शराब घोटाले में अरविंद केजरीवाल की गिरफ्तारी ने पूरे विपक्ष को एकजुट कर दिया है। कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस सहित ज्यादातर विपक्षी दलों ने इसे 'लोकतंत्र पर हमला' करार दिया है। कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने केंद्र सरकार पर कड़ा हमला बोला और इसे गलत बताया। इंडिया गठबंधन के एक सहयोगी दल के तौर पर राहुल गांधी और कांग्रेस की यह नीति सही हो सकती है, लेकिन कई राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि कांग्रेस इसी समय केजरीवाल पर जोरदार हमला कर अपनी खोई राजनीतिक जमीन वापस पाने की कोशिश करती तो उसे इसका ज्यादा लाभ मिलता। वहीं, कुछ लोगों का मानना है कि कांग्रेस ने ज्यादा बड़े उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए केजरीवाल के समर्थन का निर्णय लिया, जबकि इसके पहले वह भी केजरीवाल के कथित भ्रष्टाचार का विरोध ही कर रही थी।
खुद अरविंद केजरीवाल ने अपनी और आम आदमी पार्टी की राजनीतिक जमीन कांग्रेस पर तरह-तरह के आरोप लगाकर ही बनाई थी। इस मामले में उन्होंने कांग्रेस पार्टी के साथ-साथ सोनिया गांधी, राहुल गांधी, प्रियंका गांधी और रॉबर्ट वाड्रा तक पर कई गंभीर आरोप लगाए थे। उस समय दिल्ली की मुख्यमंत्री और कांग्रेस नेता शीला दीक्षित पर भी उन्होंने बेहद गंभीर आरोप लगाए थे और सत्ता में आने पर उन्हें जेल भेजने तक की बात कही थी। केजरीवाल के इन आरोपों का यह असर हुआ था कि कांग्रेस ने दिल्ली-पंजाब में अपना कोर वोट गंवा दिया। कांग्रेस के मतदाता आम आदमी पार्टी के पास चले गए और वह इन दोनों राज्यों में एक विकल्प के तौर पर उभरी।
कांग्रेस नेता भी बंटे हुए
कांग्रेस को केजरीवाल का समर्थन करना चाहिए, या इस अवसर का उपयोग कर अपनी वापसी की कोशिश करनी चाहिए, इस पर कांग्रेस के नेता-कार्यकर्ता भी बंटे हुए हैं। दिल्ली में आम आदमी पार्टी के साथ सीटों के समझौते तक में कई नेता खिलाफ थे। अजय माकन जैसे नेता लगातार इस पर अपना विरोध का रुख बनाए हुए थे। केजरीवाल के साथ जाने के मुद्दे पर पंजाब कांग्रेस नेताओं का विरोध तो इतना ज्यादा था कि पार्टी को राज्य में केजरीवाल के साथ कोई गठबंधन किए बिना ही चुनाव में जाना पड़ा।
'कड़े सबूत, साथ क्यों दे रही पार्टी'
पार्टी के एक नेता ने अमर उजाला से कहा कि इस समय अरविंद केजरीवाल की सच्चाई जनता के सामने आ चुकी है। शराब घोटाले में जांच एजेंसी के पास कितने ठोस सबूत हो सकते हैं, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि जांच एजेंसी से केजरीवाल के खिलाफ सबूत मंगा कर देखने के बाद दिल्ली हाई कोर्ट ने उन्हें गिरफ्तारी से बचने का कोई रास्ता नहीं दिया। उन्होंने कहा कि कांग्रेस को ऐसे किसी नेता का साथ क्यों देना चाहिए? उनका कहना है कि इससे भाजपा को यह कहने का अवसर मिलता है कि कांग्रेस भ्रष्ट नेताओं के साथ खड़ी है। इससे स्वयं कांग्रेस पार्टी का ही पक्ष कमजोर होता है। उन्होंने कहा कि भ्रष्ट नेताओं के साथ खड़े होने की छवि का नकारात्मक असर पार्टी पर पड़ सकता है।
'कांग्रेस के लिए बड़ा अवसर हो सकता था'
राजनीतिक विश्लेषक विवेक सिंह ने अमर उजाला से कहा कि राजनीति के खेल में जनता की भावनाओं और संवेदनाओं को अपने साथ जोड़ने की कोशिश की जाती है, लेकिन कोई राजनीतिक दल स्वयं इसका शिकार नहीं होता। वह अपनी पार्टी के राजनीतिक भविष्य को ध्यान में रखते हुए निर्णय करता है। इस दृष्टि से देखें तो कांग्रेस का निर्णय बहुत लाभकारी नहीं कहा जा सकता।
