बांग्ला फिल्मों के दिग्गज अभिनेता सौमित्र चटर्जी अब इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन उनका काम हमेशा मौजूद रहेगा। वह विश्व सिनेमा के श्रेष्ठ उदाहरण थे, जिन्होंने देश, राज्य और भाषाई सीमाओं से परे सत्यजीत रे की सिनेमाई दृष्टि को अभिव्यक्ति प्रदान की और फिल्मी पर्दे पर उसे दक्षता के साथ साकार किया।
चटर्जी ने सत्यजीत रे के साथ 14 फिल्मों में काम किया, लेकिन उनकी शख्सियत सिर्फ सत्यजीत रे के आभामंडल तक सीमित नहीं रही। चटर्जी ने समानांतर सिनेमा के साथ व्यावसायिक फिल्मों के किरदारों में अपने आप को बखूबी ढाला। इसके साथ ही पटकथा लेखक और निर्देशक के तौर पर भी अपनी मौजूदगी का एहसास दुनिया को कराया।
स्मृति शेष: 19 जनवरी, 1935-15 नवंबर, 2020
1959 में फिल्म ‘अपुर संसार’ से फिल्मी सफर की शुरुआत करने वाले चटर्जी ने अपनी पहली ही फिल्म से दर्शकों के दिलों पर अमिट छाप छोड़ी। फिल्म में चटर्जी ने शोक में डूबे विधुर का किरदार निभाया था। इस फिल्म के साथ सत्यजीत रे की प्रसिद्ध अपु तिकड़ी पूरी हुई थी। अपु तिकड़ी की पहली फिल्म पाथेर पांचाली थी।
फिल्मी दुनिया के जानकारों के मुताबिक, चटर्जी ने 1957 में रे की ‘अपराजितो’ फिल्म के लिए ऑडिशन दिया था, जो अपु तिकड़ी की दूसरी फिल्म थी। लेकिन सत्यजीत रे को किशोर अपु का किरदार निभाने के लिए 20 वर्षीय चटर्जी की उम्र ज्यादा लगी थी। इसके बाद भी चटर्जी रे के संपर्क में बने रहे और आखिरकार उन्हें अपुर संसार में अपु का किरदार निभाने का मौका मिला।
पिता और दादा भी थे कलाकार
चटर्जी का जन्म 1935 में नादिया जिले के कृष्णानगर में हुआ था, जहां से उन्होंने स्कूली शिक्षा भी पूरी की। उनके दादा और वकील पिता ने पहली बार उन्हें अभिनय से रूबरू कराया। चटर्जी के पिता और दादा भी कलाकार थे। चटर्जी ने कलकत्ता विश्वविद्यालय से बंगाली साहित्य में एमए की डिग्री ली थी।
सत्यजीत रे के पसंदीदा अभिनेता ने उनकी ‘देवी’ (1960), ‘अभिजन’ (1962), ‘अर्यनेर दिन रात्रि’ (1970), ‘घरे बायरे’ (1984) और ‘सखा प्रसखा’ (1990) जैसी फिल्मों में काम किया। दोनों का करीब तीन दशक का साथ 1992 में रे के निधन के साथ छूटा। उन्होंने मृणाल सेन, तपन सिन्हा और तरुण मजूमदार जैसे दिग्गजों के साथ काम किया।
कभी बॉलीवुड में नहीं किया काम
बॉलीवुड से कई ऑफर के बावजूद उन्होंने कभी वहां का रुख नहीं किया। चटर्जी का मानना था कि अगर वह बॉलीवुड फिल्मों में काम करेंगे तो अन्य साहित्यिक कामों के लिए उनकी आजादी खत्म हो जाएगी। योग के शौकीन चटर्जी ने दो दशकों से भी ज्यादा समय तक एकसान पत्रिका का संपादन किया।
विरोध में पद्मश्री लेने से किया था इनकार
चटर्जी ने दो बार पद्मश्री पुरस्कार लेने से इनकार कर दिया था। इसके अलावा 2001 में उन्होंने राष्ट्रीय पुरस्कार लेने से भी मना कर दिया था। उन्होंने जूरी के रुख के विरोध में यह कदम उठाया था। बाद में 2004 में उन्हें पद्म भूषण से सम्मानित किया गया और 2006 में उन्हें ‘पोड्डोखेप’ के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार भी जीता। 2012 में उन्हें दादा साहेब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित किया गया। उनके परिवार में पत्नी दीपा चटर्जी, बेटी पोलमी बासु और बेटा सौगत चटर्जी हैं।
बंगाल की फिल्मी दुनिया अनाथ हुई: ममता बनर्जी
फेलुदा नहीं रहे। अपु ने अलविदा कहा। सौमित्र दा को विदाई। वह अपने जीवनकाल में किंवदंती रहे। अंतरराष्ट्रीय, भारतीय और बांग्ला सिनेमा ने एक दिग्गज को खो दिया। हम उन्हें सदा याद करेंगे। बंगाल की फिल्मी दुनिया अनाथ हो गई। - ममता बनर्जी, मुख्यमंत्री, पश्चिम बंगाल
सिनेमा में आपका योगदान याद रहेगा: मनोज बाजपेयी
अपूरणीय क्षति। ईश्वर आपकी आत्मा को शांति दे। भारतीय सिनेमा में आपका योगदान हमेशा याद किया जाएगा और आने वाली कई पीढ़ियों को प्रेरणा देगा।
- मनोज बाजपेयी, अभिनेता