प्रधानमंत्री की शपथ से ठीक पहले हमला
रक्षा मामलों के जानकारों का कहना है कि आतंकियों की यह सुनियोजित साजिश थी। आतंकियों का ये हमला पूरी योजना के साथ घात लगाकर किया गया, ताकि ज्यादा से ज्यादा लोग हताहत हों और घाटी में डर का माहौल बन सके। वह कहते हैं कि आतंकी जानते थे कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने तीसरे कार्यकाल के लिए शपथ लेने वाले हैं। उन्हें इस बात की भी जानकारी थी कि उनके शपथ ग्रहण समारोह में कई विदेशी राष्ट्राध्यक्ष भी आने वाले हैं। आतंकी इस तरह की कायराना हरकत करके दुनियाभर का ध्यान अपनी तरफ खींचना चाहते थे।
सैलानियों और नॉन-लोकल्स को नुकसान पहुंचाने की साजिश
सूत्र बताते हैं कि जम्मू-कश्मीर में सात साल बाद इस तरह के आतंकी हमले में 9 हिंदू तीर्थयात्रियों की मौत हुई है। अगर यह हमला मोदी सरकार के तीसरे कार्यकाल के शपथ ग्रहण समारोह के समय हुआ है, तो यह और भी अधिक परेशान करने वाला और निंदनीय है। यह केंद्र शासित प्रदेश में अराजकता के एक नए दौर की शुरुआत का संकेत है। आतंकी जानबूझ कर उन वाहनों पर हमला कर रहे हैं, जो तीर्थयात्रियों के हैं। वे इससे डर का माहौल पैदा करना चाहते हैं। वे केंद्र के इस दावे को भी झुठलाना चाहते हैं कि अनुच्छेद 370 हटने के बाद कश्मीर में टैरर की जगह टूरिज्म ने ले ली है। आतंकी कश्मीर में एक बार फिर नब्बे के दशक वाले माहौल की वापसी करना चाहते हैं। इस हमले की जिम्मेदारी लश्कर के शैडो आतंकी संगठन द रेजिस्टेंस फ्रंट (टीआरएफ) ने ली है। टीआरएफ ने अपनी चेतावनी दी कि वह सैलानियों और नॉन-लोकल्स को नुकसान पहुंचाएगा और रियासी अटैक इसकी शुरुआत है।
अमरनाथ यात्रा को बाधित करने की साजिश
वहीं जम्मू-कश्मीर में 29 जून से अमरनाथ यात्रा भी शुरू होने जा रही है। यात्रा शुरू होने से पहले रियासी में आतंकी हमला सरकार के लिए बड़ा चिंता का विषय है। इसके अलावा अमरनाथ यात्रा के बाद बाबा बुड्ढा अमरनाथ जी की यात्रा भी पुंछ में शुरू होने वाली है। इन यात्राओं में अधिकांश तीर्थयात्री दूसरे राज्यों से आते हैं। आतंकियों का यह हमला तीर्थयात्रियों में खौफ पैदा करने का साजिश है। आतंकी पिछले कुछ समय से बाहरियों खासकर नॉन कश्मीरियों पर हमले कर रहे हैं। वे दुनिया के सामने ये जताना चाहते हैं कि कश्मीर के स्थानीय लोग ही बाहरियों पर हमले कर रहे हैं। आतंकी जम्मू-कश्मीर के आपसी सद्भाव को खत्म करना चाहते हैं। रियासी जिले में आखिरी बार आतंकवादियों ने मई 2022 में हमला किया था। उन्होंने एक बस में स्टिकी बम लगाए थे, जिसमें चार वैष्णो देवी तीर्थयात्रियों की मौत हो गई थी और लगभग दो दर्जन घायल हो गए थे।
लोकसभा चुनाव में रिकॉर्ड वोटिंग से घबराए आतंकी
