केंद्रीय मंत्री प्रह्लाद पटेल ने कहा कि जल्द ही जनसंख्या नियंत्रण के लिए कानून लाया जाएगा। पटेल ने मंगलवार को रायपुर में ये बात कही। ये पहली बार नहीं है, जब देश में जनसंख्या नियंत्रण कानून को लेकर चर्चा चल रही हो। इससे पहले पिछले साल जुलाई में उत्तर प्रदेश के स्टेट लॉ कमीशन ने जनसंख्या नियंत्रण कानून का ड्राफ्ट जारी किया था। इस पर आपत्तियां और सुझाव मांगे गए थे। वहीं, दूसरी ओर लोकसभा में केंद्र सरकार ने कई बार कहा है कि उसका जनसंख्या नियंत्रण से जुड़ा कोई भी कानून लाने का इरादा नहीं है।
ऐसे सवाल है कि जनसंख्या नियंत्रण बिल की देश को कितनी जरूरत है? जहां इस तरह के बिल लागू हैं वहां इसका कितना फायदा हुआ है? केंद्र सरकार का इस बिल पर अब तक क्या रुख रहा है? इसके आने से क्या बदलेगा? आइये जानते हैं इन सभी के जवाब…
1. क्या जनसंख्या नियंत्रण कानून लाने की जरूरत है?2006 में पूर्व IAS ऑफिसर निर्मला बुच ने इस पॉलिसी को लागू करने वाले पांच राज्यों पर स्टडी की थी। इस स्टडी में बताया गया कि दो बच्चों का नियम आने के बाद इन राज्यो में सेक्स-सिलेक्टिव और अनसेफ अबॉर्शन बढ़े हैं। कुछ मामलों में पुरुषों ने लोकल बॉडी इलेक्शन लड़ने के लिए पत्नी को तलाक दे दिया। इसके साथ ही कुछ मामलों में अयोग्यता से बचने के लिए बच्चों को गोद दे दिया गया।
4.केन्द्र सरकार का अब तक इसे लेकर क्या रुख रहा है?5. इस तरह के कानून पर संविधान में क्या कहा गया है?
संविधान केंद्र और राज्य दोनों को जनसंख्या नियंत्रण और परिवार नियोजन के लिए कानून बनाने की छूट देता है। हालांकि, देश में जनसंख्या नियंत्रण से संबंधित कोई राष्ट्रीय नीति नहीं है। जनसंख्या नियंत्रण के लिए राष्ट्रीय नीति बनाने को लेकर समय-समय पर याचिकाएं लगती रही हैं। 1981 में एक मामले में सुप्रीम कोर्ट ने एयर इंडिया के उस आदेश को बरकरार रखा जिसमें उसने तीसरी प्रेगनेन्सी पर अपनी फ्लाइट अटेंडेन्ट को नौकरी से निकाल दिया था।
केंद्रीय मंत्री प्रह्लाद पटेल ने कहा कि जल्द ही जनसंख्या नियंत्रण के लिए कानून लाया जाएगा। पटेल ने मंगलवार को रायपुर में ये बात कही। ये पहली बार नहीं है, जब देश में जनसंख्या नियंत्रण कानून को लेकर चर्चा चल रही हो। इससे पहले पिछले साल जुलाई में उत्तर प्रदेश के स्टेट लॉ कमीशन ने जनसंख्या नियंत्रण कानून का ड्राफ्ट जारी किया था। इस पर आपत्तियां और सुझाव मांगे गए थे। वहीं, दूसरी ओर लोकसभा में केंद्र सरकार ने कई बार कहा है कि उसका जनसंख्या नियंत्रण से जुड़ा कोई भी कानून लाने का इरादा नहीं है।
ऐसे सवाल है कि जनसंख्या नियंत्रण बिल की देश को कितनी जरूरत है? जहां इस तरह के बिल लागू हैं वहां इसका कितना फायदा हुआ है? केंद्र सरकार का इस बिल पर अब तक क्या रुख रहा है? इसके आने से क्या बदलेगा? आइये जानते हैं इन सभी के जवाब…
1. क्या जनसंख्या नियंत्रण कानून लाने की जरूरत है?2006 में पूर्व IAS ऑफिसर निर्मला बुच ने इस पॉलिसी को लागू करने वाले पांच राज्यों पर स्टडी की थी। इस स्टडी में बताया गया कि दो बच्चों का नियम आने के बाद इन राज्यो में सेक्स-सिलेक्टिव और अनसेफ अबॉर्शन बढ़े हैं। कुछ मामलों में पुरुषों ने लोकल बॉडी इलेक्शन लड़ने के लिए पत्नी को तलाक दे दिया। इसके साथ ही कुछ मामलों में अयोग्यता से बचने के लिए बच्चों को गोद दे दिया गया।
4.केन्द्र सरकार का अब तक इसे लेकर क्या रुख रहा है?5. इस तरह के कानून पर संविधान में क्या कहा गया है?
