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साक्षात्कार: क्या सपा संग होगा रालोद का गठबंधन? जयंत बोले- इस बार शेर की तरह लड़ेंगे किसान

सार

पिता अजित सिंह के निधन के बाद राष्ट्रीय लोकदल की बागडोर अब जयंत चौधरी के हाथों में है। उनके ऊपर जिम्मेदारी पहले से ज्यादा बढ़ गई है। अमर उजाला से उन्होंने पार्टी की विचारधारा और रणनीति पर बेबाकी से राय रखीं।
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रालोद अध्यक्ष जयंत चौधरी - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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कभी किसानों के एकछत्र नेता रहे चौधरी चरण सिंह की विरासत अब उनके पौत्र जयंत चौधरी ने संभाल ली है। पिता अजित सिंह के निधन के बाद जयंत अब राष्ट्रीय लोकदल के अध्यक्ष हैं। पार्टी का कामकाज संभालने के बाद जयंत चौधरी ने अपनी भावी राजनीति, किसान आंदोलन, उत्तर प्रदेश चुनाव, सपा रालोद रिश्तों और अन्य मुद्दों पर अमर उजाला से बातचीत की।

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जयंत जी उत्तर प्रदेश के चुनावों में महज आठ महीने बाकी है। ऐसे में जब चौधरी अजित सिहं भी अब नहीं हैं तब राष्ट्रीय लोकदल की क्या रणनीति है?

जिम्मेदारी अब बढ़ गई है। मेरी भी और पार्टी के ऐऐ कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारी बढ़ गई है। पिछले विधानसभा चुनावों में जो नतीजे आए वो हमारे लिए निराशाजनक थे।लेकिन अब एक नई उम्मीद लोगों में बनी है।  साथ ही जिन विषयों को लेकर भाजपा सत्ता में आई थी उन विषयों पर जमीनी स्तर पर कोई काम नहीं हो पाया। लोगों की नाराजगी बढ़ी है और लोग परिवर्तन चाहते हैं। लोग भाजपा के सांप्रदायिकता का विकल्प चाहते हैं। मंदिर राजनीति का विकल्प चाहते हैं। ऐसे में वैचारिक रूप से लोकदल ने किसानों की लड़ाई हमेशा लड़ी है तो हमारी विशेष भूमिका बनती है कि हम अपने आपको संगठित करें और चुनावी मैदान में मजबूती से उतरें। हमारी समाजवादी पार्टी से बातचीत चल रही है।जब यह चर्चा निष्कर्ष पर पहुंचेगी तब हम उसकी औपचारिक घोषणा करके सामने आएंगे एंड वी विल हिट दि स्टेट ।
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पंचायत चुनावों के नतीजे सपा रालोद का उत्साह बढ़ाने वाले रहे हैं। क्या विधानसभा चुनावों में सीटों के बंटवारे का आधार यही नतीजे बनेंगे?

हर चुनाव अलग होता है। पंचायत चुनाव इस बार एक तरह से प्रयोग था। आमतौर पर पंचायत चुनावों में पार्टियां इस तरह से उतरती नहीं हैं। ये गांव के स्तर का चुनाव होता है, लेकिन जब भाजपा ने रणनीति बनाई और किसान आंदोलन शुरू हुआ जिसमें हमारे क्षेत्र के लोगों ने बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया। तब हमने सोचा कि इस आंदोलन को एक राजनीतिक धार देने की जरूरत है। हमने भी फैसला लिया कि जिला पंचायत सदस्यों के चुनावों में उन प्रत्याशियों को समर्थन देंगे जो किसान आंदोलन में किसानों के साथ रहे हैं। हम उनका चयन करेंगे। वास्तव में जो नतीजे आएं हैं, उसमें सरकारी तंत्र का दुरुपयोग और भरपूर धनबल का इस्तेमाल करने के बावजूद भाजपा मात खा गई। हमारे पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कई जिलों में भाजपा दहाई के आंकड़े तक भी नहीं पहुंच सकी है। यह एक संकेत है जिसे आगे और बढ़ाने की जरूरत है। मैं यह नहीं कहता कि अगले चुनाव का यह कोई फार्मूला है,  लेकिन यह क्षेत्र जो चौधरी अजित सिंह जी की कर्मभूमि रही है। इस क्षेत्र में पार्टी के प्रति लोगों के मन में विशेष लगाव है इससे लगता है कि हमें इस क्षेत्र में विशेष सफलता मिलेगी।

