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13 साल में 359 फीसदी बढ़ा बीएमसी का बजट फिर भी मुंबई में बारिश से डूबी सड़कें और ट्रेन की पटरियां

अनिल पांडेय, नई दिल्ली Published by: अनिल पांडेय Updated Tue, 02 Jul 2019 05:26 PM IST

सार

  • 1860 में अंग्रेजों ने बनाया था मुंबई का ड्रेनेज सिस्टम।
  • 25 मिलीमीटर प्रतिघंटे की है इस पुराने ड्रेनेज सिस्टम की क्षमता।
  • 10 गुना बढ़ गई है ड्रेनेज सिस्टम बनने के बाद से मुंबई की जनसंख्या।
  • 58 में से सिर्फ 28 प्रोजेक्ट ही पूरे हुए 13 साल में। बाकी प्रोजेक्ट पर अभी भी काम ही चल रहा है।
  • एक घंटे में 25 मिलीमीटर तक बारिश हो तो ठीक, उससे अधिक बारिश नहीं संभाल पाता है यह ड्रेनेज सिस्टम।
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भारी बारिश और जलभराव से मुंबई परेशान - फोटो : PTI

मुंबई में जारी लगातार मूसलधार बारिश के कारण शहर जलमग्न हो गया है। जल जमाव के कारण रेल सेवाएं बाधित हुई हैं, ट्रैफिक में घंटों लोग फंसे रहे और विमान सेवाओं में देरी हो रही है। स्थानीय प्रशासन ने स्कूल और कॉलेज बंद रखने की घोषणा की है। मौसम विभाग का कहना है कि अभी भारी बारिश थमने वाली नहीं है और शुक्रवार तक बादल ऐसे ही बरसते रहेंगे।

लेकिन ये पहला मौका नहीं है जब मुंबईवासियों को बारिश के बाद जलभराव की समस्या से दो चार होना पड़ रहा हो। हर साल बारिश शुरू होते ही सड़कों पर पानी जमा होने लगता है। इसके बाद शहरवासियों को ट्रैफिक जाम से लेकर तमाम समस्याओं से जूझना पड़ता है। ऐसे में सवाल उठता है कि वो कौन से कारण हैं जिसकी वजह से मुंबई को हर साल इस समस्या का सामना करना पड़ता है।



हर साल बृहन्मुंबई महानगरपालिका (बीएमसी) बड़ी धनराशि बारिश से निपटने के लिए जारी करता है। साल 2005 में आई बाढ़ के बाद 13 वर्षों में बीएमसी का बजट 359 फीसदी बढ़ चुका है, लेकिन हालात नहीं सुधरे हैं। अगर हम मुंबई महानगरपालिका के प्रबंधन और बजट की तुलना सिंगापुर से करें तो पता चलता है कि वहां और उसी की तरह अन्य देशों में कम बजट में भी ड्रेनेज सिस्टम दुरुस्त रखा जाता है।

भारत तेजी से बढ़ती हुई अर्थव्यवस्था है, सुपरपावर है, बावजूद इसके यहां की आर्थिक राजधानी मुंबई में कुछ घंटे तेज बारिश से ही जान पर बन आती है। ये वो शहर है जिसे शंघाई बनाने का सपना देखा जाता है। लेकिन मानसून की बारिश से जलमग्न होने वाले मुंबई की तस्वीर हर साल एक जैसी दिखाई देती है। पिछले 10 वर्षों के दौरान यहां कुछ नहीं बदला है। सड़कों पर भरा पानी, ट्रैफिक जाम, पानी में डूबे रेलवे ट्रैक मुंबई की बदसूरती को दुनिया के सामने बयां करते हैं।