संविधान केंद्र और राज्य दोनों को जनसंख्या नियंत्रण और परिवार नियोजन के लिए कानून बनाने की छूट देता है। हालांकि, देश में जनसंख्या नियंत्रण से संबंधित कोई राष्ट्रीय नीति नहीं है। जनसंख्या नियंत्रण के लिए राष्ट्रीय नीति बनाने को लेकर समय-समय पर याचिकाएं लगती रही हैं। 1981 में एक मामले में सुप्रीम कोर्ट ने एयर इंडिया के उस आदेश को बरकरार रखा जिसमें उसने तीसरी प्रेगनेन्सी पर अपनी फ्लाइट अटेंडेन्ट को नौकरी से निकाल दिया था।
6.क्या राज्यों द्वारा बनाए गए कानून को भी कोर्ट में चुनौती मिली है?
2003 में पहली बार किसी राज्य की जनसंख्या नीति से जुड़ा मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। जब हरियाणा सरकार के पंचायती राज एक्ट, 1994 के खिलाफ याचिका लगाई गई। याचिकाकर्ता ने इस एक्ट को समानता के अधिकार के खिलाफ बताया था। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने राज्य के कानून को बरकार रखा। हालांकि, बाद में खुद हरियाणा सरकार ने दो बच्चों वाला एक्ट वापस ले लिया।
मार्च 2018 में सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका लगाई गई। इसमें कोर्ट से अपील की गई कि वो केंद्र को जनसंख्या नियंत्रण के लिए दो बच्चों की पॉलिसी बनाने का निर्देश दे। इसे सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया और याचिकाकर्ता को सरकार के पास जाने को कहा गया।
2019 में भाजपा नेता और वकील अश्विनी उपाध्याय ने भी इससे जुड़ी एक याचिका लगाई। इसमें उन्होंने कोर्ट से अपील की वो चुनाव आयोग को निर्देश दे कि चुनाव आयोग राजनीतिक पार्टियां उन लोगों को उम्मीदवार नहीं बना सकतीं जिनके दो से अधिक बच्चे हैं। कोर्ट ने ये याचिका खारिज कर दी। हालांकि, जनवरी 2020 में सुप्रीम कोर्ट ने उपाध्याय की दो बच्चों की नीति से जुड़ी एक दूसरी याचिका स्वीकार कर ली। कोर्ट ने याचिका पर सुनवाई करते हुए जनसंख्या नियंत्रण पर केंद्र से जवाब मांगा।
7. केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट में क्या जवाब दिया?
कोर्ट को दिए जवाब में केंद्र ने कहा कि वो बच्चों की संख्या तय करने के खिलाफ है। दिसंबर 2020 में केंद्र सरकार के ये एफिडेविट दिया था। इसमें सरकार ने कहा था कि भारत का फैमिली वेलफेयर प्रोग्राम लोगों को परिवार का आकार तय करने की आजादी देता है। इसी में सराकर ने कहा कि भारत ने 1994 में पॉपुलेशन और डेवलपमेंट पर हुई इंटरनेशनल कॉन्फ्रेंस में प्रोगाम ऑफ एक्शन पर साइन करने वाले देशों में शामिल है। जो परिवार नियोजन के लिए किसी तरह की जबरदस्ती के खिलाफ है।
10. मुस्लिम आबादी तेजी से बढ़ने की बात की जाती है उसका क्या?
बीते तीन दशक में NFHS के पांच सर्वे आए हैं। 1992-93 में आए पहले सर्वे से अब आए पांचवें सर्वे के दौरान मुस्लिमों में प्रजनन दर में सबसे ज्यादा कमी आई है। 1992-93 में मुस्लिम महिलाओं में TFR 4.41 था। जो नए सर्वे में घटकर 2.36 रह गया है। हालांकि, अभी ये ये सभी धर्मों में सबसे ज्यादा है। वहीं, हिन्दू महिलाओं में इसी दौरान TFR 3.30 से घटकर 1.94 हो चुका है।
पिछली बार के मुकाबले सिख और जैन समुदाय की प्रजनन दर में इजाफा हुआ है। 2015-16 में सिख समुदाय में प्रजनन दर 1.58 थी जो अब बढ़कर 1.60 हो गई है। वहीं, जैन समुदाय में प्रजजन दर 1.20 से बढ़कर 1.60 हो गई है।
ए आर नंदा कहते हैं मेरा हमेशा से मानना है कि जनसंख्या धर्म के आधार पर नहीं बढ़ती घटती है। ज्यादातर प्रजनन दर कम पढ़ी-लिखी और अनपढ़ आबादी में होती है। गरीब और अति गरीब हिन्दू आबादियों में प्रजजन दर और गरीब मुस्लिम आबादी में प्रजनन दर करीब-करीब एक ही रहती रही है। ऐसा हमेशा से दिखाई देता रहा है