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Rajya Sabha Poll: भाजपा के टिकट बंटवारे में बाहरियों का पलड़ा भारी, लोकसभा चुनाव में उल्टा पड़ा था यह दांव

अमित शर्मा
Updated Wed, 21 Aug 2024 06:08 PM IST

सार

2024 के लोकसभा चुनावों में भाजपा के लिए उत्तर प्रदेश के नतीजे उम्मीद के मुताबिक नहीं थे। इन नतीजों की समीक्षा के लिए गठित कमेटी ने पार्टी नेतृत्व को बताया था कि चुनाव में बाहरियों को टिकट देना पार्टी को महंगा पड़ गया।

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इन राज्यों में भाजपा उम्मीदवारों पर नजर - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स


दरअसल, 2024 के लोकसभा चुनावों में भाजपा के लिए उत्तर प्रदेश के नतीजे उम्मीद के मुताबिक नहीं थे। इन नतीजों की समीक्षा के लिए गठित कमेटी ने पार्टी नेतृत्व को बताया था कि चुनाव में बाहरियों को टिकट देना पार्टी को महंगा पड़ गया। बाहरियों को टिकट मिलने से पार्टी के मूल कार्यकर्ताओं ने पार्टी का साथ नहीं दिया, वे घर बैठ गए और इसका परिणाम हुआ कि पार्टी को करारी हार का सामना करना पड़ा।   


बिहार के कई बड़े नेताओं की उम्मीदों को झटका

भाजपा ने बिहार से सर्वोच्च न्यायालय के वकील मनन कुमार मिश्रा को राज्यसभा में भेजने का फैसला किया है, जबकि इसी राज्य से पार्टी के वरिष्ठ नेता अश्विनी चौबे, आरके सिंह, रामकृपाल यादव, ऋुतुराज सिन्हा और शाहनवाज हुसैन जैसे नेताओं के पास कोई जिम्मेदारी नहीं है। एक जनाधार वाले नेता उपेंद्र कुशवाहा को एनडीए कोटे से राज्यसभा भेजना समझ में आता है, लेकिन मनन कुमार मिश्रा को पार्टी के पुराने और कर्मठ नेताओं के ऊपर तरजीह दिए जाने का कारण पार्टी के ही नेताओं को समझ में नहीं आ रहा है।  


राजनीतिक विश्लेषक सुनील पांडेय ने अमर उजाला से कहा कि भाजपा मनन कुमार मिश्रा को बिहार में एक ब्राह्मण चेहरे के तौर पर पेश कर रही है, लेकिन सच्चाई यह है कि एक बड़े वकील होने के बाद भी बिहार में मनन कुमार मिश्रा को कोई नेता नहीं मानता, न ही बिहार का ब्राह्मण समुदाय उनके नाम पर भाजपा को वोट देने वाला है। ऐसे में लोगों के लिए यह समझ से परे है कि पार्टी ने उन्हें सीधा राज्यसभा में क्यों भेज दिया। आरके सिंह, रामकृपाल यादव  और ऋतुराज सिन्हा जैसे नेताओं के बिहार से राज्यसभा जाने की चर्चा थी।  


स्मृति ईरानी और अन्नामलाई क्यों नहीं?

सुनील पांडेय कहते हैं कि तमिलनाडु से भाजपा के अध्यक्ष के. अन्नामलाई को बिहार से राज्यसभा भेजकर पार्टी ज्यादा बेहतर संकेत दे सकती थी। पांडेय कहते हैं कि दूसरे दलों से आए नेता भाजपा में मुख्यमंत्री, प्रदेश अध्यक्ष से लेकर केंद्रीय मंत्री तक बन रहे हैं, राज्यसभा जा रहे हैं और बड़े-बड़े विभागों के चेयरमैन बन रहे हैं, जबकि उसके अपने मूल नेताओं की उपेक्षा हो रही है। मुख्तार अब्बास नकवी जैसे नेताओं को किनारे लगाया जाना यही संकेत दे रहा है कि भाजपा ऐसी अनजानी राह पर आगे बढ़ रही है जिसका परिणाम खुद उसे ही पता नहीं है। 


कुमार राकेश ने अमर उजाला से कहा कि स्मृति ईरानी भाजपा की कद्दावर नेता रही हैं। जब उन्होंने राहुल गांधी को अमेठी में मात दी थी, तब पार्टी ने इसे एक बड़े बदलाव की तरह पेश किया था, लेकिन इस चुनाव में हार के बाद उनका कोई उपयोग नहीं किया जा रहा है। क्या यह बेहतर नहीं होता कि स्मृति ईरानी को राज्यसभा में लाकर एक तेज तर्रार नेता को विपक्ष के सामने खड़ा किया जाता। राकेश कहते हैं कि लोकसभा चुनाव में वरुण गांधी का टिकट कटने के बाद और मेनका गांधी को सुल्तानपुर में हार मिलने के बाद दोनों के पास कोई जिम्मेदारी नहीं है। जबकि अपनी प्रभावशाली उपस्थिति से दोनों ही नेता भाजपा के लिए एक अपील पैदा कर सकते हैं। राकेश कहते हैं कि अपने ही बड़े नेताओं की उपेक्षा करना भाजपा को भारी पड़ सकता है।


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