रालोद और सपा की विचारधारा लगभग एक ही है, क्योंकि दोनों की ही राजनीति चौधरी चरण सिंह और राम मनोहर लोहिया के विचारों से निकली है। ऐसे में अगर यह दोनों मिलकर चुनाव मैदान में उतरते हैं तो क्या किसान आंदोलन उनका प्रमुख मुद्दा होगा?

किसान हर चुनाव का मुद्दा होना चाहिए। मेरा मानना है कि किसानों के हित, गांव देहात का विकास हर दल के एजेंडे में प्रमुख मुद्दा होना चाहिए, क्योंकि किसान और कृषि ही देश की बुनियाद है। निश्चित रूप से विधानसभा चुनावों में किसान आंदोलन का बड़ा प्रभाव पड़ेगा। इस इलाके की बड़ी फसल गन्ने की है, यह गन्ना उत्पादन क्षेत्र है। इस क्षेत्र में चीनी मिलें लगवाने में चौधरी अजित सिंह जी का बड़ा योगदान रहा है, जिससे इस क्षेत्र में कृषि क्रांति जैसी स्थिति हो गई है। आज स्थिति यह है कि किसी भी गन्ना उत्पादक किसान के गन्ने का भुगतान नियम के मुताबिक, चौदह दिन के भीतर नहीं होता है। बकाए के भुगतान के लिए किसानों को लंबा इंतजार करना पड़ता है जिसको लेकर बेहद नाराजगी है। दूसरी भी जो फसलें हैं उनकी भी कोई सरकारी खरीद की व्यवस्था नहीं है। गेहूं की खरीद के लिए भी जिलों से शिकायतें आ रही हैं। किसान 15 से 20 दिन तक मंडियों में बैठे रहते हैं कई-कई दिन तक गेहूं की तुलाई नहीं होती है। कहीं बारदाना नहीं मिलता है। सरकारी एमएसपी कुछ और होता है, लेकिन किसान को भाव कुछ और मिलता है। बिजली का हाल भी बुरा है। जब से योगी जी आए हैं, बिजली की दरें ढाई सौ गुना तक बढ़ गई हैं। डीजल-पेट्रोल के बढ़ते भावों ने महंगाई को और बढ़ा दी है। खेती की लागत बढ़ गई है। लोगों की जीविका पर असर पड़ा है। छोटे व्यापारी, छोटे कारखानों का लॉकडाउन में बहुत नुकसान हुआ, ऐसे कई मुद्दे हैं, लेकिन सरकार ने उनकी कोई मदद नहीं की है। हर चुनाव को ये मुददे प्रभावित करते हैं। जब राज्य में अगली सरकार बनेगी उसके सामने भी ये मुद्दे होंगे। हमारी कोशिश होगी कि हम अपनी सरकार बनाएं और किसानों से हम वादा करेंगे कि उनकी इन  समस्याओं को हल करने की भरसक कोशिश करूं। रालोद की पहली प्राथमिकता किसान है। रालोद और सपा दोनों की ही विचारधारा चौधरी चरण सिंह जी की विचारधारा है और मेरा मानना है कि आज भी हम उनकी विचारधारा को आगे बढ़ाने का काम करेंगे।

भाजपा की राजनीति ध्रुवीकरण की रही है, 2013 में मुजफ्फरनगर दंगे हों या राम मंदिर का मुद्दा। पार्टी ने ध्रुवीकरण की राजनीति की। इस बार भी उसकी कोशिश यही होगी। इसका मुकाबला आप लोग कैसे करेंगे?