पिछले एक दशक में बारिश से बीएमसी ने कोई सबक नहीं लिया है। मुंबई को वर्ल्ड क्लास सिटी बनाने के सपने संजोने वाले शहर मुंबई में बारिश के मौसम में मुसीबतों का समंदर सड़कों पर दिखाई देने लगता है। कुल मिलाकर बारिश की वजह से मुंबई में हर वर्ष आपातकाल आ जाता है। दरअसल तेज बारिश के बाद बनने वाली इस परेशानी की वजह मुंबई का खराब ड्रेनेज सिस्टम है। वर्ष 2016-17 में मुंबई के लोगों ने दो लाख 48 हजार करोड़ रुपये का टैक्स दिया, फिर भी मुंबई की बारिश से बचने के लिए उन्हें बीएमसी के उपायों से कोई राहत नहीं मिली।

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भारी बारिश और जलभराव से मुंबई परेशान - फोटो : PTI
मुंबई में जारी लगातार मूसलधार बारिश के कारण शहर जलमग्न हो गया है। जल जमाव के कारण रेल सेवाएं बाधित हुई हैं, ट्रैफिक में घंटों लोग फंसे रहे और विमान सेवाओं में देरी हो रही है। स्थानीय प्रशासन ने स्कूल और कॉलेज बंद रखने की घोषणा की है। मौसम विभाग का कहना है कि अभी भारी बारिश थमने वाली नहीं है और शुक्रवार तक बादल ऐसे ही बरसते रहेंगे।

लेकिन ये पहला मौका नहीं है जब मुंबईवासियों को बारिश के बाद जलभराव की समस्या से दो चार होना पड़ रहा हो। हर साल बारिश शुरू होते ही सड़कों पर पानी जमा होने लगता है। इसके बाद शहरवासियों को ट्रैफिक जाम से लेकर तमाम समस्याओं से जूझना पड़ता है। ऐसे में सवाल उठता है कि वो कौन से कारण हैं जिसकी वजह से मुंबई को हर साल इस समस्या का सामना करना पड़ता है।

हर साल बृहन्मुंबई महानगरपालिका (बीएमसी) बड़ी धनराशि बारिश से निपटने के लिए जारी करता है। साल 2005 में आई बाढ़ के बाद 13 वर्षों में बीएमसी का बजट 359 फीसदी बढ़ चुका है, लेकिन हालात नहीं सुधरे हैं। अगर हम मुंबई महानगरपालिका के प्रबंधन और बजट की तुलना सिंगापुर से करें तो पता चलता है कि वहां और उसी की तरह अन्य देशों में कम बजट में भी ड्रेनेज सिस्टम दुरुस्त रखा जाता है।

भारत तेजी से बढ़ती हुई अर्थव्यवस्था है, सुपरपावर है, बावजूद इसके यहां की आर्थिक राजधानी मुंबई में कुछ घंटे तेज बारिश से ही जान पर बन आती है। ये वो शहर है जिसे शंघाई बनाने का सपना देखा जाता है। लेकिन मानसून की बारिश से जलमग्न होने वाले मुंबई की तस्वीर हर साल एक जैसी दिखाई देती है। पिछले 10 वर्षों के दौरान यहां कुछ नहीं बदला है। सड़कों पर भरा पानी, ट्रैफिक जाम, पानी में डूबे रेलवे ट्रैक मुंबई की बदसूरती को दुनिया के सामने बयां करते हैं।

पिछले एक दशक में बारिश से बीएमसी ने कोई सबक नहीं लिया है। मुंबई को वर्ल्ड क्लास सिटी बनाने के सपने संजोने वाले शहर मुंबई में बारिश के मौसम में मुसीबतों का समंदर सड़कों पर दिखाई देने लगता है। कुल मिलाकर बारिश की वजह से मुंबई में हर वर्ष आपातकाल आ जाता है। दरअसल तेज बारिश के बाद बनने वाली इस परेशानी की वजह मुंबई का खराब ड्रेनेज सिस्टम है। वर्ष 2016-17 में मुंबई के लोगों ने दो लाख 48 हजार करोड़ रुपये का टैक्स दिया, फिर भी मुंबई की बारिश से बचने के लिए उन्हें बीएमसी के उपायों से कोई राहत नहीं मिली।