सूत्रों ने बताया कि आतंकी संगठन हाल ही में जम्मू-कश्मीर में हुई बंपर वोटिंग से भी सकते में हैं। बंपर वोटिंग ने उनके मंसूबों पर पानी फेर दिया है। खुद चुनाव आयोग का कहना है कि केंद्र शासित प्रदेश जम्मू-कश्मीर के श्रीनगर संसदीय क्षेत्र में रिकॉर्ड 38.49 फीसदी मतदान हुआ। वहीं आतंकवाद प्रभावित इलाके बारामूला संसदीय क्षेत्र में पिछले 8 लोकसभा चुनावों में सबसे ज्यादा वोटिंग हुई। बारामूला में 1967 में पहली बार संसदीय चुनाव होने के बाद इस बार रिकॉर्ड मतदान हुआ है। बारामूला में इससे पहले सर्वाधिक 58.90 फीसदी मतदान 1984 में हुआ था। वहीं, बारामूला, कुपवाड़ा, बांदीपोरा और बडगाम जिलों में 54.21 फीसदी का रिकॉर्ड मतदान दर्ज किया गया। अनुच्छेद 370 के निरस्त होने और जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम, 2019 के लागू होने के बाद जम्मू-कश्मीर का यह पहला आम चुनाव था।
जम्मू-कश्मीर में 'गन' तंत्र की जगह लोकतंत्र की वापसी
सूत्र बताते हैं कि अभी तक कश्मीर में गन के सायों में चुनाव होते रहे हैं। आतंकियों का गढ़ माने जाने वाले पुलवामा में तो वोटिंग की बात सोच तो ही नहीं सकते थे। बंदूकों के आतंक के चलते लोग घरों से वोट देने बाहर ही नहीं निकलते थे। पिछले लोकसभा चुनाव की बात करें, तो पुलवामा में सिर्फ एक फीसदी वोट पड़ा था, जो चौंकाने वाला था। लेकिन उसके बाद अनुच्छेद 370 की समाप्ति हुई और जम्मू-कश्मीर में 'गन' तंत्र की जगह लोकतंत्र की वापसी हुई। 2024 के चुनाव में पुलवामा ने रिकॉर्ड तोड़ वोटिंग करते हुए 43.39 फीसदी वोट पड़े। वहां के लोग अब कहते हैं कि इसे सालों तक चुनाव का बॉयकाट करके क्या हासिल हुआ है?
अगस्त मध्य तक जम्मू-कश्मीर में विधानसभा चुनाव!
वहीं आतंकियों की सबसे बड़ी टेंशन विधानसभा चुनावों को लेकर है। सफलतापूर्वक लोकसभा चुनाव संपन्न होने के बाद जम्मू-कश्मीर में विधानसभा चुनाव की घोषणा इस महीने की जा सकती है। निर्वाचन आयोग की कोशिश है कि विधानसभा चुनाव भी इसी सकारात्मक माहौल में संपन्न करवा दिया जाएं। सूत्रों ने बताया कि मुमकिन है कि अगस्त मध्य तक जम्मू-कश्मीर में विधानसभा चुनाव संपन्न करा दिए जाएं। चुनाव आयोग ने इस संदर्भ में तैयारियां भी शुरू कर दी हैं। पिछले हफ्ते ही चुनाव आयोग ने एक नोटिफिकेशन जारी किया था, जिसमें उन्होंने राजनीतिक दलों से कहा था कि वे अपने उम्मीदवारों के लिए सामान्य प्रतीकों के उपयोग के लिए आवेदन करना शुरू कर दें। जिसके ये मायने निकाले गए कि चुनाव आयोग इसी महीने ही चुनावों की तारीखों की घोषणा का एलान कर सकता है। पिछले साल, सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक फैसले में चुनाव आयोग को 30 सितंबर तक जम्मू-कश्मीर विधानसभा चुनाव कराने का आदेश दिया था। सूत्रों का कहना है कि आतंकी चुनावों में बाधा डालने की पुरजोर कोशिश कर सकते हैं। खुफिया एजेंसियों के पास भी पुख्ता रिपोर्ट है कि आतंकी विधानसभा चुनावों से पहले बड़ी साजिश को अंजाम दे सकते हैं।