पीठ ने कहा कि चूंकि शपथ राज्यपाल ने दिलाई थी और बाद में सदस्यता ली थी इसलिए ऐसी आपत्तियां नहीं उठाई जा सकतीं। पीठ ने अपने आदेश में कहा, यह याचिकाकर्ता के लिए प्रचार पाने का एक तुच्छ प्रयास है।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि तुच्छ मामलों को लेकर न्यायालयों की सहनशीलता की भी एक सीमा है। इस टिप्पणी के साथ शीर्ष अदालत ने बॉम्बे हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस के रूप में जस्टिस देवेंद्र कुमार उपाध्याय की नियुक्ति को चुनौती देने वाली याचिका खारिज कर दी। याचिकाकर्ता पर 25 हजार रुपए का जुर्माना भी लगाया।
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याचिका में दावा किया गया था कि जस्टिस उपाध्याय को दिलाई गई शपथ दोषपूर्ण थी। सीजेआई जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की तीन सदस्यीय पीठ ने कहा, हमारे एक-एक मिनट की कीमत है। इसका वित्त पर प्रभाव पड़ता है। इस मामले की सुनवाई से पहले सुप्रीम कोर्ट में एक लाख रुपये जमा करने की पूर्व शर्त थी।
क्या थी वकील की दलील
याचिकाकर्ता के वकील ने दलील दी कि चीफ जस्टिस ने शपथ लेते समय अपना नाम लेने से पहले ‘आई’ (मैं) शब्द का इस्तेमाल नहीं किया। उन्होंने तर्क दिया कि यह संविधान की तीसरी अनुसूची का उल्लंघन है। इसके अलावा यह तर्क दिया गया कि केंद्र शासित प्रदेश दादरा और नगर हवेली और दमन और दीव के प्रतिनिधियों को शपथ में आमंत्रित नहीं किया गया था।
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पीठ की टिप्पणी
पीठ ने कहा कि चूंकि शपथ राज्यपाल ने दिलाई थी और बाद में सदस्यता ली थी इसलिए ऐसी आपत्तियां नहीं उठाई जा सकतीं। पीठ ने अपने आदेश में कहा, यह याचिकाकर्ता के लिए प्रचार पाने का एक तुच्छ प्रयास है।
यह अधिक गंभीर मामलों से अदालत का ध्यान भटकाता है और न्यायिक मैनपावर और संसाधनों काे नष्ट करता है। ऐसी याचिकाओं को खारिज करने का समय आ गया है और इसलिए याचिकाकर्ता पर जुर्माना लगाया गया है।