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रणनीति: पंजाब में कमल खिलाने की जिम्मेदारी शेखावत के कंधों पर, किसान आंदोलन के बीच ग्रामीण क्षेत्रों में भाजपा को जिताना बड़ी चुनौती  

सार

पंजाब चुनाव के लिए प्रभारी नियुक्त कर भाजपा ने संगठन में भी केंद्रीय मंत्री शेखावत का कद बढ़ाया है। वे पार्टी के अनुभवी और वरिष्ठ रणनीतिकारों में से एक रहे हैं और कई बार पार्टी की उम्मीदों पर खरे भी उतरे हैं।
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गजेंद्र सिंह शेखावत - फोटो : Amar Ujala
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भाजपा ने अगले साल की शुरुआत में होने वाले पंजाब विधानसभा चुनावों के लिए ताल ठोक दी है। पार्टी ने चुनाव की कमान केंद्रीय जलशक्ति मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत को सौंपी है। अब पंजाब में कमल खिलाने की जिम्मेदारी उनके कंधों पर होगी। राज्य में कांग्रेस सरकार का तख्तापलट करना शेखावत के लिए किसी चुनौती से कम नहीं होगा।
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केंद्रीय मंत्री शेखावत को भाजपा ने पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में भी छह लोकसभा क्षेत्रों की 35 विधानसभा सीटों में चुनाव प्रचार का जिम्मा सौंपा था। इस दौरान भी शेखावत ने दिन रात एक कर पार्टी के लिए प्रचार किया और करीब 8 सीटों पर पार्टी को जीत भी हासिल हुई। शेखावत देश के पहले जलशक्ति मंत्री भी हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की महत्वाकांक्षी जल जीवन मिशन योजना और स्वच्छ भारत मिशन की जिम्मेदारी भी उनके कंधों पर है। 

अब पंजाब चुनाव के लिए प्रभारी नियुक्त कर भाजपा ने संगठन में भी केंद्रीय मंत्री शेखावत का कद बढ़ाया है। वे पार्टी के अनुभवी और वरिष्ठ रणनीतिकारों में से एक रहे हैं और कई बार पार्टी की उम्मीदों पर खरे भी उतरे हैं। 2019 के लोकसभा चुनाव में शेखावत राज्य के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के बेटे वैभव गहलोत 2 लाख 74 हजार 440 मतों से हरा चुके हैं।
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किसान आंदोलन बना चुनौती
नए कृषि कानूनों के मसले पर पंजाब में अकाली दल से नाता टूटने के बाद भाजपा पहली बार राज्य के सियासी मैदान में अकेले उतरने जा रही है। इसलिए विधानसभा चुनाव के मद्देनजर पार्टी ने नए सिरे रणनीति बनाना भी शुरु कर दी है।

सूत्रों के मुताबिक, भाजपा ने प्रदेश की ऐसी विधानसभा सीटों का चयन किया है जहां हिंदू और दलित की आबादी 60 फीसदी से अधिक और निर्णायक भूमिका में है। राज्य की 45 ऐसी सीटे जहां पर हिंदूओं की आबादी 60 प्रतिशत से अधिक और 28 ऐसी सीटे जहां पर हिंदू और दलितों की संख्या 60 फीसदी से ज्यादा हैं। ये सभी ऐसी सीटे जहां पर किसान आंदोलन का कोई भी खास असर नहीं हुआ हैं। जबकि यहां की जनता किसान आंदोलन के कारण पैदा हो रहे हालतों के कारण किसानों से ही नाराज चल रही है।  

पंजाब की राजनीतिक के जानकार बताते है कि इन चुनावों में भाजपा के लिए सबसे बड़ी परेशानी यह भी है कि किसान आंदोलन के चलते वह गांवों के मतदाताओं तक अपना संपर्क नहीं कर पा रही है। पार्टी अब तक गठबंधन में शहरी सीटों पर ही अपने उम्मीदवार खड़े करते आई है, जबकि अकाली दल गांव की सीटों पर। ग्रामीण क्षेत्रों में भाजपा जनाधार पहले ही कम था, अब किसान आंदोलन के कारण विरोध और भी तेज हो गया है। ऐसे में ग्रामीण क्षेत्रों के चुनाव मैदान में उतरना और जीत हासिल करना पार्टी के लिए किसी चुनौती से कम नहीं होगा। 

गौरतलब है कि नए कृषि कानूनों के मसले पर पर पिछले साल शिरोमणि अकाली दल ने भाजपा के साथ अपना 24 साल पुराना गठबंधन तोड़ लिया था। शिवसेना के बाद भाजपा से नाता तोडऩे वाले दलों में शिरोमणि अकाली दल दूसरी पुरानी पार्टी है। ये दोनों ऐसी पार्टियां थीं, जो सबसे लंबे समय तक भाजपा के साथ रही हैं।
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