सिक्किम की ल्होनक झील के कुछ हिस्सों में एक जीएलओएफ उत्पन्न होने की वजह से ही 4 अक्टूबर को तीस्ता नदी घाटी के निचले हिस्से में जलस्तर बहुत तेजी से बढ़ा और अचानक आई इस बाढ़ ने मंगन, गंगटोक, पाकयोंग और नामची जिलों में जबरदस्त तबाही मचा दी। यही नहीं, इसमें चुंगथांग बांध भी टूट गया, जो 1,200 मेगावाट तीस्ता चरण तृतीय जलविद्युत परियोजना का एक अहम हिस्सा है।
सिक्किम में अचानक आई बाढ़ से मची तबाही के बाद से ऐसे सवाल उठ रहे हैं कि क्या ग्लेशियर लेक आउटबर्स्ट फ्लड (जीएलओएफ) के कारण संभावित आपदा को लेकर पूर्व में किए गए अध्ययनों की अनदेखी हुई थी। केंद्रीय जल आयोग ने ऐसे ही एक अध्ययन के बाद 2015 में सौंपी अपनी रिपोर्ट में राज्य सरकार को स्पष्ट तौर पर आगाह किया था कि तीस्ता नदी पर चल रही अधिकांश जलविद्युत परियोजना ऐसी ही किसी आपदा की वजह बन सकती हैं।
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सिक्किम की ल्होनक झील के कुछ हिस्सों में एक जीएलओएफ उत्पन्न होने की वजह से ही 4 अक्टूबर को तीस्ता नदी घाटी के निचले हिस्से में जलस्तर बहुत तेजी से बढ़ा और अचानक आई इस बाढ़ ने मंगन, गंगटोक, पाकयोंग और नामची जिलों में जबरदस्त तबाही मचा दी। यही नहीं, इसमें चुंगथांग बांध भी टूट गया, जो 1,200 मेगावाट तीस्ता चरण तृतीय जलविद्युत परियोजना का एक अहम हिस्सा है। जीएलओएफ की स्थिति तब उत्पन्न होती है जब ग्लेशियर की झील अचानक से फट जाए।
केंद्रीय जल आयोग ने अपना अध्ययन नदी के कमजोर पहलुओं और जलविद्युत परियोजनाओं में जीएलओएफ के प्रभाव का विश्लेषण के लिए किया था। इस दौरान शोधकर्ताओं ने पाया कि नदी घाटी स्थित हिमनद झीलों में जीएलओएफ के कारण नीचे की ओर गंभीर बाढ़ आ सकती है, जिससे लाचेन, चुंगथांग, डिक्चू, सिंगतम, मणिपाल, रंगपो, बारा मुंगवा गांव और नदी के 175 किलोमीटर के विस्तार के साथ तीस्ता एक से छह तक की जलविद्युत परियोजनाएं प्रभावित हो सकती हैं।
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रिपोर्ट में की थी एसओपी बनाने की सिफारिश
अध्ययन में दक्षिण ल्होनक झील में जीएलओएफ की स्थिति में नदी का जलस्तर 4.45 मीटर की तक बढ़ने की संभावना जताई गई थी। यह अनुमान लगाया गया कि झील 6,210 घन मीटर प्रति सेकंड की दर से पानी छोड़ सकती है, जो दो घंटे के भीतर चुंगथांग और तीस्ता तृतीय परियोजनाओं तक पहुंच सकती है। अध्ययन ने प्रतिकूल परिस्थितियों को कम करने के लिए मानक संचालन प्रक्रियाएं (एसओपी) तैयार करने की सिफारिश भी की गई है।