कई राज्यों के बजट से ज्यादा बीएमसी का बजट

बारिश से अस्त व्यस्त मुंबई - फोटो : PTI
बीएमसी देश की सबसे रईस नगरपालिका है। इसका सालाना बजट गोवा, अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर और त्रिपुरा के कुल बजट से भी ज्यादा है। वर्ष 2015-16 में बीएमसी ने सड़कों से बारिश का पानी निकालने 401 करोड़ रुपये खर्च किए थे, जबकि वर्ष 2016-17 में ड्रेनेज सिस्टम को दुरुस्त करने के लिए 475 करोड़ रुपये का बजट बनाया था। लेकिन बारिश हमेशा बीएमसी की कलई खोल देती है।

जून 2018 से 2019 के बीच बीएमसी ने मुंबई को गड्ढा मुक्त और ड्रेनेज प्रणाली को दुरुस्त करने के लिए 4,678.5 करोड़ रुपये खर्च किए हैं। वर्ष 2016-17, 2017-18 और 2018-19 में बीएमसी ने सड़क, ट्रैफिक और ड्रेनेज प्रणाली के लिए आवंटित बजट का 87.66 फीसदी उपयोग किया था। बावजूद इसके नतीजा पूरा देश और दुनिया के सामने है।



2005 में मुंबई में सबसे ज्यादा 944 मिलीमीटर बारिश की वजह से एक हजार लोगों की मौत हुई थी। तब बीएमसी का बजट 5937 करोड़ था। बारिश का पानी निकालने के कई परियोजनाएं बनाई और शुरू की गईं। वहीं 2018-19 का बजट 27258 करोड़ रुपये है। यानी 13 साल में बजट 359 प्रतिशत तक बढ़ गया। लेकिन मुंबई में तब भी मानसूम के वक्त पानी भर जाया करता था और आज भी वैसी ही स्थिति है।

मुंबई में क्यों होता है जलभराव?

मुंबई में बरसात के मौसम में होने वाले जलभराव की बड़ी वजह है यहां की टाउन प्लानिंग और पुराना ड्रेनेज सिस्टम। ड्रेनेज सिस्टम का ज्यादातर हिस्सा अंग्रेजों के जमाने में बनाया गया था। जिस तेजी से मुंबई की आबादी बढ़ी है, उतनी तेजी से ड्रेनेज सिस्टम की क्षमता नहीं बढ़ी है। मुंबई में 50 से 60 वर्ष पुराने ड्रेनेज पाइप हैं जिनमें से सिर्फ 30 फीसदी को ही अब तक बदला जा सका है।

दूसरी समस्या इस शहर का समुद्र से घिरा होना है। बरसात का पानी भूमिगत ड्रेनेज सिस्टम के जरिए समुद्र में जाता है, लेकिन बारिश या हाई टाइड आने पर समुद्र के पास बने ड्रेनेज सिस्टम के दरवाजे बंद हो जाते हैं। इस वजह से बारिश का पानी निकल नहीं पाता है और शहर जलमग्न हो जाता है।

क्या भौगोलिक स्थिति है जिम्मेदार

मुंबई को एक ऐसे शहर के रूप में जाना जाता है जो कि सात द्वीपों को जोड़कर बनाया गया है। इसमें एक ओर समुद्र है। वहीं, दूसरी ओर खाड़ी का क्षेत्र है। एक समय में इन द्वीपों पर 22 पहाड़ियां थीं। ऐसे में जब पहाड़ी इलाकों पर पानी बरसता है तो वह बहकर निचले इलाकों और फिर खाड़ी क्षेत्र में जाता है।

लेकिन पहाड़ी और खाड़ी क्षेत्र के बीच एक दलदली भूमि हुआ करती थी जो कि अब मुंबई के उपनगरों में तब्दील हो चुकी है। ऐसे में बारिश का पानी पहाड़ से बहकर इन उपनगरों में फंस जाता है और यहां जलभराव की समस्या सामने आती है। सायन, चूनाभट्टी, दादर पश्चिम समेत मुंबई के कई इलाके ऐसी ही जमीन को कृत्रिम तरीके से भरने के बाद अस्तित्व में आए हैं।