भाजपा में इस पर विवाद चल रहा है कि अगली बार उनका मुख्यमंत्री कौन होगा या किसको चेहरा बनाएंगे, लेकिन यह जरूर तय कर दिया गया है कि हिंदुत्व ही उनका मुद्दा होगा। इस प्रदेश में हमने वो तस्वीरें भी देखीं हैं कि ऑक्सीजन की कमी और दवाइयों के अभाव में कितने लोग मारे गए। नदियों में लाशें बहीं। चील-कौवे लाशों को नोच रहे हैं, मजबूरी में शव दफनाए गए, जनता ने यह सब देखा है। स्वास्थ्य सुविधाओं और आधारभूत संरचना में सुधार लाना भाजपा का कभी मुद्दा नहीं रहा। आप ही बताएं कि प्रदेश में कितने निवेश सम्मेलन हुए, हजारों करोड़ की बात हुई, लेकिन कहीं कोई कल-कारखाने नहीं लग पाए। हजारों सरकारी पदों पर भर्तियां अभी तक नहीं हुईं। ऐसा भी हुआ कि भर्तियां हो गईं, यूनीफार्म भी दे दी गई, लेकिन अभी तक ड्यूटी पर ज्वाइन नहीं कराया गया। इन सारे विषयों को लेकर हम चुनाव लड़ना चाहते हैं। ये सही है कि भाजपा के पास सिर्फ एक ही मुद्दा है जो उनके राजनीतिक डीएनए का हिस्सा है, लेकिन अब जनता भी देख चुकी है। इतने घाव लगे हैं लोगों को इतनी चोटें लगी हैं कि लोग उन्हें कैसे भूल जाएंगे।

रालोद सपा गठबंधन में और भी दल शामिल होंगे या सिर्फ यही दोनों दल रहेंगे?

हमारा गठबंधन हो चुका है। राजनीति में संभावनाएं कभी खत्म नहीं होती, जिनकी जमीन पर ताकत होगी उनसे हम बात करेंगे। अखिलेश जी ने भी यह बात कही है। हमारा गठबंधन सबसे मजबूत और प्रभावशाली गठबंधन होगा।

कांग्रेस के साथ गठबंधन या कोई चुनावी तालमेल हो सकता है क्या?

जो अखिलेश जी ने संकेत दिए हैं कि संभावनाएं कम हैं। मैं भी यही मानता हूं और राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में जो विपक्ष की भूमिका है, मेरा मानना है कि बहुत चीजें शायद उस संदर्भ में भी बदल जाएं।

अजित सिंह और मुलायम सिंह यादव के रिश्ते बेहद खट्टे-मीठे और उतार चढ़ाव वाले रहे हैं, आपके और अखिलेश के रिश्तों को किस तरह देखा जाना चाहिए ?

जीवन में खट्टे मीठे अनुभव और उतार चढ़ाव तो होते ही हैं। कभी भी एक ही दिशा में लोग नहीं चलते हैं। मन भी बदलते हैं। हृदय परिवर्तन भी होता है। इसमें कोई बुरा मानने की बात नहीं है। हमारे जो रिश्ते हैं वो रिश्ते हमेशा रहेंगे, जो पुरानी स्मृतियां हैं वो अपनी जगह हैं, लेकिन मेरी कोशिश होगी कि जो अजित सिंह जी की विचारधारा है मैं उसे आगे लेकर चलूं। उनकी ये इच्छा थी कि हम लोग मिलकर चलें। उनकी आखिरी कोशिश थी कि किसान आंदोलन को मजबूत किया जाए और मैं उनकी इस कोशिश को सफल बनाने में जुटा हूं।

आपके पास एक बहुत बड़ी राजनीतिक विरासत है किसानों की। आपके दादा चौधरी चरण सिंह देश के सबसे बड़े किसान नेता थे, जिनका पूरे उत्तर भारत की किसान राजनीति में दबदबा था, लेकिन धीरे-धीरे आपका प्रभाव अब पश्चिम उत्तर प्रदेश तक ही सिमट गया। आप इस विरासत को फिर पूरे उत्तर प्रदेश, हरियाणा, राजस्थान, बिहार आदि राज्यों में बढ़ाने की कोशिश करेंगे?

