कोर्ट ने माना कि अगर अधिग्रहण प्रक्रिया शुरू होने के बाद सरकार ने मुआवजे का एलान कर दिया और उसे सरकारी कोष में जमा करा दिया है, तो यह जरूरी नहीं कि कोर्ट में जमा कराया जाए। एक पुराने फैसले के तहत इस बात का प्रावधान था कि अगर किसान मुआवजा नहीं ले रहा है तो सरकार उसे कोर्ट में जमा कराए, नहीं तो अधिग्रहण की प्रक्रिया पूरी नहीं मानी जाएगी। अब पीठ ने कहा, अगर सरकार ने मुआवजे के लिए मंजूर राशि अपने कोष में जमा करा रखी है तो फिर भूमि मालिक की तरफ से वहां से पैसा नहीं उठाना सरकार की गलती नहीं मानी जाएगी।
2013 में पारित भू-अधिग्रहण कानून की धारा 24 (2) में प्रावधान है कि अगर अधिग्रहण प्रक्रिया शुरू करने के पांच साल के भीतर सरकार या तो जमीन पर कब्जा नहीं लेती या मुआवजा नहीं देती तो अधिग्रहण रद्द माना जाएगा। पीठ को यह तय करना था कि सरकार द्वारा राजकोष में जमा कराए मुआवजे को ‘मुआवजा अदा किया गया’ माना जाए या नहीं। कोर्ट को भूमि अधिग्रहण कानून, 2013 की धारा 24(2) की व्याख्या करनी थी। प्रावधान के तहत यदि 2013 के नए भूमि अधिग्रहण कानून के लागू होने तक 1894 के अधिग्रहण कानून के तहत मुआवजा नहीं दिया जाता तो पुरानी कार्यवाही ‘खत्म’ मानी जाएगी और नए सिरे से मुआवजा प्रक्रिया शुरू होगी। कोर्ट ने कहा, धारा 24(2) में लिखे ‘अथवा’ शब्द को ‘और’ पढ़ा जाना चाहिए।
बीते साल जस्टिस मिश्रा ने इस केस की सुनवाई से हटने से इनकार किया था। बीते 15 अक्तूबर को इसकी सुनवाई शुरू हुई। इस दौरान किसानों के एक संगठन ने जस्टिस मिश्रा से इस मामले से हटने की मांग की। किसानों का कहना था कि जिस फैसले का परीक्षण किया जा रहा है, उसे लिखने वाले जस्टिस मिश्रा थे। जस्टिस मिश्रा ने एक फैसले में कहा था कि सरकारी एजेंसी द्वारा किया गया भूमि अधिग्रहण इस आधार पर रद्द नहीं हो सकता कि भू स्वामी ने पांच साल के भीतर क्षतिपूर्ति नहीं ली।