डॉ. रेड्डी ने बताया कि वर्ष 2010 में अमेरिका ने हल्दी और नीम से जुड़े हर्बल उत्पाद तैयार कर खुद का पेटेंट घोषित कर दिया था, लेकिन जब भारत ने इस पर ऐतराज जताया तो अमेरिका ने सात अंतर्राष्ट्रीय भाषाओं में आयुर्वेद दवाओं का ब्योरा उपलब्ध नहीं होने का तर्क दिया था। अब फॉर्माकोपिया और फॉर्मालुरी के ऑनलाइन होने के बाद कोई भी देश भारतीय आयुर्वेद की दवाओं पर अपनी मुहर नहीं लगा सकेगा।
जल्द ही केंद्र सरकार एमबीबीएस के पाठ्यक्रम में आयुर्वेद को शामिल करेगी। इसके लिए पाठ्यक्रम में बाकायदा बतौर जर्नल मेडिसिन इसका पूरा ब्योरा दिया जा सकेगा। जल्द ही आयुष मंत्रालय और स्वास्थ्य मंत्रालय इसकी घोषणा भी कर सकता है।