बेचैन हो रही हैं तरसी हुईं निगाहें, देखे हुए किसी को बहुत दिन गुजरे।
नाज था जिस पर मोहब्बत में साथ देंगे,
गुजरे जब जमाने से तो अजनबी से थे।
हॉकी के महान खिलाड़ी मेजर ध्यानचंद की डायरी और इसमें दर्ज उनकी शायरी की चर्चा शायद ही कभी, कहीं हुई हो। देश-दुनिया में ओलंपिक में जीते उनके हॉकी के गोल्ड मेडल, 1936 में जर्मनी का ऐतिहासिक फाइनल मैच, उनके जादुई खेल कौशल के किस्से ही चर्चित रहे हैं।
हॉकी में एक हजार गोल का अटूट रिकॉर्ड रचने वाले झांसी के ध्यानचंद की निजी डायरी उनके एक और पक्ष से भी खेल प्रेमियों को रूबरू कराती है। ध्यानचंद की डायरी में दर्ज शायरी को पढ़ते हुए उनके हॉकी विश्व कप विजेता पुत्र ओलंपियन अशोक ध्यानचंद सुखद अहसास से भर उठते हैं। उनके मुख से अनायास निकलता है, “वाह, क्या खूब बाबूजी (ध्यानचंद) की शायरी।”
दद्दा ध्यानचंद की जादुई शायरी की डायरी उनकी लेखिका पुत्रवधू मीना उमेश ध्यानचंद ने 2007 में तब घर से ढूंढ निकाली थी, जब वह मेजर ध्यानचंद पर केंद्रित पुस्तक लिखने की तैयारी कर रही थीं। डायरी में शायरी देख मीना ध्यानचंद को भारी विस्मय हुआ।