आदिवासियों के गांव की पूरी कहानी
गांव के भीतर पक्की सड़क तो बनी है लेकिन रहने के लिए घर अभी कच्ची मिट्टी और घास फूस के बने हैं। इस गांव की रहने वाली करुणा कृष्णा शेलार अपने कच्चे घर में रहती हैं। उन्होंने बताया कि गांव में सरकार की ओर से पक्के घर दिए जा रहे थे। जब वह अपने गांव के सरपंच और पंचायत के अधिकारियों से मिलीं तो उन्होंने कागज में इतनी खामियां निकाल दी कि वह उनको कभी पूरा ही नहीं कर सकीं। नतीजा हुआ कि वह अपने परिवार के साथ अभी भी कच्चे घर में ही रहती हैं। कृष्ण कहती हैं कि बारिश होती है तो उनका एक कमरे का मकान टपकता है। ऐसे हालात में घर में बच्चों और उनके पास बारिश से बचने का कोई आसरा नजर नहीं आता। कृष्ण कहती हैं की सरकारी मकान की उम्मीद अब सपना लगता है। उन्होंने पास में ही खड़ी अपने गांव की एक बुजुर्ग महिला की ओर इशारा करते हुए कहा कि जब इन्हें अभी तक घर नहीं मिला, तो हमें कहां से मिल जाएगा।
जर्जर हाल में हैं कई घर
इसी गांव के रहने वाले नरेश नउसावीर कहते हैं कि उनका घर बहुत ही जर्जर है। वह कहते हैं कि जब उनके गांव में कुछ सरकारी घर बने। ऐसे में उम्मीद थी कि शायद उनको भी जर्जर घर से छुटकारा मिल सके। लेकिन अब तक उनको न तो घर मिला है और न ही कोई नेता उनके दरवाजे पर दस्तक देने आया है। उनकी पत्नी उर्मिला कहती हैं कि जैसे तैसे दो वक्त का खाना नसीब होता है। उनके पति नरेश कहते हैं कि वह जंगल में जाकर लकड़ी बीनते हैं। उन्हें बेचकर कुछ रूपयों का इंतजाम होता है। यही काम उनकी पत्नी भी करती हैं। दोनों लोग कहते हैं शाम तक दो सौ रुपए के करीब तक का इंतजाम हो पाता है, तब जाकर घर का चूल्हा जलता है। वह कहते हैं कि अब चुनाव आ गया है तो नेता फिर आ रहे हैं। लेकिन उनकी आजीविका को आगे बढ़ाने के लिए अब तक किए गए सरकारी प्रयास उनके दरवाजे तक नहीं पहुंचे हैं।
‘नेता आते हैं, वादे कर के चले जाते हैं’
इसी गांव की रहने वाली सविता सुरेश भुईर कहती हैं कि वह अपने कच्चे मकान में रहती हैं। जब चुनाव आता है तो नेता भी आते हैं। हर चुनाव में नेता उनको कच्चे घर के बदले नया और पक्का सरकारी मकान देने का वादा करते हैं। लेकिन दशकों बाद भी उनका कच्चा घर पक्के मकान में तब्दील नहीं हो सका। सविता कहती हैं कि उनते पति नौकरी नहीं करते। घर में जो थोड़े बहुत पैसे होते हैं, उसका इस्तेमाल शराब पीने में किया जाता है और फिर घर में मारपीट की जाती है। सविता खुद पढ़ी-लिखी नहीं हैं, ऐसे में उनके लिए नौकरी का बंदोबस्त नहीं हो सका। घर का बड़ा बेटा नौकरी करता है और कुछ पैसे कमा के लाता है। सविता का कहना है कि अब फिर चुनाव आ गया है, तो वोट मांगने वालों की तादाद बढ़ रही है। वह कहती हैं कि उनको इस बात से कोई लेना-देना नहीं है कि कौन चुनाव लड़ रहा है। वह तो बस यही चाहती हैं कि उनको दो वक्त का खाना मिल सके और एक पक्का मकान मिल सके, जिससे बारिश में टपकते हुए घर से अपने बच्चों को बचा सकें।
‘आदिवासियों की समस्या का निदान नहीं हो रहा’
इसी गांव के रहने वाले आनंद थोड़ी बहुत सियासत समझते हैं। वह कहते हैं यहां पर शिवसेना के दो फाड़ तो हो चुके हैं। लेकिन वह वोट किसको करेंगे इसका तो खुलासा नहीं करने वाले। उनका कहना है कि जो उनके हक की बात करेगा वह वोट उसी को दिया जाएगा। उनका कहना है कि आदिवासियों की इतनी समस्याएं हैं कि उनका निदान ही नहीं हो पा रहा। अब जो भी नेता चुनाव में वोट मांगने आते हैं, उनको जांचने और परखने के बाद ही वोट देने की तैयारी है। इसी गांव के अमलेश कहते हैं कि गांव में पक्की सड़क अभी बनाई गई है। पानी के लिए बंदोबस्त किए जा रहे हैं। ताकि लोगों को पीने का पानी मिल सके। वह कहते हैं कि इससे लोगों के जीवन स्तर में कुछ सुधार तो होगा लेकिन यह पर्याप्त नहीं है। अमलेश कहते हैं की आजादी के बाद अभी भी आदिवासियों के गांव पिछड़े हैं और यह बहुत चिंता की बात है। अपने ही गांव का उदाहरण देते हुए कहते हैं कि यहां अब तक सिर्फ छह सात ही सरकारी मकान बने हैं। गांव की स्थिति बदहाल है और लोगों को पक्की छत की जरूरत है।