राजस्थान में हमारी सरकार में भागीदारी है, मैं चाहूंगा कि वहां हमारा संगठन और दायरा बढ़े। चुनाव भी ज्यादा सीटों पर लड़ें, लेकिन अभी हमारी प्राथमिकता उत्तर प्रदेश का चुनाव हैं। हमें वहां मजबूती से खड़ा होना है। अपने आपको पुनर्स्थापित करना है। अगली सरकार में अपनी भूमिका बनानी है और उसके पश्चात जो पुराने धागे हैं, उन्हे फिर से समेटने की कोशिश करूंगा। रालोद के अध्यक्ष पद की जिम्मेदारी जब मैने संभाली तो राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में मैंने अपील की थी कि वो सारे लोग जिन्होंने कभी न कभी चौधरी अजित सिंह जी के साथ काम किया है और जिनकी राजनीतिक समझदारी है, वो फिर साथ आएं और मेरी जिम्मेदारी है कि मैं उनका सम्मान करूंगा। वो पार्टी को फिर मजबूत करें।

इस समय देश की राजनीति में अनेक युवा चेहरे हैं और वो ज्यादातर विपक्ष में हैं। क्या उनको एकजुट होकर देश की राजनीति को एक नई दिशा नहीं देनी चाहिए?
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सबकी अपनी-अपनी सोच होती है, लेकिन कुछ समान विषय भी हैं जिन पर मेल मिलाप हो सकता है। कुछ ऐसे बिंदु हैं जहां हम सब एकसाथ हैं। मेरा मानना है कि नए और युवा चेहरे सिर्फ दलों के शीर्ष स्तर पर ही नहीं हैं, बल्कि जमीन पर भी भारी तादाद में सक्रिय हैं। पंचायत चुनावों , नगर निकाय चुनावों में ऐसे नए युवा चेहरों की भरमार होती है जो बढ़ चढ़कर राजनीति में आ रहे हैं। मेरा एक मुद्दा है जिसे मैं हर स्तर पर उठाता हूं कि हमारे देश में 18 साल की उम्र में आप वोट डाल सकते हैं। 21 साल की उम्र में शादी कर सकते हैं, प्रधान बन सकते हैं, लेकिन विधायक सांसद नहीं बन सकते। उसके लिए 25 साल की उम्र होना जरूरी है। मेरी मांग है कि विधायक सांसद बनने की उम्र की अनिवार्यता को 25 से घटाकर 21 साल किया जाना चाहिए। इससे ज्यादा से ज्यादा युवा विधानसभाओं और संसद में जा सकते हैं। ये एक बड़ी युवा क्रांति होगी। इससे नौजवान सिर्फ मतदाता ही नहीं, बल्कि नेतृत्व की भूमिका में भी आएगा। युवाओं के मुद्दे ही अलग होते हैं, उनकी सोच अलग होती है। काम करने का तरीका अलग होता है। अब पर्यावरण को लेकर एक युवा जिसे पूरा जीवन जीना है की चिंता ज्यादा होगी। शासन प्रशासन के क्षेत्र में नई-नई तकनीक और विधियां आ रही हैं , जिसे युवा बेहतर तरीके से समझ सकते हैं।

देश में जितने भी किसान आंदोलन हुए या हो रहे हैं सब अपने आपको अराजनीतिक कहते हैं जबकि चौधरी चरण सिंह कहा करते थे कि जब तक राजनीति पर किसानों का अधिकार नहीं होगा ,उनकी समस्याएं हल नहीं होंगी। इसपर आपकी क्या राय है?

