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Parliamentary Panel:18 साल हो चुनाव लड़ने की उम्र; झूठा चुनावी हलफनामा दाखिल करने पर सजा को लेकर भी की सिफारिश

Fri, 04 Aug 2023 11:51 PM IST
शिव शरण शुक्ला न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

मौजूदा कानून के अनुसार, लोकसभा और विधानसभा चुनाव लड़ने के लिए व्यक्ति की कम से कम उम्र 25 साल है, जबकि राज्यसभा और राज्य विधान परिषद का सदस्य बनने के लिए न्यूनतम आयु 30 वर्ष है। वर्तमान में मतदाता के रूप में पंजीकरण कराने की न्यूनतम उम्र 18 वर्ष है।
 
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संसद। - फोटो : ANI
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विस्तार
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कानून और कार्मिक संबंधी संसदीय स्थायी समिति ने शुक्रवार को लोकसभा और विधानसभा चुनाव लड़ने के लिए न्यूनतम आयु मौजूदा 25 वर्ष से घटाकर 18 वर्ष करने की सिफारिश की। समिति ने कहा कि इससे युवाओं को लोकतंत्र में शामिल करने के अधिक अवसर दिए जा सकेंगे।

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मौजूदा कानून के अनुसार, लोकसभा और विधानसभा चुनाव लड़ने के लिए व्यक्ति की कम से कम उम्र 25 साल है, जबकि राज्यसभा और राज्य विधान परिषद का सदस्य बनने के लिए न्यूनतम आयु 30 वर्ष है। वर्तमान में मतदाता के रूप में पंजीकरण कराने की न्यूनतम उम्र 18 वर्ष है।

कनाडा, यूनाइटेड किंगडम और ऑस्ट्रेलिया जैसे विभिन्न देशों की प्रथाओं का अध्ययन करने के बाद समिति का मानना है कि राष्ट्रीय चुनावों में उम्मीदवारी के लिए न्यूनतम आयु 18 वर्ष होनी चाहिए। समिति ने कहा कि इन देशों के उदाहरण दर्शाते हैं कि युवा भारत में भी लोकतंत्र के विश्वसनीय और जिम्मेदार राजनीतिक भागीदार हो सकते हैं।
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झूठा चुनावी हलफनामा दाखिल करने पर दो साल तक बढ़ाई जाए अधिकतम सजा 
 भाजपा सांसद सुशील कुमार मोदी की अध्यक्षता वाली कानून एवं कार्मिक संबंधी स्थायी समिति ने शुक्रवार को कहा कि गलत चुनावी हलफनामा दायर करने की सजा को मौजूदा छह महीने से बढ़ाकर अधिकतम दो साल किया जाना चाहिए। हालांकि, समिति ने यह भी कहा कि सजा को सिर्फ असाधारण मामलों में ही लागू किया जाए, न कि छोटी त्रुटियों या अनजाने में हुई गलतियों के लिए।

लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 125ए के मौजूदा प्रावधानों के तहत गलत चुनावी हलफनामा दाखिल करने पर छह महीने तक की जेल या जुर्माना या दोनों हो सकते हैं। समिति ने कहा, निष्पक्ष चुनावों के लिए जरूरी है कि सजा की गंभीरता अपराध की गंभीरता के अनुरूप होनी चाहिए।

देश के 148 हवाईअड्डों में से सिर्फ 22 ही कमा रहे मुनाफा : संसदीय समिति
एक संसदीय समिति के अनुसार, देश के 148 हवाईअड्डों में से केवल 22 ही मुनाफा कमा रहे हैं और पिछले दो दशकों से विकास पथ पर होने के बावजूद, भारत में नागरिक उड्डयन क्षेत्र पूर्ण लाभ और जनसांख्यिकीय लाभांश प्राप्त नहीं कर पाया है। राज्यसभा के सांसद सुजीत कुमार की अध्यक्षता वाली समिति ने कहा है कि भारत का जो आकार है उसे देखते हुए देश में संचालित हवाईअड्डों की संख्या बहुत कम है।

समिति ने शुक्रवार को राज्यसभा में पेश की गई अपनी रिपोर्ट में कहा कि हवाईअड्डों के निर्माण में तेजी आई है। भारत लगभग 1.4 अरब लोगों का देश है और यद्यपि पिछले दो दशकों के दौरान यात्री और माल यातायात में उल्लेखनीय वृद्धि देखी गई है, फिर भी महत्वपूर्ण चुनौतियों से पार पाना बाकी है। रिपोर्ट में कहा गया है, दुनिया का सबसे तेजी से बढ़ने वाला विमानन बाजार होने के बावजूद, भारत के हवाईअड्डों के विस्तार को अभी भी वांछित गति नहीं मिल पाई है। यह देश की बढ़ती हवाई यात्रा मांग और विमानन विकास में बाधा बन रही है।

रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि यातायात में अभूतपूर्व वृद्धि के बावजूद, अधिकांश भारतीय वाहक घाटे से जूझ रहे हैं। उन्हें लंबे समय तक चलने के लिए लागत प्रभावी संचालन और स्थिरता बहुत जरूरी है। समिति ने सिफारिश की है कि भारतीय विमानपत्तन प्राधिकरण (एएआई) के हवाईअड्डों पर यात्री अनुभव और परिचालन उत्कृष्टता को बढ़ाने के लिए और अधिक प्रयास किए जाएं ताकि वे सार्वजनिक निजी भागीदारी वाले (पीपीपी) हवाईअड्डों की बराबरी कर सकें और उनकी सेवा का स्तर अंतरराष्ट्रीय मानकों के बराबर हो।

परीक्षा में असफल होने वाले युवाओं को बुलाकर काउंसलिंग की व्यवस्था करे स्वास्थ्य मंत्रालय
छात्रों में आत्महत्या के बढ़ते मामलों पर अंकुश लगाने के लिए संसदीय समिति ने स्वास्थ्य मंत्रालय को छात्रों की काउंसलिंग की सलाह दी है। संसदीय समिति ने स्वास्थ्य मंत्रालय को अपनी 24x7 हेल्पलाइन के तहत प्रतियोगिता परीक्षाओं में असफल होने वाले युवाओं को बुलाने और उन्हें परामर्श देने का प्रावधान करने की सिफारिश की है।

समिति ने मंत्रालय को राष्ट्रीय आत्महत्या रोकथाम के माध्यम से आत्महत्या के कारणों पर नजर रखने के तरीकों को मजबूत करने और उनकी संख्या में कमी लाने की सिफारिश की।

समिति ने इस बात पर दुख जताया कि भारत में छात्रों और बेरोजगार युवाओं की आत्महत्याओं की संख्या सबसे अधिक है। समिति का मानना है कि किसानों की तुलना में अधिक छात्रों ने आत्महत्या की है, लेकिन किसानों की आत्महत्या को राष्ट्रीय संकट कहा गया है। हालांकि, छात्रों की आत्महत्याओं पर शायद ही किसी का ध्यान गया हो और उन्हें मामले-दर-मामले के आधार पर निपटाया गया हो।
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