ष अदालत ने कहा कि ऐसा सख्त नियम नहीं हो सकता है कि सिक्योरिटी के तौर पर जारी किया गया चेक कभी भी नहीं भुनाया जाएगा।
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जस्टिस एमआर शाह और जस्टिस एएस बोपन्ना की पीठ ने कहा, इस तरह का विवाद केवल उस स्थिति में उत्पन्न होता है जहां तय समय के भीतर बकाए की वसूली न हो पाई हो और जमानत के रूप में जारी किया गया चेक न भुनाया जा सका हो।
मौजूदा मामले में हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले का हवाला देते हुए कहा था कि सिक्योरिटी के रूप में जारी किया गया चेक बाउंस होना अपराध नहीं हो सकता। इस पर पीठ ने कहा, इस न्यायालय द्वारा उक्त मामले में कोई स्पष्ट घोषणा नहीं की गई है कि सिक्योरिटी के रूप में जारी किया गया चेक सभी परिस्थितियों में वसूली के लिए प्रस्तुत नहीं किया जा सकता है।
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आरटीपीसीआर निटेगिव की शर्त के खिलाफ याचिका खारिज
एक अन्य मामले में सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को उस याचिका पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया जिसमें कर्नाटक सरकार द्वारा केरल से आने वाले लोगों के लिए निगेटिव आरटीपीसीआर रिपोर्ट अनिवार्य करने के निर्णय को चुनौती दी गई थी। शीर्ष अदालत ने कहा कि कर्नाटक सरकार का यह निर्णय मौलिक अधिकार का उल्लंघन नहीं है।
जस्टिस एल नागेश्वर राव और जस्टिस बीआर गवई की पीठ ने कहा, कोविड-19 अभी खत्म नहीं हुआ है और इस तरह की शर्तें लगाने को कहीं से भी अतार्किक नहीं कहा जा सकता। क्योंकि ये व्यापक जन हित में लिया गया फैसला है इसलिए इसके खिलाफ किसी मांग पर सुनवाई नहीं कर सकते। सुप्रीम कोर्ट ने कहा, इस शर्त के अलावा केरल के लोगों को कर्नाटक में आने पर कोई रोक नहीं है।