किसान तो नेतृत्व करता है। चौधरी चरण सिंह ने यही बताया है। इसीलिए वह गांव के लोगों को किसानों को राजनीति में आगे लेकर आए। वह उन्हें टिकट देते थे, संगठन में जिम्मेदारी देते थे जिससे किसानों का नेतृत्व राजनीति में ज्यादा से ज्यादा हो। उन्होंने किसानों का नेतृत्व विकसित किया जिसका असर हर दल पर दिखाई देता है। एक दौर आया जब हर दल में जमीन से जुड़े नेताओं का दबदबा था। इसका श्रेय चौधरी चरण सिंह को ही दिया जाता है। यह एक सोच थी कि किसान सिर्फ फालोअर न बन कर रह जाए, वो लीडर बने। आंदोलन होता है। हमारे यहां पंचायती मिजाज के लोग हैं। सामूहिक फैसले लेना हमारे स्वभाव और संस्कार में है और ये रहेगा, लेकिन राजनीति कोई बुरी चीज नहीं है। इससे बचा नहीं जा सकता और बचना भी नहीं चाहिए। भेड़ की तरह वोट करेंगे और फिर शेर की तरह सड़कों पर लड़ेंगे दोनों चीज कहीं न कहीं जुड़नी चाहिए। चुनाव में भी यही मुद्दे रहने चाहिए। इसलिए मैं कह रहा हूं कि किसान के विकास का मुद्दा, बिजली का मुद्दा, शिक्षा स्वास्थय सड़क का मुद्दा, फसलों की कीमत का मुद्दा। मैं चाहता हूं हर चुनाव इन्ही मुद्दों पर हों।

मंडल और मंदिर की राजनीति ने किसान राजनीति को देश के विमर्श से बाहर कर दिया। किसान धर्म और जातियों में बंट गया और किसानों के सवाल पीछे छूटते चले गए?

दरअसल, पहचान बदल गई। पहले किसान के सवाल पर राजनीति होती थी, जो अब जाति और धर्म के सवाल पर होने लगी। ये एक पेंडोरा बॉक्स खुल गया जिसे बंद करना बहुत मुश्किल हो रहा है, लेकिन कभी-कभी कुछ ऐसी घटनाएं होती हैं कि हम जाति धर्म भूलकर एक हो जाते हैं। आज जिस तरह से किसान आंदोलन चला है, राजधानी में महीनों से किसान बैठे हैं। बुजुर्ग युवा सब बैठे हैं। कई किसान शहीद हो गए। पुलिस की लाठियां और डंडे भी खाए। आंसू गैस के गोले भी चले। पानी की बौछारें भी झेली। दूसरी तरफ सरकार जिसे सुनवाई करनी है उसके अहंकार में कोई कमी नहीं आई है। अभी हरियाणा के मुख्यमंत्री खट्टर साहब दिल्ली आए और मुझे उनका बयान बेहद आपत्तिजनक लगा जिसमें उन्होंने कहा कि आंदोलन के नाम पर अनैतिक कृत्य हो रह हैं। आप किसी सामाजिक आंदोलन को बल प्रयोग करके कमजोर करना चाहेंगे या दमनकारी नीति चलाएंगे तो समस्या हल नहीं होगी। सरकार को विनम्रता के साथ उनसे बात करनी चाहिए। मोदी जी कहते हैं कि वह सिर्फ एक फोन कॉल की दूरी पर हैं, लेकिन कौन सा फोन और कौन सा नंबर। कहां मिलाया कब मिलाया। मुझे लगात है कि अब जो माहौल बना है उससे धर्म जाति की भावनाएं पीछे छूट जाएंगी और जो जीविका का आधार है वो असली मुद्दा बन जाए, लेकिन ये कितने दिन चलेगा कुछ कहा नहीं जा सकता है, लेकिन हमें इस दिशा में और काम करने की जरूरत है।

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