दलदली वनों का नाश

मुंबई में बारिश - फोटो : PTI
मुंबई शहर तीन ओर से समुद्र से घिरा हुआ है। समुद्र, खाड़ी और शहर के बीच दलदली वन हैं जो कि शहर की जमीन को समुद्र के पानी से संरक्षित करते हैं। पिछले कई वर्षों से मुंबई में अवैध झुग्गियों और इमारतों के बनने की वजह से दलदली वनक्षेत्र में कमी आ रही है। इस जंगल की वजह से हाई टाइड के समय समुद्री जल मुंबई में घुसने की जगह इस जंगल में फंस जाता है। इसकी वजह से मृदा अपरदन नहीं होता है। पिछले कई सालों से ये जंगल खत्म हो रहे हैं।

प्रशासनिक कारण

मुंबई शहर 14 से ज्यादा अलग-अलग सरकारी विभागों के अधीन है। उदाहरण के लिए, मुंबई का कोई क्षेत्र बीएमसी के अधीन है तो उससे सटा हुआ दूसरा हिस्सा रेलवे के अधीन है। ऐसे में शहर से जलनिकासी सुनिश्चित करने के लिए इन सभी एजेंसियों का साथ काम करना बहुत जरूरी है। लेकिन अक्सर इन एजेंसियों में आपसी तालमेल का अभाव नजर आता है। इसके साथ ही मुंबई में बारिश से पहले नालों को साफ करने को लेकर विभागों के बीच तनातनी देखने को मिलती है। जलभराव के बाद विभाग एक दूसरे पर जिम्मेदारी डालते हुए नजर आते हैं।

इन देशों से लेना चाहिए सबक

  • सिंगापुरः बाढ़ और जलभराव से निपटने की सबसे बड़ी शिक्षा सिंगापुर से ली जा सकती है। सिंगापुर ने अपने ड्रेनेज सिस्टम को सुधारने के लिए पि छले 30 वर्षों में करीब 9 हजार 300 करोड़ रुपये खर्च किए हैं। इससे पूरे सिंगापुर में बाढ़ प्रभावित इलाके में करीब 98 फीसदी की कमी आई, जो अपने आप में हैरान करने वाला आंकड़ा है। सिंगापुर में ड्रेनेज सिस्टम को सुधारा गया, इमारतों के प्लेटफॉर्म की न्यूनतम सीमा तय की गई। सिंगापुर के जिन निचले इलाकों में बाढ़ की वजह से सड़कें डूब जाती थीं, वहां ड्रेनेज सिस्टम सुधारा व सड़कों के लेवल को ऊंचा किया गया।
  • अमेरिका: अमेरिका अपने यहां समुद्री तूफानों से आने वाली बाढ़ से निपटने के लिए तकनीक का उपयोग किया। यहां हर तूफान का अलर्ट होता है और प्रभावित इलाकों को खाली कराने का प्लान पहले से ही तैयार होता है। अमेरिका ने समुद्र में ऐसे यंत्र लगाए हुए हैं जिनके जरिए सुनामी के खतरे को वक्त रहते पहचाना जा सकता है। अपने सैटेलाइट नेटवर्क के जरिए अमेरिका आसमान में तूफानों से संबंधित हर डाटा को रिकॉर्ड करता है। उसके पास बारिश व बाढ़ का पूर्वानुमान लगाने का सिस्टम भी है।
  • नीदरलैंड्स: एक वक्त था जब नीदरलैंड्स का 66 फीसदी इलाका बाढ़ से प्रभावित होता था, लेकिन अब ऐसा नहीं है। क्योंकि इस देश ने बाढ़ और जलभराव से निपटने के लिए एक अलग सोच अपनाई। सोच यह है कि पानी के साथ जीना सीखो उससे लड़ो मत। नीदरलैंड्स ने 400 वर्ष पहले ही ड्रेनेज सिस्टम बना लिया था। वहां जगह-जगह पंपिंग स्टेशन बने हैं, जो बारिश और बाढ़ के पानी को बाहर निकालते हैं। यहां ड्रेनेज के लिए नहरों का एक सिस्टम है और समय-समय पर यहां पर नदियों की गहराई भी बढ़ाई जाती है।
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