विवेक सिंह ने कहा कि कांग्रेस के लिए यह बेहतर अवसर हो सकता था कि वह स्वयं जनता के बीच जाती और यह बताने की कोशिश करती कि उस पर आरोप लगाकर सत्ता में पहुंचे लोगों की असलियत क्या है। इसके सहारे वह अपने पुराने वोट बैंक को साध पाती तो यह दिल्ली-पंजाब में उसकी वापसी का बड़ा रास्ता बन सकता था।
पंजाब कांग्रेस नेताओं का विरोध भी इसीलिए है क्योंकि वे जानते हैं कि केजरीवाल के साथ खड़े दिखकर वे अपनी राजनीतिक जमीन वापस नहीं पा सकते, उलटे यदि वे उनके साथ खड़े रहे तो अकाली दल और भाजपा जैसे राजनीतिक दलों के विरोध में जनता को आम आदमी पार्टी का विकल्प मिल सकता है। उनका मानना है कि कांग्रेस के लिए यह घाटे का सौदा हो सकता है।
'पुराने कोर वोटरों को साथ लाती तो बेहतर होता'
उन्होंने कहा कि संभवतः दिल्ली में कुछ सीटों पर बेहतर तालमेल से चुनाव जीतने की रणनीति में कांग्रेस नेतृत्व ने केजरीवाल के साथ जाने का निर्णय लिया है, लेकिन जिस तरह मुसलमान मतदाता उसके साथ पूरी तरह एकजुट है, यदि वह शराब घोटाले के मुद्दे का उपयोग कर अपने कोर वोटरों का एक वर्ग अपने साथ ला पाती तो यह उसके लिए ज्यादा लाभ का सौदा साबित होता। हालांकि, उन्होंने इस बात की संभावना से इनकार नहीं किया कि लोकसभा चुनाव के बाद दोनों राजनीतिक दल अलग हो जाएं और दिल्ली विधानसभा चुनाव में अलग-अलग दिखाई पड़ें।
'बड़े उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए कांग्रेस ने अपनाई ये रणनीति'
वहीं, राजनीतिक विश्लेषक शांतनु गुप्ता की राय इससे अलग है। उनका मानना है कि इस मुद्दे पर कांग्रेस के पास दो विकल्प थे। एक- वह अरविंद केजरीवाल के कथित भ्रष्टाचार का विरोध करती और इसका उसे दिल्ली में कुछ राजनीतिक लाभ मिलता। दूसरा, वह प्रवर्तन निदेशालय के द्वारा केजरीवाल की गिरफ्तारी का विरोध करे और राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा-केंद्र सरकार को घेरे, इसे केंद्रीय जांच एजेंसियों के दुरुपयोग का मामला बताए। फिलहाल कांग्रेस इसी दूसरे विकल्प का उपयोग कर रही है।
'अन्य दलों का समर्थन मिला'
पहले विकल्प में कांग्रेस का लाभ केवल दिल्ली तक सीमित होता, जबकि दूसरे विकल्प में वह राष्ट्रीय स्तर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, केंद्र सरकार और भाजपा को घेर सकती है। उन्हें लगता है कि इस व्यापक हित को ध्यान में रखते हुए कांग्रेस नेतृत्व ने केजरीवाल का साथ देने का निर्णय किया। चूंकि, यह मामला ऐसा है जिसमें राष्ट्रीय स्तर पर विपक्ष के कई अन्य दल भी घिरे हुए हैं, कई अन्य दलों के नेताओं पर भी गिरफ्तारी की तलवार लटक रही है, ऐसे में इस विकल्प में विपक्ष के ज्यादा दलों का समर्थन मिल रहा है।
'थर्ड फ्रंट का रास्ता बन जाता'
जबकि यदि कांग्रेस पहले विकल्प (केजरीवाल को भ्रष्टाचार पर घेरने) के साथ जाती तो वह स्वयं विपक्ष में अलग-थलग पड़ सकती थी। यह मुद्दा भाजपा, कांग्रेस के अलावा थर्ड फ्रंट के बनने का रास्ता भी तैयार कर सकती थी, जिसे स्वीकार करने की स्थिति में कांग्रेस आज नहीं है। यही कारण है कि कांग्रेस नेतृत्व ने केजरीवाल का साथ देने का निर्णय किया होगा।